बिहार

रमज़ान आत्मा की शुद्धि, इबादत और अल्लाह से करीब होने का महीना- फखरे आलम

भागलपुर,अंगभारत। रमज़ान आत्मा की शुद्धि, इबादत और अल्लाह से करीब होने का महीना है। यह सिर्फ भूखा-प्यासा रहने का नाम नहीं, बल्कि बुरे कामों से बचकर अच्छे कामों की तरफ बढ़ने का अवसर देता है। हर मुसलमान को चाहिए कि वह इस पवित्र महीने की कद्र करें और ज्यादा से ज्यादा नेक काम करे। ये बातें खानकाह ए पीर दमड़िया के सज्जादानशीन मौलाना सैयद शाह फखरे आलम हसन ने कही।  उन्होंने कहा कि क़ुरआन का महीना रमज़ान वही महीना है जिसमें पवित्र क़ुरआन नाज़िल हुआ । क़ुरआन की तिलावत का सवाब इस महीने में कई गुना बढ़ा दिया जाता है।  रमजान रहमत और मग़फ़िरत का महीना है।  यह महीना अल्लाह की रहमत (दया), मग़फ़िरत (माफी) और जहन्नम से निजात का महीना है। सैयद फखरे आलम हसन ने कहा कि इस महीने में एक बहुत ही मुबारक रात होती है। जिसे शबे-क़द्र कहते हैं, जो हज़ार महीनों से बेहतर है। हदीस के मुताबिक रमज़ान में जन्नत के दरवाज़े खोल दिए जाते हैं और जहन्नम के दरवाज़े बंद कर दिए जाते हैं। रमज़ान की अहमियत रोज़ा इस्लाम का एक अहम स्तंभ है।
– रोज़ा इस्लाम के पांच स्तंभों में से एक है,सज्जादानशीन ने बताया कि  हर बालिग़ (व्यस्क) मुसलमान को रोज़ा रखना फ़र्ज़ है। सब्र और तक़वा की ट्रेनिंग रोज़ा इंसान को सब्र, परहेज़गारी और आत्म-संयम सिखाता है। बराबरी और हमदर्दी का एहसास रोज़ा रखने से अमीर और गरीब के बीच बराबरी का एहसास होता है और गरीबों की भूख का दर्द समझ में आता है। रमज़ान के अहम अहकाम (नियम) रोज़ा रखना फ़र्ज़ है सेहरी (फज्र से पहले) से लेकर इफ्तार (सूरज डूबने तक) खाना-पीना और बुरे कामों से बचना रोज़े का हिस्सा है। रमज़ान में पांच वक्त की नमाज़ के साथ तरावीह की नमाज़ पढ़ना बहुत सवाब का काम है। इस महीने में ज़कात और सदक़ा देना बहुत अफ़ज़ल है। इससे गरीबों की मदद होती है। रोज़ा तोड़ने वाली चीज़ें जानबूझकर खाना-पीना, उल्टी करना या गलत काम करना रोज़ा तोड़ देता है। छूट (रुख़्सत) बीमार, मुसाफ़िर, गर्भवती या बुज़ुर्ग लोगों को रोज़े में छूट है, लेकिन बाद में क़ज़ा या फ़िद्या देना होता है| मुस्लिम भाईयों के लिए रमजान का महीना सबसे अहम मानी जाती है।