बौंसी (बांका)/अंग भारत। बौंसी के एसडीपीओ इंद्रजीत बैठा के बेटे अरविंद रंजन ने 70वीं बीपीएससी (BPSC) परीक्षा में 152वीं रैंक हासिल कर एसडीसी यानी सब-डिविजनल ऑफिसर के पद पर अपनी जगह पक्की की है। यह सफलता इस बात का पक्का सबूत है कि अगर इरादे मजबूत हों, तो सरकारी नौकरी की व्यस्तता भी आपकी तैयारी में आड़े नहीं आती। अरविंद ने न केवल अपनी वर्तमान जिम्मेदारी को निभाया, बल्कि एक बड़े सपने को भी हकीकत में बदल दिया, जो आज के हजारों युवाओं के लिए एक मिसाल है।
नौकरी और पढ़ाई का तालमेल
अक्सर लोग कहते हैं कि नौकरी के साथ पढ़ाई करना नामुमकिन है, लेकिन अरविंद ने गया में राजस्व पदाधिकारी के पद पर रहते हुए इसे मुमकिन कर दिखाया। 69वें बैच में अधिकारी बनने के बाद उन्होंने रुकने के बजाय अपनी तैयारी जारी रखी। उनकी दिनचर्या काफी चुनौतीपूर्ण थी। सुबह दफ्तर की फाइलों और जनता की समस्याओं को सुलझाना, और शाम को वापस आकर बीपीएससी के कठिन सिलेबस को पढ़ना, यह कोई छोटी बात नहीं है।
- टाइम मैनेजमेंट: अरविंद ने अपने दफ्तर के काम और पढ़ाई के बीच स्पष्ट लकीर खींची थी।
- अनुशासन: छुट्टी के दिनों का सदुपयोग करना और सोशल मीडिया जैसी चीजों से दूरी बनाना।
- निरंतरता: रोज भले ही कम घंटे पढ़ाई की, लेकिन पढ़ाई का दिन कभी खाली नहीं जाने दिया।
पिता के लिए गर्व का पल
एसडीपीओ इंद्रजीत बैठा के लिए यह गौरव का क्षण है। उन्होंने बताया कि अरविंद जब तैयारी कर रहा था, तो उसने घर आना-जाना बहुत कम कर दिया था। उसने पूरी एकाग्रता के साथ खुद को किताबों के बीच सीमित कर लिया था। पिता के मुताबिक, जब कोई बेटा अपनी मेहनत की कमाई के साथ-साथ पदोन्नति के लिए संघर्ष करता है, तो माता-पिता का सिर गर्व से ऊंचा हो जाता है। उनके अनुसार, अरविंद का समर्पण ही उसकी असली पहचान है।
सफलता का नया नजरिया
अरविंद की सफलता कोई चमत्कार नहीं है, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति का परिणाम है। 70वीं बीपीएससी की परीक्षा में प्रतिस्पर्धा बहुत अधिक थी, लेकिन उन्होंने अपने पिछले अनुभव (69वीं बीपीएससी) का पूरा फायदा उठाया। जो कमियां पिछली बार रह गई थीं, उन्हें इस बार सुधारा।
“सफलता उन लोगों के पास नहीं आती जो घंटों घड़ी देखते हैं, बल्कि उनके पास आती है जो अपने लक्ष्य को हासिल करने की जिद ठान लेते हैं।”
युवाओं के लिए प्रेरणा
बौंसी क्षेत्र में अरविंद की उपलब्धि की चर्चा हर जुबान पर है। इंस्पेक्टर मनीष कुमार और थानाध्यक्ष पंकज कुमार झा समेत कई प्रशासनिक अधिकारियों ने इसे क्षेत्र के लिए एक बड़ी प्रेरणा बताया है। स्थानीय युवाओं को अब यह विश्वास हो रहा है कि छोटे कस्बे से निकलकर बड़े पदों तक पहुँचना सिर्फ एक सपना नहीं है।
सफलता पाने के मूल मंत्र
यदि आप भी अरविंद की तरह सफलता पाना चाहते हैं, तो इन बातों पर गौर करना होगा:
| चरण | रणनीति |
|---|---|
| सिलेबस का ज्ञान | परीक्षा पैटर्न को बारीकी से समझें। |
| रिवीजन | नोट्स को बार-बार दोहराएं। |
| मॉक टेस्ट | पिछले वर्षों के प्रश्न-पत्र हल करें। |
अंत में, अरविंद की कहानी हमें यह सिखाती है कि साधन और सुविधाएं मायने नहीं रखतीं, मायने रखता है आपका ‘फोकस’। यदि आप अपनी वर्तमान स्थिति से खुश नहीं हैं और कुछ बड़ा करना चाहते हैं, तो अरविंद का यह सफर बताता है कि बदलाव की शुरुआत आज और अभी से हो सकती है। उनकी इस उपलब्धि ने बौंसी का नाम पूरे बिहार में रोशन किया है।








