Founder – Mohan Milan

रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर अमेरिकी शिकंजा, भारत समेत 5 देशों पर 100% टैरिफ का रास्ता साफ

अमेरिकी सीनेट द्वारा भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने के प्रस्ताव के बीच रूसी तेल आयात और भारत-अमेरिका व्यापारिक संबंधों को दर्शाती तस्वीर

वॉशिंगटन,अंग भारत। अमेरिकी सीनेट ने एक बड़ा कदम उठाते हुए ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026’ को 86-11 के भारी बहुमत से पारित कर दिया है। इस नए प्रस्तावित कानून के तहत रूस से कच्चा तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर दबाव बनाने के लिए उन पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त सीमा शुल्क (टैरिफ) लगाने का रास्ता साफ हो गया है। इसका सीधा मतलब यह है कि रूस से ऊर्जा खरीद जारी रखने वाले भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अज़रबैजान जैसे देशों से अमेरिका में आयात होने वाले सामान पर भारी टैक्स लगाया जा सकता है। हालांकि, भारतीय निर्यातकों और बाजार को फिलहाल घबराने की जरूरत नहीं है, क्योंकि यह प्रस्ताव अभी कानून नहीं बना है और इसे पूरी तरह लागू होने के लिए अभी अमेरिकी संसद के निचले सदन की मंजूरी और अमेरिकी राष्ट्रपति के अंतिम हस्ताक्षर की जरूरत होगी।

बिल के पीछे की रणनीति

यूक्रेन युद्ध के बाद से पश्चिमी देशों ने रूस की अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचाने के लिए उसके ऊर्जा निर्यात पर कई तरह के कड़े प्रतिबंध लगाए हैं। इसके बावजूद कई देशों ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए रूस से तेल खरीदना बंद नहीं किया। इसी को ध्यान में रखते हुए अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ओ. ग्राहम के नाम पर यह नया विधेयक तैयार किया गया है। सीनेट में इस बिल को रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक दोनों ही दलों के सांसदों का भारी समर्थन मिला। इसका मुख्य उद्देश्य रूस की वित्तीय रीढ़ की हड्डी माने जाने वाले तेल और गैस निर्यात से होने वाली कमाई को पूरी तरह से ठप करना है। सीनेट में इस बात पर जोर दिया गया कि जब तक रूस के बड़े खरीदार तेल खरीदना बंद नहीं करेंगे, तब तक रूस की सैन्य शक्ति को आर्थिक रूप से कमजोर करना बेहद मुश्किल होगा।

भारत के लिए बड़ी चुनौती

साल 2022 में यूक्रेन युद्ध छिड़ने के बाद जब पश्चिमी देशों ने रूसी तेल पर पाबंदी लगाई, तो भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता दी। भारतीय रिफाइनरियों ने रूस से रियायती दरों पर मिलने वाले सस्ते कच्चे तेल का आयात बड़े पैमाने पर बढ़ा दिया। इससे घरेलू बाजार में तेल की कीमतें नियंत्रित रहीं और भारतीय अर्थव्यवस्था को बड़ी राहत मिली। लेकिन अब यही रणनीति भारत के लिए एक बड़ी कूटनीतिक और व्यापारिक चुनौती बनती दिख रही है। अमेरिकी बाजार भारतीय निर्यातकों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। अगर अमेरिका भारत से आने वाले सामान पर 100 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगा देता है, तो भारतीय उत्पाद अमेरिकी बाजार में बेहद महंगे हो जाएंगे और उनकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता कमजोर हो जाएगी।

क्या तुरंत लगेगा नया टैक्स?

यह समझना जरूरी है कि इस बिल के सीनेट से पास होने का मतलब यह कतई नहीं है कि भारत पर तत्काल प्रभाव से टैक्स बढ़ जाएगा। कानून बनने की प्रक्रिया काफी लंबी होती है और इसके लिए कई चरणों को पार करना होता है:

  • प्रतिनिधि सभा की मंजूरी: सीनेट से पास होने के बाद अब इस विधेयक को अमेरिकी प्रतिनिधि सभा (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स) में भेजा जाएगा, जहां इस पर चर्चा और मतदान होगा।
  • राष्ट्रपति के हस्ताक्षर: दोनों सदनों से पास होने के बाद ही यह बिल हस्ताक्षर के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति के पास जाएगा और उनके दस्तखत के बाद ही कानून बनेगा।
  • राष्ट्रपति का विशेषाधिकार: कानून बनने के बाद भी 100 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगाना स्वतः अनिवार्य नहीं होगा। यह पूरी तरह से अमेरिकी राष्ट्रपति के विवेक पर निर्भर करेगा कि वे किस देश पर और कब इस अधिकार का इस्तेमाल करना चाहते हैं।

सीनेट में सांसदों के बीच टकराव

इस बिल को लेकर अमेरिकी संसद के भीतर भी तीखी बहस देखने को मिली। कुछ सांसदों ने राष्ट्रपति को इतने व्यापक व्यापारिक अधिकार दिए जाने पर कड़ी आपत्ति जताई। अमेरिकी सीनेटर रैंड पॉल और डेमोक्रेटिक पार्टी के सीनेटर रॉन वाइडेन जैसे आलोचकों का मानना है कि राष्ट्रपति को इतनी बड़ी शक्ति देने से इस टैरिफ का दुरुपयोग रूस पर दबाव बनाने के बजाय अन्य देशों के साथ चल रहे सामान्य व्यापारिक विवादों में भी किया जा सकता है। इस चिंता को दूर करने के लिए राष्ट्रपति के टैरिफ अधिकारों को सीमित करने वाला एक संशोधन भी पेश किया गया था, लेकिन सीनेट ने इसे 32-64 के मतों से खारिज कर दिया। समर्थकों का तर्क है कि रूस की ऊर्जा आय को रोकना युद्ध को समाप्त करने की दिशा में एक प्रभावी आर्थिक हथियार है।

बिल के अन्य कड़े प्रावधान

यह विधेयक केवल तेल खरीदने वाले देशों को ही निशाना नहीं बनाता, बल्कि इसमें रूसी तंत्र को कमजोर करने के लिए कई अन्य सख्त कदम भी शामिल किए गए हैं जो वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं:

  • पुतिन पर सीधे प्रतिबंध: रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, देश के शीर्ष सैन्य अधिकारियों, बड़े कारोबारी समूहों और उनके वित्तीय संस्थानों पर नए व्यक्तिगत और वित्तीय प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव है।
  • ‘शैडो फ्लीट’ पर कार्रवाई: रूसी तेल के परिवहन के लिए इस्तेमाल होने वाले अवैध या छिपे हुए समुद्री जहाजों (शैडो फ्लीट) के खिलाफ सख्त कार्रवाई का प्रावधान किया गया है।
  • रूसी निर्यात पर भारी शुल्क: रूस से होने वाले सीधे निर्यात पर 500 प्रतिशत तक का भारी-भरकम टैरिफ लगाने की बात इस बिल में शामिल है।
  • ईरान पर शिकंजा: रूस के साथ-साथ ईरान पर भी आर्थिक दबाव बनाए रखने के लिए इस बिल में ईरान के ऊर्जा और रणनीतिक क्षेत्रों से जुड़े प्रतिबंधों को और कड़ा किया गया है।

आगे क्या होगा?

आने वाले समय में भारतीय राजनयिकों और नीति निर्माताओं की नजर अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की गतिविधियों पर टिकी होगी। भारत को अमेरिका के साथ अपने मजबूत रणनीतिक संबंधों का इस्तेमाल करते हुए इस बात पर जोर देना होगा कि उसकी ऊर्जा जरूरतें पूरी तरह से घरेलू मांग पर आधारित हैं और इसका मकसद किसी युद्ध नीति का समर्थन करना नहीं है। यदि यह बिल बिना किसी बदलाव के कानून का रूप ले लेता है, तो भारत को अपनी व्यापारिक और ऊर्जा आयात नीतियों में बड़े फेरबदल करने पड़ सकते हैं।

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अंग भारत • रिपोर्टर

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