तेल अवीव/तेहरान,अंग भारत। मध्य पूर्व में बारूद का ढेर एक बार फिर सुलग उठा है। ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) ने इजराइल के प्रमुख शहरों तेल अवीव और एलात को निशाना बनाते हुए ताबड़तोड़ मिसाइल हमले किए हैं। इस ताजा सैन्य कार्रवाई ने पहले से ही तनावपूर्ण चल रहे खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति को बेहद नाजुक मोड़ पर खड़ा कर दिया है। आईआरजीसी के दावों के मुताबिक, उन्होंने इजराइल के सैन्य और औद्योगिक ठिकानों पर प्रहार किया है, हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है।
हमले की गंभीरता और प्रभाव
इजराइल डिफेंस फोर्सेज (आईडीएफ) ने इस हमले की आधिकारिक पुष्टि करते हुए कहा है कि उनकी हवाई सुरक्षा प्रणाली ‘आयरन डोम’ और अन्य इंटरसेप्टर सक्रिय मोड में हैं। जैसे ही ईरान से मिसाइलें दागी गईं, तेल अवीव सहित कई इलाकों में सायरन की गूंज सुनाई दी। स्थानीय लोगों के बीच दहशत का माहौल है और सभी नागरिकों को तत्काल प्रभाव से शेल्टर और सुरक्षित ठिकानों में शरण लेने के निर्देश दिए गए हैं। यह हमला बताता है कि अब सीधे टकराव की स्थिति में कोई भी शहर सुरक्षित नहीं है।
विस्तार लेता क्षेत्रीय संघर्ष
यह लड़ाई केवल इजराइल और ईरान तक सीमित नहीं रह गई है। इस दौरान इराक में सक्रिय कई सशस्त्र समूहों ने भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है। तनाव के इस दौर में निम्नलिखित घटनाक्रम तेजी से बदले हैं:
- सराया औलिया अल-दाम: इस समूह ने पिछले 24 घंटों के भीतर अमेरिकी ठिकानों पर पांच अलग-अलग हमलों की जिम्मेदारी ली है।
- इस्लामिक प्रतिरोध नेटवर्क: ईरान समर्थित शिया मिलिशिया समूहों ने दावा किया है कि उन्होंने इराक और आसपास के क्षेत्रों में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर 23 हमले किए हैं।
- सुरक्षा अलर्ट: कुवैत ने अपनी सेना को हाई अलर्ट पर रखा है। कुवैती सेना का कहना है कि वे किसी भी संभावित मिसाइल या ड्रोन हमले का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।
शैक्षणिक संस्थानों पर संकट
इस संघर्ष का एक बेहद डरावना पहलू आम नागरिकों के जीवन पर पड़ रहा असर है। ईरान के विदेश मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार, 28 फरवरी से अब तक हुए हमलों में करीब 600 से अधिक स्कूलों और शैक्षणिक संस्थानों को नुकसान पहुंचा है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस पर चिंता जताई जा रही है क्योंकि भविष्य की पीढ़ियों की शिक्षा और सुरक्षा अब युद्ध के साये में है। युद्ध का यह मानवीय पहलू पूरे विश्व के लिए एक बड़ा संकट बन चुका है।
क्यों है यह खतरनाक?
क्षेत्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति पिछले कई दशकों में सबसे गंभीर है। जब भी इस प्रकार की ‘मिसाइल कूटनीति’ (Missile Diplomacy) का उपयोग होता है, तो गलतफहमी की संभावना बहुत बढ़ जाती है। यदि कोई एक भी मिसाइल रिहायशी इलाके में गिरती है या बड़ा जनहानि का कारण बनती है, तो इसके जवाब में होने वाली कार्रवाई युद्ध को एक ऐसे स्तर पर ले जाएगी जिसे रोकना लगभग असंभव हो जाएगा।
वैश्विक अर्थव्यवस्था पर मार
मध्य पूर्व में अस्थिरता का सीधा असर वैश्विक बाजारों पर पड़ता है। खाड़ी देशों से तेल की आपूर्ति बाधित होने का डर हमेशा बना रहता है। जैसे ही इन मिसाइल हमलों की खबरें आती हैं, कच्चे तेल की कीमतें ऊपर की ओर भागने लगती हैं। आम भारतीय नागरिक पर इसका सीधा असर पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतों के रूप में पड़ सकता है।
समाधान की राह क्या है?
दुनिया भर के देश इस समय संयम बरतने की अपील कर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं लगातार तनाव कम करने की कोशिश में जुटी हैं। हालांकि, जिस प्रकार से ईरान और इजराइल के बीच बयानबाजी और हमलों का सिलसिला चल रहा है, ऐसा लगता है कि यह तनाव जल्दी खत्म होने वाला नहीं है। कूटनीतिक बातचीत के बजाय फिलहाल सैन्य शक्ति का प्रदर्शन ही मुख्य केंद्र बना हुआ है, जो भविष्य के लिए एक बड़ा खतरा है।
हमें इस बात पर गौर करना होगा कि इस युद्ध के कोई विजेता नहीं होते, बल्कि अंत में केवल विनाश ही हाथ लगता है। आम जनता के लिए सुरक्षा के जो इंतजाम किए जा रहे हैं, वे केवल तात्कालिक उपाय हैं। स्थायी शांति तभी संभव है जब संबंधित देश अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन करें और बातचीत के जरिए अपने विवादों को सुलझाएं। फिलहाल, पूरी दुनिया सांसें थामे इस क्षेत्र की ओर देख रही है, क्योंकि आने वाले कुछ दिन यह तय करेंगे कि क्या यह युद्ध एक बड़े क्षेत्रीय संघर्ष में तब्दील होगा या इसे अभी रोक लिया जाएगा।








