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विदेश की नौकरी छोड़ शिवभक्ति का मार्ग चुना, प्रेमानंद महाराज के लिए निकले कांवड़िया

प्रेमानंद महाराज के लिए हरिद्वार से वृंदावन दंडवत कांवड़ यात्रा करते हुए जॉर्डन से लौटे शिवभक्त रमन की तस्वीर

फरीदाबाद, अंग भारत। फरीदाबाद के सरूरपुर गांव के रहने वाले 28 वर्षीय रमन ने अपनी आस्था और संकल्प की एक ऐसी मिसाल पेश की है जो आज पूरे देश में चर्चा का विषय बनी हुई है। रमन ने जॉर्डन में अपनी अच्छी-खासी नौकरी छोड़कर हरिद्वार से वृंदावन तक 350 किलोमीटर की कठिन दंडवत कांवड़ यात्रा शुरू की है। उनका एकमात्र उद्देश्य वृंदावन के प्रसिद्ध संत प्रेमानंद महाराज के उत्तम स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना करना और उन्हें पवित्र गंगाजल से स्नान कराना है। 22 जुलाई को हरिद्वार से शुरू हुई यह यात्रा रमन की गहरी श्रद्धा का प्रमाण है, जिसे पूरा करने के लिए वह हर दिन आठ किलोमीटर तक दंडवत चल रहे हैं।

नौकरी छोड़ी, संकल्प लिया

रमन ने जब इस यात्रा का निर्णय लिया, तो उनके पास जॉर्डन की एक एक्सपोर्ट कंपनी में कोऑर्डिनेटर की नौकरी थी, जहाँ उन्हें 45 हजार रुपये प्रतिमाह वेतन मिलता था। उन्होंने अपने करियर से ज्यादा अपने आध्यात्मिक गुरु, प्रेमानंद महाराज के प्रति अपनी आस्था को महत्व दिया। रमन बताते हैं कि पिछले तीन वर्षों से वे लगातार ऑनलाइन महाराज जी के प्रवचन सुन रहे थे। जब उन्हें पता चला कि महाराज जी का स्वास्थ्य ठीक नहीं है, तो उन्होंने बिना किसी झिझक के अपनी नौकरी से इस्तीफा दिया और 21 अप्रैल को सीधे भारत लौट आए।

परिवार का मिला साथ

रमन के पिता बदरपुर बॉर्डर पर एक सिक्योरिटी गार्ड के रूप में कार्यरत हैं। शुरुआत में रमन ने अपने माता-पिता और भाई-बहनों को इस कठिन दंडवत यात्रा के बारे में नहीं बताया था, क्योंकि उन्हें डर था कि वे चिंतित होंगे। हालांकि, जब परिवार को उनकी योजना का पता चला, तो उन्होंने रमन के संकल्प को न केवल स्वीकार किया बल्कि उसका पूरा समर्थन भी किया। रमन के भाई सोनू और कुंदन इस पूरी यात्रा में उनके साथ साये की तरह चल रहे हैं, साथ ही उनके तीन दोस्त भी इस कठिन सफर में उनकी मदद कर रहे हैं।

यात्रा की चुनौतियां

दंडवत कांवड़ यात्रा सामान्य पैदल यात्रा से कहीं अधिक श्रमसाध्य है। रमन ने बताया कि इस सफर को व्यवस्थित बनाने के लिए उनकी छह लोगों की टीम हर कदम पर साथ है। ये लोग अपना खाना खुद तैयार करते हैं और हर पड़ाव पर रमन की जरूरतों का ध्यान रखते हैं। यात्रा के दौरान आने वाली बाधाओं पर बात करते हुए रमन कहते हैं:

  • शुरुआत में रमन रोजाना पांच किलोमीटर दंडवत चलते थे।
  • अब उनके शरीर ने गति पकड़ ली है और वे आठ किलोमीटर तक की दूरी तय कर रहे हैं।
  • उत्तर प्रदेश की सीमा में पुलिस प्रशासन का सहयोग सराहनीय रहा।
  • हरियाणा के फरीदाबाद क्षेत्र में प्रवेश करने के बाद भारी ट्रैफिक के कारण उन्हें काफी मशक्कत करनी पड़ी।

प्रेमानंद महाराज से लगाव

रमन ने अब तक कभी प्रेमानंद महाराज को साक्षात नहीं देखा है। वे कहते हैं कि जब से उन्होंने महाराज जी के प्रवचन सुनना शुरू किया, वे हमेशा विदेश में ही थे। फिर भी, उनके मन में महाराज जी के प्रति अटूट प्रेम है। रमन का कहना है कि उनकी जीवन की सबसे बड़ी इच्छा यही है कि वह वृंदावन पहुंचकर अपने साथ लाए गंगाजल से प्रेमानंद महाराज को स्नान करवा सकें। रमन इससे पहले 12 बार अलग-अलग तरह की कांवड़ यात्राएं कर चुके हैं, लेकिन यह दंडवत यात्रा उनके लिए सबसे खास और कठिन अनुभव है।

आस्था का अनूठा उदाहरण

रमन की यह कहानी केवल एक युवक का जुनून नहीं है, बल्कि यह उस अटूट विश्वास को दर्शाती है जो एक भक्त को अपने गुरु के प्रति होता है। 10वीं तक पढ़े रमन का जीवन अब पूरी तरह से भक्तिमय हो चुका है। वे हर दिन तीन से चार घंटे तक प्रवचन सुनने के अपने पुराने अनुशासन को आज भी पूरी तरह से निभा रहे हैं। जॉर्डन की चकाचौंध को पीछे छोड़कर धूल और धूप के बीच दंडवत चलते हुए रमन की यह यात्रा बताती है कि आज के दौर में भी आस्था की जड़ें कितनी गहरी हैं।

रमन का संकल्प यह संदेश देता है कि जब मन में सच्ची निष्ठा हो, तो 350 किलोमीटर की दूरी भी छोटी लगने लगती है। उनकी यह दंडवत यात्रा एक सामान्य कांवड़ यात्रा से कहीं अधिक तपस्या का रूप ले चुकी है।

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अंग भारत • रिपोर्टर

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