भागलपुर, अंग भारत। सबौर-राजपुर-शिवायडीह-मुरहन मुख्य मार्ग वर्तमान में पूरी तरह जर्जर हो चुका है और बड़े-बड़े गड्ढों के कारण यह सड़क अब आवागमन के लिए एक जानलेवा जाल बन गई है। यह सात किलोमीटर लंबा मार्ग सबौर प्रखंड के दक्षिणी हिस्सों को जिला मुख्यालय और पड़ोसी राज्य झारखंड से जोड़ने वाली एकमात्र लाइफलाइन है, लेकिन प्रशासनिक उपेक्षा के चलते इसका अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। सड़क की स्थिति इतनी खराब है कि राहगीरों का चलना तो दूर, वाहनों का गुजरना भी दुर्घटनाओं को न्योता देने जैसा है।
सड़क की बदहाली का कारण
इस सड़क मार्ग की बर्बादी के पीछे कई तकनीकी और प्राकृतिक कारण जिम्मेदार हैं। बीते वर्षों में गंगा के जलस्तर में हुई भारी वृद्धि और बाढ़ के पानी के सड़क पर जमाव के कारण इसकी संरचना पूरी तरह ध्वस्त हो गई।
- बाढ़ के पानी के कारण सड़क की ऊपरी परत पूरी तरह उखड़ चुकी है।
- सड़क का करीब 7 किलोमीटर का हिस्सा कई स्थानों पर पूरी तरह कट गया है।
- पूर्व में हुए पीसीसी सड़क निर्माण में भारी अनियमितता बरती गई, जिसके कारण सड़क में बड़ी दरारें आ गईं और फिर पूरी सड़क धंस गई।
- कतरिया नदी पर सालों से अधूरा पड़ा पुल का काम क्षेत्र के लिए एक बड़ा अवरोध बना हुआ है।
प्रभावित पंचायतें और आबादी
सड़क के जर्जर होने से केवल एक गांव नहीं, बल्कि पूरे सबौर प्रखंड का जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। लैलख, बैजलपुर और परघड़ी जैसी महत्वपूर्ण पंचायतें विकास की दौड़ में पिछड़ गई हैं।
लगभग दो दर्जन से अधिक गांवों के हजारों लोगों के लिए भागलपुर शहर तक पहुंचने का यही मुख्य रास्ता है। आपातकालीन स्थिति में एम्बुलेंस का इन गांवों तक पहुंचना नामुमकिन हो गया है, जिससे मरीजों की जान पर खतरा बना रहता है। स्कूली बच्चों और कॉलेज जाने वाले छात्रों के लिए यह रास्ता रोज़ाना संघर्ष बन चुका है। ऑटो चालकों ने भी इस मार्ग पर परिचालन न के बराबर कर दिया है, जिससे परिवहन सेवा लगभग ठप हो चुकी है।
प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई
ग्रामीण कार्य विभाग, सबौर के कार्यपालक अभियंता ने स्पष्ट किया है कि विभाग को सड़क की स्थिति का पूरी तरह संज्ञान है। वरीय अधिकारियों के निर्देश पर सड़क नवीनीकरण और पुनर्निर्माण का एक ठोस प्रस्ताव तैयार कर पटना मुख्यालय भेजा गया है।
कार्यपालक अभियंता के अनुसार, जैसे ही पटना से वित्तीय और प्रशासनिक स्वीकृति प्राप्त होगी, टेंडर की प्रक्रिया तुरंत शुरू की जाएगी और निर्माण कार्य को युद्ध स्तर पर पूरा कराया जाएगा।
स्थानीय लोगों का गुस्सा
ग्रामीणों के मन में प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के प्रति गहरा आक्रोश है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि हर बार चुनाव और बाढ़ के समय सिर्फ आश्वासन की राजनीति की जाती है, लेकिन हकीकत में सड़क की मरम्मत के नाम पर कुछ नहीं होता।
ग्रामीणों ने अब अपनी चुप्पी तोड़ते हुए सरकार को चेतावनी दी है। यदि सड़क के निर्माण के लिए समय रहते टेंडर जारी नहीं किया गया, तो वे बड़े पैमाने पर उग्र आंदोलन और सड़क जाम करने के लिए बाध्य होंगे। अब देखना यह है कि प्रशासन कब तक इस ‘लाइफलाइन’ को जीवनदान दे पाता है।
आर्थिक और सामाजिक असर
सड़क की खराब स्थिति का असर स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा है। किसानों को अपनी उपज बाजार तक ले जाने में दोगुना किराया खर्च करना पड़ रहा है। बार-बार वाहन खराब होने के कारण ऑटो और ट्रैक्टर मालिकों पर आर्थिक बोझ बढ़ रहा है। खराब सड़क न केवल समय की बर्बादी है, बल्कि यह क्षेत्र के सामाजिक और शैक्षणिक विकास में भी सबसे बड़ी बाधा है।








