फुल्लीडुमर (बांका),अंग भारत। प्रखंड क्षेत्र के कैथा पंचायत अंतर्गत वार्ड संख्या एक स्थित कनौदी गांव में रविवार को ग्रामीणों का आक्रोश सड़कों पर उतर आया। डेढ़ किलोमीटर लंबी कच्ची सड़क के कारण हो रही भारी परेशानियों से तंग आकर ग्रामीणों ने “सड़क नहीं तो वोट नहीं” के नारों के साथ जोरदार प्रदर्शन किया। दोपहर होते-होते गांव के लोग अपने हाथों में तख्तियां और बैनर लेकर जमा हो गए और प्रशासन के खिलाफ अपनी नाराजगी जाहिर की। यह सिर्फ एक प्रदर्शन नहीं है, बल्कि उस उपेक्षा के खिलाफ एक आवाज है जो वर्षों से इन 50 परिवारों को विकास की मुख्यधारा से दूर रखे हुए है।
बुनियादी सुविधाओं का अभाव
कनौदी गांव के निवासियों का कहना है कि कागजों पर तो विकास की ढेरों बातें होती हैं, लेकिन जमीन पर स्थिति बिल्कुल उलट है। पंचायत के भीतर पीसीसी सड़कें तो बन गईं, मगर गांव को मुख्य सड़क से जोड़ने वाली वह डेढ़ किलोमीटर की जीवन रेखा आज भी धूल और कीचड़ में तब्दील है। जब बारिश का मौसम आता है, तो यह रास्ता चलने के लायक नहीं रहता। घुटनों तक कीचड़ और बड़े-बड़े गड्ढे किसी के लिए भी एक बड़ी चुनौती बन जाते हैं, खासकर छोटे बच्चों और बुजुर्गों के लिए।
मरीजों की बदतर हालत
सबसे ज्यादा दुखद स्थिति तब होती है जब गांव में कोई बीमार पड़ जाता है। एम्बुलेंस का गांव तक पहुंचना तो दूर, ई-रिक्शा या ऑटो भी इस कच्ची सड़क पर जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। ऐसी स्थिति में ग्रामीणों को मरीजों को खाट पर लादकर मुख्य सड़क तक लाना पड़ता है। कल्पना कीजिए उस स्थिति की, जब किसी मरीज को नाजुक हालत में पगडंडियों से गुजरना पड़ता हो। क्या यह 21वीं सदी के भारत के लिए एक गंभीर सवाल नहीं है?
प्रदर्शन में शामिल लोग
इस विरोध प्रदर्शन में गांव के दर्जनों लोग शामिल थे। प्रदर्शन करने वाले प्रमुख व्यक्तियों में शामिल रहे:
- गणेश राय, प्रताप राय, पंचानंद, और उपेंद्र
- सुभाष, संजीत, दीपक, रंजीत और पंकज
- गुलशन, रमेश, विक्की, सोनू और नितेश
- रामानंद, प्रमोद, बबलू, राजीव और इंद्रदेव
प्रशासन से खाली वादे
ग्रामीणों का आरोप है कि पिछले कई वर्षों से वे स्थानीय जनप्रतिनिधियों और ब्लॉक कार्यालय के चक्कर काट रहे हैं। हर चुनाव से पहले बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं कि सड़क बन जाएगी, लेकिन चुनाव बीतते ही ये दावे ठंडे बस्ते में चले जाते हैं। अधिकारी आते हैं, मौका मुआयना करते हैं और फिर आश्वासन देकर चले जाते हैं। लेकिन सड़क पर एक ईंट तक नहीं रखी गई। यह सिलसिला अब ग्रामीणों के सब्र की सीमा पार कर चुका है।
वोट बहिष्कार का संकल्प
इस बार ग्रामीणों ने एक कड़ा रुख अपनाया है। उनका साफ कहना है कि जब तक सड़क का निर्माण कार्य शुरू नहीं होता, वे आने वाले चुनावों में मतदान प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बनेंगे। यह विरोध प्रशासन को एक सीधा संदेश है: लोकतंत्र में नागरिक अपनी बुनियादी सुविधाओं के हकदार हैं और यदि सरकारें इसे पूरा नहीं कर सकतीं, तो वे जनता का विश्वास खोने के लिए तैयार रहें।
समाधान की जरूरत
कनौदी गांव की इस समस्या का समाधान केवल एक सड़क बनाना नहीं, बल्कि स्थानीय प्रशासन की जवाबदेही तय करना है। ग्रामीण इलाकों में छोटे-छोटे संपर्क पथ विकास की रीढ़ होते हैं। अगर सरकार सच में गांव का विकास चाहती है, तो उन्हें तत्काल प्रभाव से इस डेढ़ किलोमीटर की सड़क को पक्का करने की योजना बनानी चाहिए। जनता सिर्फ सड़क नहीं मांग रही, वे सम्मान और सुरक्षित भविष्य का रास्ता मांग रहे हैं।
“जब तक हमारे गांव के बच्चे स्कूल जाने के लिए और मरीज अस्पताल पहुंचने के लिए सुरक्षित रास्ता नहीं पाएंगे, तब तक हमारे लिए लोकतंत्र का कोई अर्थ नहीं है।” – स्थानीय ग्रामीण
अब गेंद प्रशासन के पाले में है। क्या बांका जिले के अधिकारी इस सुदूर गांव की पीड़ा को समझेंगे, या फिर ग्रामीणों को मजबूरन अपनी लोकतांत्रिक ताकत का प्रदर्शन करना पड़ेगा? यह आने वाला समय ही बताएगा, लेकिन एक बात तय है—अब कनौदी के लोग आश्वासन से संतुष्ट होने वाले नहीं हैं।







