मुरलीगंज, मधेपुरा,अंग भारत| शक्ति की आराधना का महापर्व शारदीय नवरात्र रविवार से शुरू हो गया है। नवरात्र के आगमन के साथ ही मुरलीगंज शहर का सार्वजनिक दुर्गा मंदिर भक्तिमय माहौल में रंगने लगा है। मां भगवती के दर्शन और पूजा-अर्चना को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह है। शहर के हृदयस्थल में स्थित यह मंदिर वर्षों से लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। मान्यता है कि सच्चे मन से मां दुर्गा की आराधना करने वाले भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं।मुरलीगंज प्रखंड के विभिन्न गांवों के अलावा दूर-दराज के क्षेत्रों से भी श्रद्धालु यहां पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। नवरात्र के दौरान मंदिर में विशेष चहल-पहल रहती है। भव्य मंदिर और परिसर के चारों ओर लगे अशोक के वृक्ष इसकी सुंदरता में चार चांद लगाते हैं। धार्मिक आस्था के साथ प्राकृतिक सौंदर्य भी इस मंदिर को विशिष्ट पहचान प्रदान करता है।स्थानीय जानकारों के अनुसार, सार्वजनिक दुर्गा स्थान में मां भगवती की प्रतिमा स्थापना का इतिहास वर्ष 1888 से जुड़ा है। मंदिर की स्थापना को लेकर एक प्रचलित जनश्रुति भी लोगों के बीच प्रचलित है। कहा जाता है कि मुरलीगंज के कुछ पहलवान कुमारखंड प्रखंड के रहटा गांव में दुर्गा पूजा मेले के दौरान आयोजित दंगल में भाग लेने पहुंचे थे। वहां किसी बात को लेकर विवाद हुआ और मारपीट की घटना हुई।इसके बाद पहलवानों ने मुरलीगंज लौटकर ग्रामीणों को अपनी व्यथा बताई। इससे आक्रोशित ग्रामीण रात में ही रहटा गांव पहुंचे। स्थानीय जनश्रुति के अनुसार, वे वहां से दुर्गा पूजा की प्रतिमाएं लेकर मुरलीगंज आ गए। महानवमी का अवसर होने के कारण रात में ही कलश स्थापित कर पूजा-अर्चना शुरू की गई। बताया जाता है कि रात में कलश स्थापना की परंपरा आज भी यहां कायम है।शुरुआत में झोपड़ीनुमा संरचना में विराजमान मां भगवती के लिए वर्ष 1989 में सार्वजनिक सहयोग से मंदिर का निर्माण कराया गया। समय के साथ मंदिर का स्वरूप भव्य और आकर्षक होता गया। एक बीघा से अधिक क्षेत्रफल में फैला मंदिर परिसर श्रद्धालुओं के लिए धार्मिक आस्था का प्रमुख स्थल है। परिसर में नाट्यशाला के ऊपर मां मानव सेवा भवन का निर्माण भी कराया गया है।मंदिर के मुख्य द्वार पर लिखे प्रेरक संदेश भी लोगों का ध्यान आकर्षित करते हैं। यहां अंकित है— “क्रोध सर्वनाशक कारण है, सोचो क्या लेकर आए हो, क्या लेकर जाओगे।” एक अन्य संदेश में कहा गया है कि यदि हम समझते हैं कि हमारे भीतर कोई कमी नहीं है, तो यही हमारी सबसे बड़ी कमी है। ये संदेश लोगों को क्रोध से दूर रहने, विनम्रता अपनाने और आत्ममंथन करने की प्रेरणा देते हैं।मंदिर से जुड़ी मान्यताओं में झूठी कसम खाने की परंपरा भी चर्चा में रहती है। मंदिर समिति के सदस्यों के अनुसार, पूर्व में झूठी कसम खाने के बाद अनहोनी होने की बातें सामने आई थीं। इसके बाद मंदिर परिसर में कसम खाने पर प्रतिबंध लगाया गया। यह मान्यता स्थानीय लोगों के विश्वास और धार्मिक आस्था से जुड़ी हुई है।








