फुल्लीडुमर/बांका/अंग भारत। बिहार के बांका जिले के शंभूगंज, फुल्लीडुमर और बेलहर प्रखंड में प्रस्तावित न्यूक्लियर पावर प्लांट को लेकर इलाके में चर्चा तेज हो गई है। जहां एक तरफ इसे क्षेत्र के विकास, रोजगार और बिजली उत्पादन के बड़े अवसर के रूप में देखा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय लोग इसके संभावित दुष्प्रभावों को लेकर चिंतित नजर आ रहे हैं। गांवों में अब यह सवाल उठने लगा है कि परमाणु ऊर्जा संयंत्र क्षेत्र के लिए वरदान साबित होगा या फिर अभिशाप।
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16 हजार करोड़ की परियोजना पर चल रहा सर्वे
जानकारी के अनुसार एनटीपीसी द्वारा इस क्षेत्र में करीब 16 हजार करोड़ रुपये की लागत से 700 मेगावाट क्षमता वाले दो यूनिट स्थापित करने की योजना बनाई जा रही है। इसी क्रम में कंपनी की दो सदस्यीय टीम ने लगातार तीन दिनों तक इलाके का निरीक्षण किया। टीम ने जमीन की उपलब्धता, जल स्रोत और अन्य तकनीकी पहलुओं की जांच की। हालांकि अभी तक अंतिम स्थल का चयन नहीं किया गया है।परियोजना की चर्चा सामने आने के बाद से ही स्थानीय लोगों के बीच उत्सुकता के साथ-साथ भय का माहौल भी देखा जा रहा है। कई ग्रामीणों का कहना है कि अगर यहां परमाणु संयंत्र स्थापित होता है तो भविष्य में स्वास्थ्य और पर्यावरण पर गंभीर असर पड़ सकता है।
रेडिएशन को लेकर सबसे ज्यादा डर
विशेषज्ञों के अनुसार परमाणु ऊर्जा संयंत्र के आसपास सुरक्षा के बेहद कड़े मानक लागू किए जाते हैं। परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (AERB) के दिशा-निर्देशों के तहत प्लांट के पांच किलोमीटर तक के क्षेत्र को अत्यधिक संवेदनशील माना जाता है। इसके अलावा लगभग 16 किलोमीटर तक इमरजेंसी प्लानिंग जोन और 30 किलोमीटर तक रेडिएशन के संभावित प्रभाव की आशंका जताई जाती है।स्थानीय लोगों की सबसे बड़ी चिंता रेडिएशन और उसके स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर को लेकर है। विशेषज्ञों का कहना है कि रेडिएशन का प्रभाव मनुष्य के जीन और गुणसूत्रों पर पड़ सकता है। इससे कैंसर, शारीरिक विकलांगता, गर्भस्थ शिशुओं पर दुष्प्रभाव जैसी गंभीर समस्याएं पैदा होने की आशंका रहती है।
पर्यावरण और खेती पर भी असर की आशंका
ग्रामीणों को डर है कि परमाणु संयंत्र से निकलने वाले रेडियोधर्मी तत्व पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों, जल स्रोतों और कृषि भूमि को भी प्रभावित कर सकते हैं। क्षेत्र के किसान मानते हैं कि यदि जल और मिट्टी दूषित हुई तो खेती और पशुपालन पर बड़ा संकट खड़ा हो सकता है।सबसे गंभीर चिंता रेडियोधर्मी कचरे के सुरक्षित निस्तारण को लेकर जताई जा रही है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह कचरा सैकड़ों से लेकर हजारों वर्षों तक खतरनाक बना रह सकता है। यदि इसके प्रबंधन में थोड़ी भी लापरवाही हुई तो इसका असर आने वाली पीढ़ियों तक पड़ सकता है।
विकास और रोजगार की भी उम्मीद
हालांकि दूसरी ओर कुछ लोग इस परियोजना को क्षेत्र के विकास के लिए बड़ा अवसर मान रहे हैं। उनका कहना है कि अगर संयंत्र स्थापित होता है तो सड़क, बिजली, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं में तेजी से सुधार होगा। इसके अलावा हजारों युवाओं को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिलने की संभावना भी जताई जा रही है।फिलहाल बांका जिले में प्रस्तावित न्यूक्लियर पावर प्लांट को लेकर लोगों के बीच उम्मीद और आशंका दोनों का माहौल बना हुआ है।











