नई दिल्ली,अंग भारत। भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान के इतिहास में एक ऐसा पन्ना जुड़ गया है, जिसने भविष्य की दिशा हमेशा के लिए बदल दी है। हैदराबाद के एक प्राइवेट स्टार्टअप ‘स्काईरूट एयरोस्पेस’ ने देश का पहला निजी ऑर्बिटल रॉकेट ‘विक्रम-1’ सफलतापूर्वक अंतरिक्ष की कक्षा में भेजकर एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है। आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से उड़ा यह रॉकेट सिर्फ एक मशीन नहीं, बल्कि भारत की उस ताकत का सबूत है जो आने वाले समय में दुनिया भर के उपग्रह प्रक्षेपण (सैटेलाइट लॉन्चिंग) के खर्च को 30 से 40 फीसदी तक कम कर देगी। अब छोटे देशों और छोटे बजट वाले स्टार्टअप्स को अपने सैटेलाइट अंतरिक्ष में भेजने के लिए भारी-भरकम सरकारी खर्च और लंबी वेटिंग लिस्ट का इंतजार नहीं करना होगा। यह सीधे, सस्ते और आसान तरीके से स्पेस तक पहुँचने का एक नया और भरोसेमंद रास्ता है।
स्पेस सेक्टर में क्रांति
दशकों से हमारे देश में अंतरिक्ष का मतलब सिर्फ इसरो (ISRO) हुआ करता था। इसरो ने हमें मंगलयान और चंद्रयान जैसी महान सफलताएं दीं, लेकिन बढ़ते ग्लोबल मार्केट को देखते हुए सिर्फ एक सरकारी संस्था के भरोसे रहना काफी नहीं था। ठीक वैसे ही जैसे अमेरिका में एलन मस्क की कंपनी ‘स्पेसएक्स’ ने आकर पूरी दुनिया की स्पेस इंडस्ट्री की तस्वीर बदल दी, भारत में वही क्रांति स्काईरूट जैसी युवा कंपनियां लेकर आ रही हैं। आंकड़ों की बात करें तो वर्तमान में पूरी दुनिया की स्पेस इकोनॉमी में भारत की हिस्सेदारी सिर्फ 2 प्रतिशत (लगभग 8 अरब डॉलर) है। भारत सरकार का लक्ष्य इसे साल 2040 तक बढ़ाकर 40 अरब डॉलर से अधिक करना है। यह तभी संभव होगा जब प्राइवेट कंपनियां खुलकर खेलेंगी, विदेशी निवेश देश में आएगा और युवाओं के लिए हाई-टेक नौकरियां पैदा होंगी।
कैसे हुआ सफल लॉन्च?
शनिवार की वह सुबह बेहद तनाव और रोमांच से भरी थी। श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र के कंट्रोल रूम में वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की सांसें थमी हुई थीं। सुबह 11:30 बजे का समय तय था, लेकिन ऐन वक्त पर मौसम के मिजाज और कुछ बारीक तकनीकी संकेतों के चलते उल्टी गिनती (कौंटडाउन) को रोकना पड़ा। इसे विज्ञान की भाषा में ‘होल्ड’ करना कहते हैं, जो किसी बड़े नुकसान से बचने का सबसे समझदारी भरा फैसला होता है। आखिरकार, दोपहर ठीक 12:06 बजे जब विक्रम-1 के इंजनों ने आग उगली, तो पूरी जमीन हिल गई। बिना किसी गड़बड़ी के रॉकेट सीधे आसमान की तरफ बढ़ा और अपने साथ ले गए पेलोड को तय समय में सही जगह स्थापित कर दिया। इस कामयाबी ने कंट्रोल रूम की खामोशी को तालियों की गड़गड़ाहट में बदल दिया।
विक्रम-1 की तकनीक
विक्रम-1 को आज की आधुनिक जरूरतों को ध्यान में रखकर बेहद हल्का और तेज-तर्रार बनाया गया है। जहां पुराने भारी रॉकेटों को असेंबल करने में महीनों लग जाते थे, इसे कुछ ही दिनों में तैयार किया जा सकता है। इसकी तकनीकी बारीकियों को आप इस आसान तालिका से समझ सकते हैं:
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| कुल लंबाई और आकार | 20 मीटर लंबा और 1.7 मीटर चौड़ा ढांचा |
| वजन ले जाने की क्षमता | निचली कक्षा (LEO) में 350 किलोग्राम तक |
| रॉकेट के चरण | 4-चरणों वाला सिस्टम (3 ठोस ईंधन और 1 तरल ईंधन) |
| बनावट का मैटेरियल | हल्के और मजबूत कार्बन कंपोजिट से तैयार |
| इंजन की तकनीक | अत्याधुनिक 3D-प्रिंटेड लिक्विड इंजन (रमन-2) |
इस रॉकेट की सबसे अनोखी बात इसका ढांचा है। अमूमन रॉकेट बनाने में भारी धातुओं जैसे एल्युमीनियम का उपयोग होता है, जिससे उसका खुद का वजन बढ़ जाता है। लेकिन स्काईरूट ने इसमें कार्बन कंपोजिट का इस्तेमाल किया है। यह धातु से कई गुना मजबूत होने के साथ-साथ वजन में बेहद हल्का होता है। वजन कम होने का सीधा फायदा यह है कि रॉकेट को उड़ान भरने के लिए कम ईंधन की जरूरत होती है, जिससे लॉन्चिंग का खर्च बहुत कम हो जाता है।
3D-प्रिंटेड इंजन का कमाल
विक्रम-1 के आखिरी चरण में जो ‘रमन-2’ इंजन लगा है, वह नई तकनीक का एक बेहतरीन उदाहरण है। इसे पूरी तरह 3D-प्रिंटिंग के जरिए बनाया गया है। पहले पारंपरिक इंजनों को बनाने के लिए सैकड़ों छोटे-छोटे पुर्जों को आपस में वेल्डिंग करके जोड़ना पड़ता था, जिसमें लीक होने या खराबी आने का खतरा हमेशा बना रहता था। 3D-प्रिंटिंग ने इस झंझट को खत्म कर दिया है। अब पूरा इंजन एक ही हिस्से के रूप में प्रिंट होकर बाहर आता है। इससे न सिर्फ मजबूती बढ़ती है, बल्कि जिस इंजन को बनाने में महीनों लगते थे, वह अब कुछ ही दिनों में तैयार हो जाता है।
सरकारी नीतियां और सहयोग
इस शानदार कामयाबी के बाद देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद स्काईरूट के संस्थापकों, पवन कुमार चंदना और नागा भरत डाका से बात कर उन्हें बधाई दी। वास्तव में, इस सफलता के पीछे सरकार की नई और खुली नीतियों का बहुत बड़ा योगदान है।
“स्काईरूट की यह सफलता देश के युवाओं के बड़े सपनों का परिणाम है। एक समय था जब लोग भारतीय निजी क्षेत्र की काबिलियत पर सवाल उठाते थे, लेकिन आज हमारे युवाओं ने साबित कर दिया है कि वे दुनिया के बड़े-बड़े देशों को टक्कर दे सकते हैं। यह असली आत्मनिर्भर भारत है।”
— नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री
सरकार ने ‘इन-स्पेस’ (IN-SPACe) नाम की एक नोडल एजेंसी बनाई है, जिसने प्राइवेट कंपनियों के लिए इसरो की बड़ी-बड़ी प्रयोगशालाओं और लॉन्च पैड्स के दरवाजे खोल दिए हैं। पहले जो इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करना किसी भी स्टार्टअप के बजट के बाहर था, वह अब सरकार के सहयोग से बेहद आसान हो गया है।
छोटा सैटेलाइट बाजार
आजकल दुनिया भर में छोटे सैटेलाइट्स की मांग बहुत बढ़ गई है। चाहे इंटरनेट की कनेक्टिविटी हो, मौसम की भविष्यवाणी हो या फिर फसलों की निगरानी, हर काम के लिए छोटे सैटेलाइट्स छोड़े जा रहे हैं। पहले इन कंपनियों को बड़े रॉकेटों में बची हुई जगह (राइड-शेयरिंग) के लिए इंतजार करना पड़ता था, जो किसी बस की सवारी जैसा था।
- मनचाही टाइमिंग: अब कंपनियां किसी और पर निर्भर रहे बिना अपने समय के हिसाब से लॉन्चिंग की तारीख खुद तय कर सकती हैं।
- सटीक लोकेशन: यह रॉकेट आपके सैटेलाइट को ठीक उसी जगह छोड़ेगा, जिसकी आपने मांग की थी।
- सस्ते दाम: बड़े रॉकेट का पूरा किराया देने के बजाय अब आप सिर्फ अपने छोटे सैटेलाइट के वजन के हिसाब से ही भुगतान करेंगे।
विक्रम-1 ने छोटे सैटेलाइट बाजार को एक ‘स्पेस टैक्सी’ दे दी है। अब कोई भी कंपनी अपनी जरूरत के हिसाब से सीधे बुकिंग करके अपना काम करवा सकती है, जिससे भारत पूरी दुनिया के लिए एक बड़ा कमर्शियल स्पेस हब बनकर उभरेगा।
भारतीय स्टार्टअप्स की राह
स्काईरूट की इस ऐतिहासिक जीत ने भारत के दूसरे स्पेस स्टार्टअप्स के लिए हौसले की एक नई उड़ान दी है। अब अग्निकुल कॉस्मॉस जैसी कंपनियां भी अपने नए और अनूठे रॉकेटों के साथ तैयार खड़ी हैं, तो वहीं पिक्सल जैसी सैटेलाइट कंपनियां अंतरिक्ष से धरती की सबसे साफ तस्वीरें लेने वाले नेटवर्क को मजबूत कर रही हैं। भारत अब सिर्फ दूसरों के भरोसे उपग्रह भेजने वाला देश नहीं रहा, बल्कि खुद दुनिया का सबसे सुरक्षित, सस्ता और भरोसेमंद स्पेस पार्टनर बन चुका है। आने वाले समय में दुनिया की कई बड़ी टेक कंपनियां अपने सैटेलाइट लॉन्च करने के लिए भारत के दरवाजे खटखटाती नजर आएंगी।








