रांची,अंग भारत। झारखंड राज्य सूचना आयोग में हाल ही में की गई नियुक्तियों की सिफारिशों ने राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी है। भाकपा माले के राज्य सचिव मनोज भक्त ने सीधे तौर पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को पत्र लिखकर इन नियुक्तियों को वापस लेने की मांग की है। उनका तर्क है कि ये सिफारिशें योग्यता के बजाय पूरी तरह से राजनीतिक हितों से प्रेरित हैं, जो सूचना आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की गरिमा के खिलाफ है। मनोज भक्त ने मुख्यमंत्री से आग्रह किया है कि वे इन नामों को रद्द कर एक पारदर्शी और निष्पक्ष चयन प्रक्रिया को अपनाएं, ताकि आयोग की विश्वसनीयता बनी रहे।
आयोग की गिरती विश्वसनीयता
सूचना आयोग का काम आम नागरिकों को सरकारी कामकाज में पारदर्शिता का अधिकार देना है। लेकिन झारखंड में स्थिति इसके उलट नजर आ रही है। लंबे समय से मुख्य सूचना आयुक्त और अन्य आयुक्तों के पद खाली पड़े थे, जिसके कारण हज़ारों आरटीआई आवेदन लंबित पड़े हैं। जब सरकार ने अंततः नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू की, तो वह भी विवादों के घेरे में आ गई। मनोज भक्त के अनुसार, यदि इन महत्वपूर्ण पदों पर केवल राजनीतिक कार्यकर्ताओं को बैठा दिया जाएगा, तो आयोग अपनी स्वायत्तता खो देगा।
क्यों है विरोध का कारण
मनोज भक्त ने स्पष्ट किया है कि सूचना आयोग किसी भी सत्ताधारी दल का राजनीतिक कार्यालय नहीं हो सकता। उनके द्वारा उठाए गए मुख्य बिंदुओं में शामिल हैं:
- योग्यता की अनदेखी: आयोग के लिए उन लोगों के नाम भेजे गए हैं जिनका आरटीआई या कानूनी मामलों से कोई सीधा अनुभव नहीं है।
- पारदर्शिता का अभाव: चयन प्रक्रिया को गुप्त रखा गया, जिससे आम जनता का विश्वास कम हुआ है।
- राजनीतिक हस्तक्षेप: सरकार पर आरोप है कि उसने प्रशासनिक दक्षता के बजाय पार्टी वफादारों को पुरस्कृत करने की नीति अपनाई है।
भ्रष्टाचार पर बड़ा प्रहार
झारखंड जैसे राज्य में, जहाँ जमीन घोटाले, खनिज लूट और सरकारी भ्रष्टाचार के मामले अक्सर सामने आते हैं, वहां सूचना आयोग की भूमिका एक प्रहरी (watchdog) की तरह होती है। यदि आयोग में बैठने वाले अधिकारी ही राजनीतिक दल के प्रति जवाबदेह होंगे, तो आरटीआई कार्यकर्ताओं और आम लोगों की शिकायतों का निष्पक्ष निवारण कैसे होगा? मनोज भक्त ने इस ओर इशारा किया कि आयोग के निष्क्रिय होने से माफियाओं और भ्रष्ट अधिकारियों का मनोबल बढ़ता है।
चयन के ठोस मापदंड
मनोज भक्त ने सरकार को एक व्यावहारिक सुझाव दिया है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि ऐसे व्यक्ति होने चाहिए जो निम्नलिखित क्षेत्रों में निपुण हों:
| क्षेत्र | अनुभव की आवश्यकता |
|---|---|
| विधि एवं न्याय | कानूनी बारीकियों की समझ |
| पत्रकारिता | खोजी और निष्पक्ष दृष्टि |
| समाज सेवा | जनहित के मुद्दों से सीधा जुड़ाव |
भाजपा और सरकार पर सवाल
इस विवाद में केवल सत्ता पक्ष ही नहीं, बल्कि मुख्य विपक्षी दल भाजपा पर भी सवाल उठे हैं। मनोज भक्त ने तंज कसते हुए कहा कि भाजपा का इन नियुक्तियों में विशेष हित है, क्योंकि अक्सर सत्ता परिवर्तन के बाद ऐसी नियुक्तियों में आपसी समझौते देखे जाते हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से अपील की है कि वे इस ‘समझौतावादी राजनीति’ से ऊपर उठें। यदि सरकार वास्तव में लोकतांत्रिक मूल्यों को मानती है, तो उसे एक ऐसी चयन समिति बनानी चाहिए जिसमें नागरिक समाज के प्रतिनिधि भी शामिल हों।
जनता का क्या होगा
यदि नियुक्तियों में योग्यता को पीछे छोड़कर केवल राजनीतिक स्वार्थ को देखा जाता है, तो इसके गंभीर परिणाम होंगे। पहली बात, सूचना आयोग के पास आने वाले मामलों की सुनवाई में देरी होगी। दूसरी, सरकारी अधिकारी जनता के सवालों को नजरअंदाज करने लगेंगे क्योंकि उन्हें पता होगा कि ऊपर बैठा आयोग उनके साथ खड़ा है। यही कारण है कि यह सिर्फ एक राजनीतिक बयानबाजी का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर आम आदमी के अधिकारों से जुड़ा हुआ है।
सुधार के लिए जरूरी कदम
आगामी दिनों में सरकार का रुख यह तय करेगा कि झारखंड में सूचना के अधिकार की दिशा क्या होगी। नागरिक समाज की ओर से लगातार यह मांग की जा रही है कि:
- नियुक्ति प्रक्रिया को सार्वजनिक किया जाए।
- उम्मीदवारों के चयन का आधार ‘पब्लिक डोमेन’ में रखा जाए।
- नियुक्ति पैनल में एक निष्पक्ष कानूनी विशेषज्ञ को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए।
अंततः, सूचना आयोग की ताकत उसके सदस्यों की निष्पक्षता में निहित है। यदि सरकार ने समय रहते सुध नहीं ली, तो यह संस्थान केवल एक सरकारी दफ्तर बनकर रह जाएगा, जो न तो किसी की मदद कर पाएगा और न ही किसी भ्रष्टाचार को उजागर कर पाएगा।








