धोरैया/बांका/अंगभारत। धोरैया प्रखंड क्षेत्र के रणगांव स्थित मां दुर्गा का मंदिर आस्था, श्रद्धा और प्राचीन परंपराओं का अनूठा केंद्र है। ग्रामीण बताते है 150 वर्षों से अधिक पुराने इस मंदिर का निर्माण किनवार राजपूत परिवार के पूर्वज एवं तत्कालीन जमींदार बाबू उमराव सिंह ने कुलदेवी मंदिर के रूप में कराया था। तब से लेकर आज तक ग्रामीणों और आसपास के गांवों के श्रद्धालु पूरी आस्था के साथ यहां दुर्गापूजा का आयोजन करते आ रहे हैं। इस मंदिर की पूजा-पद्धति अन्य मंदिरों से अलग है, जो इसकी विशिष्ट पहचान बनी हुई है। रनगांव के दुर्गा मंदिर में नवरात्र के दौरान केवल पांच दिनों तक पूजा-अर्चना की जाती है। पंचमी तिथि को कलश स्थापना के साथ पूजा का शुभारंभ होता है। इस दिन किनवार वंश के सबसे बुजुर्ग पुरुष की धर्मपत्नी द्वारा मां दुर्गा का सिंदूर से शृंगार किया जाता है। मान्यता है कि पूरे वर्ष में माता का शृंगार केवल पंचमी पूजा के दिन ही किया जाता है। इस परंपरा का निर्वहन आज भी पूरी श्रद्धा के साथ किया जा रहा है। इस मंदिर की सबसे खास विशेषता यह है कि पांच दिनों तक चलने वाली पूजा के दौरान मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित नहीं की जाती है। यहां केवल कलश की स्थापना कर विधि-विधान से माता की आराधना की जाती है। इतना ही नहीं, आज के आधुनिक दौर में भी मां का आह्वान और पूजन पारंपरिक हस्तलिखित पुस्तिका में दर्ज मंत्रों के माध्यम से किया जाता है। वर्षों पुरानी इस धार्मिक परंपरा को ग्रामीणों ने अब तक संजोकर रखा है। महाष्टमी के दिन मंदिर में विशेष धार्मिक उत्साह देखने को मिलता है। आसपास के गांवों के साथ दूर-दराज के क्षेत्रों से भी श्रद्धालु माता को भोग अर्पित करने और अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए पूजा-अर्चना करने पहुंचते हैं। देर रात तक मंदिर में भक्तों का आना-जाना लगा रहता है। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि सच्चे मन और पूरी श्रद्धा से मां के दरबार में प्रार्थना करने वाले भक्तों पर माता अपनी कृपा बरसाती हैं। दशमी को चिर नदी में विसर्जित किया जाता है कलश पांच दिनों तक चलने वाली पूजा नवमी तिथि को संपन्न होती है। इसके बाद विजयादशमी के दिन ग्रामीण गाजे-बाजे, ढोल-मृदंग और पारंपरिक उत्साह के साथ मां के कलश को स्थानीय चिर नदी में प्रवाहित करते हैं। इस दौरान पूरे गांव में भक्तिमय माहौल रहता है।आधुनिकता और दिखावे के बढ़ते दौर में भी रनगांव के ग्रामीणों ने अपनी प्राचीन धार्मिक परंपरा, सादगी और सामूहिक श्रद्धा को कायम रखा है। यही वजह है कि यह मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थल नहीं, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत और पीढ़ियों से चली आ रही आस्था का प्रतीक भी है।








