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40 साल सेवा के बाद प्रधान लिपिक बिरेंद्र सिंह रिटायर

रजौन/बांका,अंग भारत। दीपनारायण सिंह महाविद्यालय, भूसिया (रजौन) के प्रधान लिपिक बिरेंद्र कुमार सिंह, जिन्हें प्यार से लोग ‘बादल’ भी कहते हैं, ने करीब 40 वर्षों की निष्कलंक और समर्पित सेवा के बाद 30 अप्रैल 2026 को आधिकारिक रूप से सेवानिवृत्ति ली। एक ऐसे दौर में जब सरकारी और प्रशासनिक कार्यों में भागदौड़ और दबाव आम बात है, बिरेंद्र बाबू ने अपनी सादगी और अटूट कार्यक्षमता से न केवल संस्थान का मान बढ़ाया, बल्कि एक ऐसी कार्य-संस्कृति स्थापित की जो आज के युवा कर्मचारियों के लिए किसी पाठशाला से कम नहीं है। कॉलेज परिसर में आयोजित विदाई समारोह केवल एक रस्म नहीं थी, बल्कि एक कर्तव्यनिष्ठ कर्मचारी के प्रति पूरे संस्थान का सम्मान था।

चार दशकों का लंबा सफर

बिरेंद्र कुमार सिंह का सफर 15 सितंबर 1986 को एक सहायक लिपिक के रूप में शुरू हुआ था। उस समय का कार्य परिवेश आज की तकनीक से पूरी तरह अलग था, जहाँ हर फाइल का हिसाब कागजों पर होता था। उन्होंने अपनी मेहनत के दम पर वर्ष 2013 में प्रधान लिपिक के पद तक का सफर तय किया। चार दशक लंबा वक्त होता है, और इतने वर्षों तक बिना किसी विवाद के जिम्मेदारी निभाना उनकी परिपक्वता को दर्शाता है।

  • 1986: सहायक लिपिक के रूप में कार्यभार संभाला।
  • 2013: प्रधान लिपिक के पद पर पदोन्नति।
  • 2026: 40 साल की लंबी सेवा के बाद सेवानिवृत्ति।

विदाई का भावुक पल

कॉलेज परिसर में आयोजित विदाई समारोह में माहौल काफी भावुक था। प्रभारी प्राचार्य डॉ. महेंद्र प्रसाद सिंह ने जब उन्हें डायरी, कलम और अंगवस्त्र भेंट किए, तो वहां मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम थीं। अक्सर विदाई समारोह औपचारिकता होते हैं, लेकिन यहां स्थिति कुछ और थी। सहकर्मियों ने उनके साथ बिताए उन दिनों को याद किया जब कठिन प्रशासनिक कार्यों को बिरेंद्र बाबू चुटकी बजाते ही सुलझा देते थे। उनकी सबसे बड़ी खूबी उनकी ‘समयनिष्ठा’ थी। चाहे कार्यालय की फाइलें हों या छात्रों की समस्याएं, वे हमेशा हर काम को एक निश्चित समय सीमा में पूरा करने के लिए जाने जाते थे।

कार्यस्थल पर उनकी छाप

कॉलेज के शिक्षकों और कर्मचारियों ने उनके व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की। वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि कैसे बिरेंद्र सिंह ने पारदर्शिता को अपना मूल मंत्र बनाया था। आज के दौर में जब प्रशासन में भ्रष्टाचार और लेटलतीफी की खबरें आम हैं, बिरेंद्र बाबू का बिना किसी दाग के सेवाकाल पूरा करना एक बड़ी मिसाल है। उनके द्वारा अपनाई गई कार्यशैली को अब कॉलेज का नया स्टाफ एक ‘मैनुअल’ की तरह देखता है।

घर पर भी जारी सम्मान

बिरेंद्र कुमार सिंह की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि विदाई के अगले दिन भी सम्मान का सिलसिला रुका नहीं। उनके बनगांव स्थित पैतृक आवास पर पूर्व प्राचार्य प्रो. जयकुमार राणा और प्रो. जीवन प्रसाद सिंह का पहुंचना यह साबित करता है कि उनका रिश्ता सिर्फ एक कर्मचारी का नहीं था, बल्कि एक विश्वासपात्र और सहयोगी का था। उन्होंने अपने पुराने अनुभवों को साझा करते हुए यह कहा कि बिरेंद्र बाबू की कमी कॉलेज प्रशासन को लंबे समय तक खलेगी।

सीख और विरासत

बिरेंद्र कुमार सिंह की सेवानिवृत्ति के साथ कॉलेज के इतिहास का एक अध्याय भले ही बंद हो गया हो, लेकिन उनकी कार्यशैली की छाप हमेशा बनी रहेगी। उन्होंने सिखाया कि कैसे एक छोटे पद से शुरुआत करके भी व्यक्ति अपने काम और व्यवहार से एक बड़ी पहचान बना सकता है। उनके रिटायरमेंट पर उपस्थित कुछ प्रमुख लोग:

श्रेणी प्रमुख नाम
शिक्षक अनिल कुमार राव, राकेश दास, डॉ. ज्योतिष प्रसाद सिंह, डॉ. राजीव रंजन सिंह
कर्मचारी राजकुमार सिंह, श्यामबिहारी सिंह, निरंजन कुमार सिंह, मनोज कुमार

अंत में, बिरेंद्र कुमार सिंह की सेवानिवृत्ति केवल एक सरकारी प्रक्रिया का हिस्सा नहीं है। यह एक ऐसे जीवन की कहानी है जिसने निस्वार्थ सेवा, ईमानदारी और निरंतरता को महत्व दिया। आने वाली पीढ़ियां शायद यह न जानें कि कौन सी फाइल किस दराज में थी, लेकिन वे यह जरूर जानेंगी कि इस महाविद्यालय के गलियारों में एक ऐसा लिपिक भी था, जिसने अपने काम को ही अपनी पूजा माना था। उनके भावी जीवन के लिए कॉलेज परिवार की शुभकामनाएं उनके लंबे और स्वस्थ भविष्य की गवाह हैं।

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अंग भारत • रिपोर्टर

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