पटना,अंग भारत। बिहार की प्रसिद्ध लोकगायिका मनीषा श्रीवास्तव को संगीत नाटक अकादमी द्वारा वर्ष 2025 का प्रतिष्ठित उस्ताद बिस्मिल्लाह खां युवा पुरस्कार दिए जाने की घोषणा की गई है। इस उपलब्धि को बिहार की लोकसंस्कृति और लोकसंगीत के लिए एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। पुरस्कार की घोषणा के बाद कला और सांस्कृतिक जगत में खुशी की लहर है।
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‘यह सम्मान बिहार की लोकपरंपरा का है’
हिन्दुस्थान समाचार से विशेष बातचीत में मनीषा श्रीवास्तव ने कहा कि यह सम्मान केवल उनका व्यक्तिगत सम्मान नहीं है, बल्कि बिहार के लोकगीतों, लोकसंस्कृति और उन सभी कलाकारों का सम्मान है जो प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत को सहेजने और आगे बढ़ाने में जुटे हुए हैं।उन्होंने कहा कि इस सम्मान को वह अपने गुरुजनों, परिवार, बड़े-बुजुर्गों और उन सभी सहयोगियों को समर्पित करती हैं जिन्होंने हर कदम पर उनका उत्साहवर्धन किया और बेहतर कार्य करने की प्रेरणा दी।
भोजपुरी से संस्कृत तक कई भाषाओं में गाए गीत
मनीषा श्रीवास्तव ने बताया कि उनका पूरा जीवन लोकसंगीत को समर्पित रहा है। उन्होंने अब तक भोजपुरी, मैथिली, अवधी, हिंदी और संस्कृत सहित कई भाषाओं में लोकगीत गाए हैं। उनके गीतों को देश-विदेश में सराहना मिली है।उन्होंने कहा कि आने वाले समय में वह बिहार की अन्य प्रमुख भाषाओं अंगिका, बज्जिका और मगही के लोकगीतों पर भी गंभीरता से काम कर रही हैं। उनका मानना है कि सभी भाषाएं मां के समान होती हैं और हर भाषा की लोकपरंपरा को समान सम्मान मिलना चाहिए।
बिहार की सांस्कृतिक धरोहरों पर भी कर रही हैं काम
लोकगीतों के अलावा मनीषा श्रीवास्तव बिहार के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विषयों पर भी लगातार काम कर रही हैं। उन्होंने वीर योद्धा बाबू वीर कुँवर सिंह के जीवन पर आधारित गीत, भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की जीवनी पर गीत और प्रधानमंत्री के मोटे अनाज को बढ़ावा देने के अभियान से प्रेरित मिलेट्स गीत भी प्रस्तुत किए हैं।इसके साथ ही उन्होंने बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बेटियों पर आधारित कई जागरूकता गीत भी गाए हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में बिहार की अन्य ऐतिहासिक धरोहरों और सांस्कृतिक विरासतों पर आधारित नए गीत श्रोताओं को सुनने को मिलेंगे।
बाजारवाद से अलग बनाई अपनी पहचान
मनीषा श्रीवास्तव का कहना है कि उन्होंने हमेशा अपनी अलग राह चुनी है। उन्होंने संगीत को केवल बाजार की मांग के अनुसार नहीं ढाला, बल्कि शालीन और सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़े गीतों को बढ़ावा दिया है।उन्होंने कहा, “मैंने बाजार के अधीन खुद को नहीं किया। मैंने ऐसे गीतों की एक समानांतर धारा तैयार करने का प्रयास किया जो हमारी संस्कृति, परंपरा और सामाजिक मूल्यों को मजबूत करें।”
पुरस्कार से मिलेगी नई ऊर्जा
लोकगायिका ने कहा कि संगीत नाटक अकादमी द्वारा मिला यह सम्मान उनके लिए नई जिम्मेदारी और नई प्रेरणा लेकर आया है। इससे उन्हें बिहार की लोकसंस्कृति और लोकसंगीत को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और मजबूती से प्रस्तुत करने की ऊर्जा मिलेगी।










