अंग भारत,कटिहार। दिवासी सेंगल अभियान (आदिवासी एकल अभियान) के सक्रिय कार्यकर्ताओं ने सोमवार को जिला पदाधिकारी के माध्यम से माननीय राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू को 8 सूत्री ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में भारत के लगभग 15 करोड़ आदिवासियों के लिए संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत अलग धार्मिक मान्यता और 2027 की जनगणना में ‘सरना धर्म कोड’ का अलग कॉलम देने की मांग की गई है।ज्ञापन में कार्यकर्ताओं ने कहा कि अनुच्छेद 342 के तहत आदिवासी/जनजाति का दर्जा तो मिल चुका है, लेकिन अनुच्छेद 25 के मौलिक अधिकार के तहत धर्म की स्वतंत्रता अभी तक नहीं मिली। उन्होंने आरोप लगाया कि यह आदिवासियों के साथ “घोर अन्याय और पक्षपातपूर्ण रवैया” है।
ज्ञापन के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
आदिवासी प्राकृतिक पूजक हैं। वे सूर्य, चंद्रमा, धरती, पर्वत, नदी, पेड़-पौधे और जीव-जंतुओं की पूजा करते हैं। यह पूजा पद्धति पर्यावरण संतुलन और स्वास्थ्य प्रणाली का अनोखा उदाहरण है।आदिवासियों में वर्ण व्यवस्था, दहेज प्रथा या ऊँच-नीच का कोई भेदभाव नहीं है। वे न हिंदू हैं, न मुसलमान, न ईसाई। उनकी धार्मिक सोच और संस्कृति पूरी तरह भिन्न है।
जब जैन, बौद्ध, सिख आदि छोटे धर्मों को जनगणना कोड मिल चुका है, तो सरना धर्म मानने वाले 15 करोड़ आदिवासियों के साथ भेदभाव क्यों?
मांग संयुक्त राष्ट्र के विश्व आदिवासी अधिकार घोषणा-पत्र और मानवाधिकारों के भी अनुरूप है।
आदिवासी एकल अभियान के राष्ट्रीय अध्यक्ष पूर्व सांसद सलकनपुर ने बार-बार धरना-प्रदर्शन कर सरकार को अवगत कराया, लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
ज्ञापन सौंपने वाले कार्यकर्ता ने कहा, “हम कब तक अपने मौलिक अधिकारों से वंचित रहेंगे? 2027 की जनगणना हमारा आखिरी मौका है। अगर सरकार सरना धर्म कोड नहीं देगी तो यह जबरन हिंदू, मुसलमान या ईसाई बनाने का षड्यंत्र साबित होगा।”
जिला प्रशासन ने ज्ञापन प्राप्त कर केंद्र सरकार को भेजने का आश्वासन दिया है। आदिवासी संगठनों ने चेतावनी दी है कि अगर मांग पूरी नहीं हुई तो पूरे देश में बड़े स्तर पर आंदोलन किया जाएगा।
यह घटना आदिवासी समाज में सरना धर्म की मान्यता को लेकर चल रहे लंबे संघर्ष का नया अध्याय मानी जा रही है।
ज्ञापन के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
आदिवासी प्राकृतिक पूजक हैं। वे सूर्य, चंद्रमा, धरती, पर्वत, नदी, पेड़-पौधे और जीव-जंतुओं की पूजा करते हैं। यह पूजा पद्धति पर्यावरण संतुलन और स्वास्थ्य प्रणाली का अनोखा उदाहरण है।आदिवासियों में वर्ण व्यवस्था, दहेज प्रथा या ऊँच-नीच का कोई भेदभाव नहीं है। वे न हिंदू हैं, न मुसलमान, न ईसाई। उनकी धार्मिक सोच और संस्कृति पूरी तरह भिन्न है।
जब जैन, बौद्ध, सिख आदि छोटे धर्मों को जनगणना कोड मिल चुका है, तो सरना धर्म मानने वाले 15 करोड़ आदिवासियों के साथ भेदभाव क्यों?
मांग संयुक्त राष्ट्र के विश्व आदिवासी अधिकार घोषणा-पत्र और मानवाधिकारों के भी अनुरूप है।
आदिवासी एकल अभियान के राष्ट्रीय अध्यक्ष पूर्व सांसद सलकनपुर ने बार-बार धरना-प्रदर्शन कर सरकार को अवगत कराया, लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
ज्ञापन सौंपने वाले कार्यकर्ता ने कहा, “हम कब तक अपने मौलिक अधिकारों से वंचित रहेंगे? 2027 की जनगणना हमारा आखिरी मौका है। अगर सरकार सरना धर्म कोड नहीं देगी तो यह जबरन हिंदू, मुसलमान या ईसाई बनाने का षड्यंत्र साबित होगा।”
जिला प्रशासन ने ज्ञापन प्राप्त कर केंद्र सरकार को भेजने का आश्वासन दिया है। आदिवासी संगठनों ने चेतावनी दी है कि अगर मांग पूरी नहीं हुई तो पूरे देश में बड़े स्तर पर आंदोलन किया जाएगा।
यह घटना आदिवासी समाज में सरना धर्म की मान्यता को लेकर चल रहे लंबे संघर्ष का नया अध्याय मानी जा रही है।










