गुवाहाटी,अंग भारत। राइजोर दल के प्रमुख और शिवसागर से विधायक अखिल गोगोई ने असम के मुख्यमंत्री डॉ. हिमंत बिस्व सरमा के हालिया बयानों पर कड़ा प्रहार करते हुए इसे महज एक राजनीतिक स्टंट करार दिया है। गोगोई का स्पष्ट मानना है कि राज्य सरकार द्वारा अवैध बांग्लादेशी नागरिकों को वापस भेजने का जो शोर मचाया जा रहा है, उसके पीछे कोई ठोस कानूनी आधार नहीं है। विधानसभा के बजट सत्र के दौरान मीडिया से मुखातिब होते हुए उन्होंने कहा कि सरकार केवल जनता का ध्यान बुनियादी समस्याओं से भटकाने के लिए ‘पुशबैक’ की बात कर रही है, जबकि वास्तव में यह प्रक्रिया अंतरराष्ट्रीय नियमों के बिना संभव ही नहीं है। यह मुद्दा न केवल कानूनी है, बल्कि कूटनीतिक भी है, जिसे सिर्फ नारेबाजी से हल नहीं किया जा सकता।
कानूनी प्रक्रिया की आवश्यकता
अखिल गोगोई ने इस बात पर जोर दिया कि अवैध घुसपैठ का मुद्दा दशकों से असम की सामाजिक संरचना को प्रभावित कर रहा है, लेकिन इसका समाधान शोर मचाने में नहीं, बल्कि कूटनीति में छिपा है। उन्होंने कहा कि कोई व्यक्ति अगर वास्तव में बांग्लादेशी नागरिक है, तो उसे वापस भेजने की एक अंतरराष्ट्रीय प्रक्रिया होती है।
- दोनों देशों के बीच उच्च स्तरीय कूटनीतिक बातचीत अनिवार्य है।
- बिना किसी आधिकारिक समझौते के ‘पुशबैक’ करना अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन है।
- राज्य सरकार ने इस संबंध में अब तक कोई ठोस समझौता बांग्लादेश सरकार के साथ नहीं किया है।
गोगोई के अनुसार, जब तक भारत और बांग्लादेश के बीच नागरिकों के प्रत्यावर्तन (repatriation) को लेकर कोई औपचारिक दस्तावेज या समझौता नहीं होता, तब तक सीएम का यह दावा कि वे घुसपैठियों को वापस भेज देंगे, केवल चुनावी माहौल बनाने जैसा है।
राजनीतिक फायदे की सियासत
गोगोई ने आरोप लगाया कि हिमंत सरकार लगातार ऐसे मुद्दों को हवा देती है जिनका धरातल पर कोई क्रियान्वयन नहीं होता। उन्होंने तर्क दिया कि अवैध घुसपैठ एक गंभीर खतरा है, जिसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए, लेकिन सरकार इसे एक ‘राजनीतिक उपकरण’ की तरह इस्तेमाल कर रही है। उनका साफ कहना है कि जनता को यह समझना होगा कि बिना केंद्रीय हस्तक्षेप और अंतरराष्ट्रीय संधियों के, राज्य सरकार इस समस्या का समाधान नहीं निकाल सकती।
एसटी दर्जे का वादा
असम की राजनीति में छह समुदायों—ताई अहोम, सुतिया, मोरान, मटक, कोच-राजबंशी और चाय जनजातियों—को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने का वादा हमेशा से चुनावी केंद्र में रहा है। अखिल गोगोई ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उनके 2016 के वादों की याद दिलाई।
“2016 के बाद अब 2026 आ गया है। 11 साल का समय बीत जाने के बाद भी इन समुदायों को वह सम्मान और संवैधानिक सुरक्षा नहीं मिली, जिसका वादा देश के प्रधानमंत्री ने किया था। यह वादों से मुकरने जैसा है।”
उन्होंने स्पष्ट किया कि अब किसी और जांच समिति या नई रिपोर्ट की जरूरत नहीं है। 2019 में जो बिल लाया गया था, सरकार उसे ही संसद में दोबारा पेश करके पारित कर सकती है। बार-बार समिति बनाने का मतलब केवल देरी करना है।
सोनम वांगचुक और शिक्षा
अखिल गोगोई ने केवल असम के मुद्दों तक सीमित न रहकर राष्ट्रीय सरोकारों पर भी अपनी बात रखी। लद्दाख के पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल का जिक्र करते हुए उन्होंने केंद्र सरकार की संवेदनहीनता पर सवाल उठाए। गोगोई ने चेतावनी दी कि यदि सरकार समय रहते बातचीत नहीं करती है, तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
इसके अतिरिक्त, उन्होंने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को हटाने की मांग करते हुए देशभर में हो रहे पेपर लीक मामलों पर गहरा रोष जताया। उन्होंने कहा कि:
| मुद्दा | गोगोई का तर्क |
|---|---|
| पेपर लीक | शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह चरमरा चुकी है, जवाबदेही तय हो। |
| एसटी दर्जा | नई समिति नहीं, 2019 वाला पुराना बिल ही काफी है। |
| पुशबैक | कूटनीतिक समझौते के बिना यह केवल राजनीतिक ड्रामा है। |
अखिल गोगोई के ये बयान सीधे तौर पर सरकार की कार्यशैली पर चोट करते हैं। उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया है कि वे आने वाले समय में इन मुद्दों को लेकर न केवल सदन में बल्कि सड़कों पर भी सरकार को घेरने की योजना बना रहे हैं। अब देखना यह है कि क्या सरकार इन सवालों का जवाब देती है या फिर इसे विपक्ष का एक और ‘हमला’ मानकर टाल दिया जाता है।








