इस्लामाबाद,अंग भारत। पाकिस्तान की मध्यस्थता में अमेरिका और ईरान के बीच चल रही शांति वार्ता अभी किसी ठोस नतीजे तक नहीं पहुंच पाई है। इस्लामाबाद में शनिवार दोपहर शुरू हुआ यह मंथन लगातार 15 घंटों तक चला, लेकिन लेबनान की स्थिति और होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे संवेदनशील मुद्दों पर गतिरोध बरकरार है। हालांकि, बातचीत पूरी तरह विफल नहीं हुई है; दोनों पक्षों ने रविवार को चर्चा का एक और दौर शुरू करने पर सहमति जता दी है। इस घटनाक्रम को 1979 की ईरानी क्रांति के बाद दोनों देशों के बीच हुआ अब तक का सबसे उच्च-स्तरीय संवाद माना जा रहा है।
अटकी वार्ता के मुख्य कारण
वार्ता के दौरान सबसे बड़ी बाधा लेबनान का मौजूदा संकट और होर्मुज जलडमरूमध्य का नियंत्रण बना हुआ है। अमेरिका का रुख सख्त है; वाशिंगटन स्पष्ट कर चुका है कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए होर्मुज मार्ग का निर्बाध खुलना पहली प्राथमिकता है। दूसरी तरफ, ईरान इसे अपने राष्ट्रीय हितों के साथ समझौता करने के रूप में देख रहा है।
- अमेरिकी मांग: होर्मुज जलडमरूमध्य में सुरक्षित आवाजाही की गारंटी।
- ईरानी रुख: अपनी सुरक्षा नीतियों और क्षेत्रीय संप्रभुता को लेकर कोई भी रियायत देने से इनकार।
- क्षेत्रीय तनाव: लेबनान में हिजबुल्लाह की सक्रियता पर दोनों देशों के अलग-अलग नजरिए।
15 घंटे की मैराथन बैठक
इस्लामाबाद के सेरेना होटल में आयोजित यह बैठक शनिवार की दोपहर को शुरू हुई और रविवार तड़के 3:40 बजे तक चलती रही। दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडल ने बारी-बारी से मसौदों का आदान-प्रदान किया। बंद कमरों में हुई इस लंबी चर्चा के दौरान अपने-अपने शीर्ष नेतृत्व के साथ भी संपर्क बना रहा। मध्यस्थ की भूमिका में मौजूद पाकिस्तान ने एक ऐसा ढांचा तैयार करने की कोशिश की है जिससे दोनों देश मध्य मार्ग चुन सकें। रविवार की अगली बैठक इसी रणनीति का अगला चरण होगी।
पाकिस्तान की कूटनीतिक सक्रियता
इस वार्ता में पाकिस्तान की मौजूदगी महज मेजबान देश तक सीमित नहीं है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ, सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर और उप विदेश मंत्री इशाक डार पर्दे के पीछे से इस प्रक्रिया को आगे बढ़ा रहे हैं। कूटनीतिक हलकों में इसे पाकिस्तान की विदेश नीति की एक बड़ी परीक्षा के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए पाकिस्तानी अधिकारियों ने अभी तक कोई भी औपचारिक बयान देने से परहेज किया है।
युद्ध और ऊर्जा सुरक्षा
इस वार्ता के पीछे केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं है, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था भी दांव पर है। पश्चिम एशिया का तनाव सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों पर डाल रहा है।
“यदि यह वार्ता किसी स्थायी शांति समझौते पर नहीं पहुंचती है, तो सैन्य विकल्पों का इस्तेमाल करना पड़ सकता है।” – ऐसी चेतावनी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा पहले ही दी जा चुकी है।
वैश्विक बाजार इस समय होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए होने वाली तेल आपूर्ति को लेकर बेहद संवेदनशील है। अगर वहां संघर्ष बढ़ता है, तो महंगाई का असर सीधे आम नागरिकों की जेब पर पड़ेगा।
इजराइल और लेबनान का रुख
वार्ता के समानांतर इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भी एक शांति प्रस्ताव की संभावनाओं पर बात की है। उनका कहना है कि वे लेबनान के साथ समझौता करने को तैयार हैं, लेकिन यह शर्त हिजबुल्लाह की सैन्य ताकत को पूरी तरह खत्म करने पर टिकी है। जमीन पर स्थिति अभी भी तनावपूर्ण है, जहां इजराइली सेना के हालिया हमलों में हिजबुल्लाह के सैकड़ों ठिकानों को निशाना बनाए जाने की खबरें आई हैं।
क्या उम्मीद की जा सकती है?
रविवार के दौर में दोनों पक्षों के बीच क्या निकलकर आता है, यह आने वाले कुछ ही घंटों में स्पष्ट हो जाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि लेबनान और होर्मुज पर कोई तकनीकी समाधान निकल आता है, तो यह मध्य-पूर्व की पूरी तस्वीर बदल सकता है। फिलहाल, दुनिया भर की नजरें इस्लामाबाद के सेरेना होटल पर टिकी हैं, जहां यह कूटनीतिक जंग शांति वार्ता में बदलने की कोशिश कर रही है।








