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नलजल योजना फेल, महादलित बस्ती में पानी को तरसे लोग

शंभूगंज (बांका)/अंग भारत। प्रखंड के भरतशिला पंचायत में करोड़ों की लागत से शुरू की गई ‘हर घर नल का जल’ योजना आज केवल कागजों और सूखे नलों तक सीमित रह गई है, जिससे महादलित बस्ती समेत आधा दर्जन वार्डों में हाहाकार मचा हुआ है। ग्रामीणों की मानें तो सरकारी महकमे की लापरवाही के कारण बीते तीन वर्षों से उनके नलों में एक बूंद पानी नहीं आया है, जिसके चलते लोग भीषण जल संकट का सामना करने को मजबूर हैं। प्रदर्शन कर रहे स्थानीय निवासियों ने अब साफ कर दिया है कि यदि जल्द ही जलापूर्ति बहाल नहीं की गई, तो वे प्रखंड मुख्यालय को घेरने से पीछे नहीं हटेंगे।

योजना का जमीनी सच

भरतशिला पंचायत में नल-जल योजना की विफलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां के 15 वार्डों में से कम से कम छह वार्डों में स्थिति पूरी तरह बदतर है। विशेषकर वार्ड संख्या 2, 5, 10 और 11 के निवासियों के लिए नल-जल योजना एक ‘सफेद हाथी’ साबित हुई है। पीएचईडी विभाग द्वारा निर्मित जलमीनारें खड़ी तो हैं, लेकिन उनमें पानी का नामोनिशान नहीं है।

महादलित बस्ती का दर्द

वार्ड संख्या 2 में स्थिति सबसे अधिक दयनीय है, जहां महादलित समुदाय के लोग निवास करते हैं। पूरण दास, अभिषेक दास, गुड्डू दास और हरि किशोर दास जैसे स्थानीय निवासियों ने बताया कि तीन साल पहले जब जलमीनार का निर्माण हुआ था, तब उन्हें लगा था कि अब पानी के लिए दर-दर भटकने से मुक्ति मिल जाएगी। लेकिन हकीकत में आज भी उन्हें:

  • दूषित कुओं के पानी पर निर्भर रहना पड़ रहा है।
  • पुराने और खराब हो चुके चापाकल से गुजारा करना पड़ता है।
  • पानी की अशुद्धि के कारण आए दिन स्वास्थ्य समस्याओं से जूझना पड़ रहा है।

महिलाएं और बच्चों की मुसीबत

गर्मी का मौसम आते ही ग्रामीणों के लिए स्थिति जानलेवा हो जाती है। जब स्थानीय जलस्रोत सूखने लगते हैं, तो पानी की एक बाल्टी के लिए महिलाओं को मीलों दूर पैदल चलना पड़ता है। इस पूरी कवायद में घर की महिलाओं और बच्चों का पूरा दिन बर्बाद हो जाता है। बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य दोनों पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। पुरुष वर्ग को मजदूरी छोड़कर पानी ढोने के काम में जुटना पड़ता है, जिससे परिवार की आर्थिक स्थिति भी चरमरा गई है।

अधिकारियों के खोखले वादे

ग्रामीणों का कहना है कि वे बीते तीन वर्षों से अधिकारियों और जन प्रतिनिधियों के चक्कर काट रहे हैं। हर बार उन्हें आश्वासन की घुट्टी पिलाई जाती है कि “अगले हफ्ते तक पानी आ जाएगा” या “मोटर जल गई है, उसे बदल देंगे।” लेकिन इन आश्वासनों के अलावा उन्हें जमीन पर कोई ठोस काम देखने को नहीं मिला है। पीएचईडी विभाग के कनीय अभियंता सुबोध कुमार ने भी हाल ही में फिर से आश्वासन दिया है, लेकिन ग्रामीणों का सब्र अब जवाब दे चुका है।

क्यों विफल हुई योजना?

स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि नल-जल योजना के रखरखाव में भारी कोताही बरती गई है। यदि हम इसे तकनीकी दृष्टि से देखें, तो विफलता के पीछे ये प्रमुख कारण हो सकते हैं:

  • अयोग्य प्रबंधन: वार्ड स्तर पर बनी समितियों के पास संचालन का कोई ठोस अनुभव नहीं है।
  • रखरखाव का अभाव: छोटी-मोटी तकनीकी खराबी को समय पर ठीक नहीं किया गया, जिससे छोटी समस्या बड़ी बन गई।
  • मॉनिटरिंग की कमी: पीएचईडी और स्थानीय प्रशासन द्वारा नियमित रूप से भौतिक सत्यापन नहीं किया गया।

अब आगे का रास्ता

प्रदर्शनकारियों ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया है कि अब उन्हें आश्वासन नहीं, बल्कि उनके नलों में बहता हुआ पानी चाहिए। यदि संबंधित विभाग जल्द ही पंप हाउस की मरम्मत और पाइपलाइन की जांच नहीं करता है, तो वे आंदोलन को और तेज करेंगे। बांका जिले के इस सुदूर क्षेत्र में एक मूलभूत आवश्यकता के लिए हो रहा यह संघर्ष, सरकार की लोक कल्याणकारी योजनाओं की जमीनी हकीकत पर बड़े सवाल खड़े करता है।

“पानी जीवन की सबसे बुनियादी जरूरत है। यदि तीन साल बाद भी हमें कुओं का गंदा पानी पीना पड़ रहा है, तो इस विकास का क्या औचित्य? हम केवल अपने हक का पानी मांग रहे हैं।” – स्थानीय ग्रामीण

अब देखना यह है कि क्या प्रशासन महादलित बस्ती की इस पीड़ा को गंभीरता से लेता है, या ग्रामीणों को एक बार फिर से खाली वादों के सहारे छोड़ दिया जाएगा।

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अंग भारत • रिपोर्टर

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