पंजवारा, बांका,अंग भारत। पंजवारा थाना क्षेत्र अंतर्गत सबलपुर पंचायत स्थित ड्योढ़ी दुर्गा मंदिर धार्मिक आस्था के साथ ऐतिहासिक विरासत का भी महत्वपूर्ण केंद्र है। करीब 162 वर्षों से चली आ रही पूजा परंपरा इस मंदिर को विशेष पहचान देती है। यहां मां भगवती के दर्शन के लिए स्थानीय श्रद्धालुओं के अलावा दूर-दराज के क्षेत्रों से भी लोग पहुंचते हैं।स्थानीय मान्यताओं और बुजुर्गों से मिली जानकारी के अनुसार, इस मंदिर का इतिहास उत्तर प्रदेश के शेर छाता गांव से जुड़ा हुआ है। बताया जाता है कि राजघराने के पूर्वज गुना नदी के तट पर मां दुर्गा की आराधना किया करते थे। बाद में जब परिवार के लोग वहां से खड़कपुर आए, तो अपने साथ मां भगवती की प्रतिमा भी ले आए। इसके बाद वे सबलपुर में आकर बस गए और यहां पूजा-अर्चना की परंपरा को आगे बढ़ाया।मंदिर से जुड़ी एक प्रचलित कथा के अनुसार, राजघराने के गोविंद बाबू और श्याम लाल बाबू के बाद काली प्रसाद सिंह ने मां भगवती की प्रतिमा को खपरैल के एक साधारण भवन में स्थापित कर पूजा शुरू की थी। उस समय इलाके में महामारी फैलने से लोग परेशान थे।
कहा जाता है कि इसी दौरान मां भगवती ने काली प्रसाद सिंह को स्वप्न में दर्शन देकर विधि-विधान और श्रद्धा के साथ आराधना करने का संदेश दिया। इसके बाद उन्होंने वर्ष 1861 में पक्का भवन बनवाकर मां की प्रतिमा स्थापित की और वैदिक परंपरा के अनुसार पूजा-अर्चना शुरू कराई। हालांकि, इस प्रसंग का विवरण स्थानीय मान्यताओं पर आधारित है।स्थानीय लोगों के अनुसार, मंदिर की स्थापना के बाद से राजघराने के वंशज लगातार मां भगवती की पूजा करते आ रहे हैं। समय के साथ मंदिर का विस्तार हुआ और इसकी धार्मिक महत्ता भी बढ़ती गई। नवरात्र सहित विभिन्न धार्मिक अवसरों पर यहां विशेष पूजा-अर्चना की जाती है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं।
मंदिर परिसर में भक्तों की आवाजाही सालभर बनी रहती है। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि सच्चे मन से मां भगवती की आराधना करने से उनकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। इसी विश्वास के कारण यह मंदिर क्षेत्र के लोगों की आस्था से गहराई से जुड़ा हुआ है।मंदिर के अध्यक्ष निखिल बहादुर सिंह के अनुसार, मंदिर काफी प्राचीन है। शुरुआती दौर में यहां झोपड़ीनुमा भवन में पूजा की जाती थी, लेकिन समय के साथ मंदिर का विस्तार हुआ। उन्होंने बताया कि यहां दर्शन करने आने वाले श्रद्धालुओं की मां भगवती के प्रति गहरी आस्था है।वहीं, मंदिर के सचिव यशवंत कुमार सिंह ने बताया कि मंदिर में सालभर संध्या के समय पूजा-अर्चना की जाती है। आसपास के गांवों के साथ दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों से भी श्रद्धालु मां के दर्शन के लिए पहुंचते हैं।सबलपुर का ड्योढ़ी दुर्गा मंदिर आज केवल पूजा-अर्चना का स्थल नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही धार्मिक परंपरा और ऐतिहासिक विरासत का प्रतीक भी है। उत्तर प्रदेश से बिहार तक की यात्रा से जुड़ी इसकी कहानी क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को समृद्ध करती है।







