तेहरान,अंग भारत। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने वर्तमान भू-राजनीतिक अस्थिरता के बीच वैश्विक मुस्लिम जगत को एक नई राह दिखाने की कोशिश की है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यदि इस्लामी देश अपने आंतरिक मतभेदों को दरकिनार कर एकजुट हो जाएं, तो वे न केवल क्षेत्र में शांति स्थापित कर सकते हैं, बल्कि बाहरी ताकतों के हस्तक्षेप को भी प्रभावी ढंग से रोक सकते हैं। राष्ट्रपति का यह बयान ऐसे समय में आया है जब गाजा, लेबनान और फिलिस्तीन जैसे क्षेत्रों में मानवीय संकट चरम पर है और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं इन समस्याओं का समाधान निकालने में विफल साबित हो रही हैं। उनके अनुसार, एकता अब केवल एक नैतिक आदर्श नहीं, बल्कि अस्तित्व बचाए रखने की रणनीतिक जरूरत बन चुकी है।
एकता की अनिवार्य जरूरत
तेहरान में आयोजित ‘इमाम खामेनेई: प्रतिरोध के अमर नेता’ सम्मेलन को संबोधित करते हुए पेजेश्कियान ने कहा कि मुस्लिम देशों के साझा मूल्य—जैसे एक ईश्वर, एक पैगंबर और एक पवित्र ग्रंथ—किसी भी राजनीतिक बंटवारे से कहीं अधिक गहरे हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि जब भी इस्लामी राष्ट्रों ने आपस में भाईचारे को प्राथमिकता दी है, उन्होंने वैश्विक स्तर पर एक मजबूत शक्ति के रूप में खुद को स्थापित किया है।
- सांप्रदायिक मतभेदों को मिटाकर साझा हितों पर ध्यान केंद्रित करना।
- आर्थिक और रणनीतिक सहयोग के माध्यम से क्षेत्र को आत्मनिर्भर बनाना।
- बाहरी शक्तियों के प्रभाव को कम करने के लिए आपसी संवाद बढ़ाना।
खामेनेई के विचारों का प्रभाव
दिवंगत सर्वोच्च नेता अयातुल्ला सैयद अली खामेनेई को याद करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि उनके द्वारा बोया गया बीज आज एक वटवृक्ष बन चुका है। खामेनेई का दर्शन केवल ईरान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह वैश्विक स्तर पर उन सभी समुदायों के लिए प्रेरणा बना है जो न्याय और सम्मान के लिए लड़ रहे हैं। पेजेश्कियान ने इस बात पर विशेष ध्यान दिया कि किसी महान नेता के देहांत के बाद भी उनके सिद्धांत नई पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक का कार्य करते हैं, जो प्रतिरोध की भावना को निरंतर जीवंत रखते हैं।
गाजा और फिलिस्तीन संकट
राष्ट्रपति ने गाजा और फिलिस्तीन के वर्तमान हालातों पर गहरी चिंता जाहिर की। उन्होंने बिना नाम लिए उन वैश्विक शक्तियों पर निशाना साधा जो इजराइल की सैन्य कार्रवाई का समर्थन कर रही हैं। उनके संबोधन के मुख्य बिंदु इस प्रकार थे:
“मानवाधिकारों की बात करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं तब खामोश क्यों हो जाती हैं जब निर्दोष लोगों और बुद्धिजीवियों को निशाना बनाया जाता है? यदि मुस्लिम देश एकजुट हों, तो इन मानवीय त्रासदियों को रोकने की ताकत हमारे पास है।”
उन्होंने स्पष्ट किया कि इस्लामी देशों के बीच का आपसी बंटवारा ही उन ताकतों के लिए मौका देता है जो इस क्षेत्र को अस्थिर देखना चाहती हैं।
अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की विफलता
पेजेश्कियान ने वैश्विक सुरक्षा ढांचे पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र जैसी बड़ी अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं आज शक्तिहीन नजर आती हैं। जब भी मुस्लिम देशों की बात आती है, ये संस्थाएं दोहरे मानदंडों का पालन करती हैं। उन्होंने तर्क दिया कि वैज्ञानिक और बुद्धिजीवियों की हत्याएं यह साबित करती हैं कि अंतरराष्ट्रीय कानून केवल कागजी कार्रवाई बनकर रह गए हैं। ऐसे में, क्षेत्र के देशों को अपनी सुरक्षा और भविष्य के फैसले खुद लेने होंगे, न कि दूसरों के भरोसे रहना होगा।
शांति का साझा संकल्प
अपने भाषण के अंत में, ईरानी राष्ट्रपति ने ईरान की प्रतिबद्धता को दोहराया। उन्होंने कहा कि ईरान कभी भी किसी संघर्ष की शुरुआत नहीं करना चाहता, लेकिन वे न्याय और स्थिरता के साथ समझौता भी नहीं करेंगे। मुस्लिम देशों के प्रति उनकी अपील साफ थी: अपनी आर्थिक और रणनीतिक ऊर्जा को व्यर्थ के विवादों में न गवाएं, बल्कि एक ऐसे गठबंधन का निर्माण करें जो आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित हो।
यह संदेश केवल एक राजनीतिक संबोधन नहीं, बल्कि इस्लामिक वर्ल्ड के लिए एक चेतावनी और सुझाव दोनों है। क्या मुस्लिम राष्ट्र इतिहास से सबक लेकर एकजुट होंगे, या फिर वे आपसी मतभेदों के जाल में फंसकर खुद को कमजोर करते रहेंगे? यह एक ऐसा सवाल है जिसका उत्तर आने वाला समय ही देगा।







