त्रिवेणीगंज (सुपौल)/अंग भारत। शिक्षा के व्यवसायीकरण और घटते रोजगार के अवसरों के खिलाफ बिहार के छात्रों में उबाल साफ देखा जा सकता है। हाल ही में सुपौल के अनुपलाल यादव महाविद्यालय में आयोजित ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) के दूसरे जिला सम्मेलन में छात्रों ने एक स्पष्ट चेतावनी दी है: यदि शिक्षा की गरिमा और युवाओं के रोजगार को सुरक्षित नहीं किया गया, तो राज्यव्यापी बड़े आंदोलनों का बिगुल फूंका जाएगा। यह सम्मेलन केवल एक सांगठनिक बैठक नहीं, बल्कि उन लाखों छात्रों की आवाज बना है जो डिग्री लेकर भी बेरोजगारी के दंश को झेलने पर मजबूर हैं।
बदलती शिक्षा व्यवस्था
सम्मेलन में मुख्य वक्ता और आइसा के राष्ट्रीय महासचिव प्रसेनजीत कुमार ने मौजूदा शिक्षा ढांचे की धज्जियां उड़ाते हुए कहा कि शिक्षा अब ज्ञान का माध्यम न रहकर मुनाफे का जरिया बन चुकी है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि देश की वर्तमान नीतियां आम छात्रों के हितों के खिलाफ हैं।
- सरकारी संस्थानों को जानबूझकर कमजोर किया जा रहा है ताकि निजी संस्थानों को बढ़ावा मिले।
- शिक्षा के बजट में कटौती करना युवाओं के उज्ज्वल भविष्य के साथ खिलवाड़ है।
- सामाजिक न्याय के दायरे को सिकोड़ने की कोशिशें हो रही हैं।
नई शिक्षा नीति की चुनौतियां
नई शिक्षा नीति 2020 पर तीखे सवाल उठाते हुए विशेषज्ञों ने इसे ‘छात्र विरोधी’ करार दिया है। सम्मेलन में स्पष्ट किया गया कि यह नीति शिक्षा को और अधिक महंगा बनाएगी, जिससे ग्रामीण पृष्ठभूमि के छात्रों के लिए उच्च शिक्षा का सपना और दूर हो जाएगा। बिहार के संदर्भ में, डिग्री कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की बदहाल स्थिति किसी से छिपी नहीं है। छात्रों ने मांग की कि मूलभूत ढांचा सुधारने के बजाय नई नीतियों के नाम पर छलावा बंद होना चाहिए।
पेपर लीक का मुद्दा
बिहार के छात्रों ने सबसे ज्यादा आक्रोश पेपर लीक जैसी घटनाओं पर जताया। राज्य में बार-बार परीक्षाओं का रद्द होना और परीक्षाओं में देरी से छात्रों के कीमती साल बर्बाद हो रहे हैं। सम्मेलन में इस बात पर चर्चा हुई कि एक अदद सरकारी नौकरी के लिए छात्रों को जिस अग्निपरीक्षा से गुजरना पड़ता है, उसकी जिम्मेदारी आखिर कौन लेगा?
आंदोलन और एकजुटता
रोहित वेमुला प्रकरण के बाद छात्रों के अधिकार और सुरक्षा के लिए जो नियम बने थे, उन्हें जमीनी हकीकत में बदलने की मांग फिर से तेज हो गई है। आइसा ने स्पष्ट किया है कि केवल सम्मेलन तक सीमित नहीं रहा जाएगा, बल्कि हर कॉलेज और विश्वविद्यालय में जाकर छात्रों को उनके हक के प्रति जागरूक किया जाएगा।
“जब शिक्षा महंगी होगी और रोजगार की गारंटी खत्म हो जाएगी, तो देश का युवा सड़क पर उतरने को मजबूर होगा। हम अधिकार मांग रहे हैं, भीख नहीं।” – प्रसेनजीत कुमार, राष्ट्रीय महासचिव, आइसा।
नई जिला कमेटी
सांगठनिक मजबूती के लिए 17 सदस्यीय नई जिला कमेटी का चयन किया गया है, जो आने वाले समय में छात्र हितों के लिए सड़क से सदन तक लड़ाई लड़ेगी। नई टीम में प्रमुख जिम्मेदारियां इस प्रकार हैं:
| पद | नाम |
|---|---|
| जिला सचिव | संतोष कुमार सियोटा |
| जिलाध्यक्ष | रामाशीष |
| जिला उपाध्यक्ष | सुनील कुमार सरदार, अंकू आनंद, अभिनव आनंद |
| संयुक्त सचिव | शशिकांत कुमार, अभिनंदन कुमार |
भविष्य की रूपरेखा
इस सम्मेलन ने सुपौल जिले की राजनीति में छात्र-युवाओं की सक्रियता को पुनर्जीवित कर दिया है। माले जिला सचिव जयनारायण यादव और अन्य वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी ने इस आंदोलन को और अधिक गंभीरता प्रदान की है। अब देखने वाली बात यह होगी कि सरकार इन छात्रों की मांगों पर कितना ध्यान देती है। एक बात तय है—बिहार का छात्र अब अपनी शिक्षा और भविष्य के साथ कोई समझौता करने के मूड में नहीं है। आने वाले महीनों में राज्य में कई और छात्र सम्मेलन और आंदोलनों की रूपरेखा तय की जा रही है, जो शिक्षा बजट और नियुक्ति प्रक्रियाओं में पारदर्शिता की मांग करेंगे।







