Founder – Mohan Milan

अमेरिका–ईरान युद्ध की मार, 25 करोड़ का ऑर्डर रद्द

भागलपुर, अंग भारत। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और युद्ध के हालातों ने भागलपुर की प्रसिद्ध सिल्क इंडस्ट्री को भारी आर्थिक झटका दिया है, जिसके चलते हाल ही में करीब 25 करोड़ रुपये के निर्यात ऑर्डर अचानक रद्द कर दिए गए हैं। रेशम नगरी के नाम से मशहूर भागलपुर के बुनकर, जो पहले से ही वैश्विक अस्थिरता और कच्चे माल की बढ़ती कीमतों से जूझ रहे थे, अब इस नए अंतरराष्ट्रीय संकट के कारण कंगाली की कगार पर खड़े हैं। यह स्थिति न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए चिंताजनक है, बल्कि सदियों पुरानी इस कला के अस्तित्व पर भी एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर रही है।

बुनकरों का गहरा संकट

भागलपुर के बुनकर इलाकों में आज सन्नाटा पसरा हुआ है। कई कारखानों में बिजली की गड़गड़ाहट वाली लूम मशीनें अब शांत हैं, क्योंकि काम ही नहीं है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में बनी अनिश्चितता के कारण निर्यातकों ने माल उठाने से मना कर दिया है। 25 करोड़ के ऑर्डर का रद्द होना कोई छोटी बात नहीं है; यह सीधे तौर पर हजारों बुनकरों की दिहाड़ी और उनके परिवारों के चूल्हे पर सीधा प्रहार है।

हेमंत कुमार की आपबीती

स्थानीय बुनकर हेमंत कुमार का कहना है कि वे हर बार संकट से उभरने की उम्मीद करते हैं, लेकिन बाहरी दुनिया की घटनाएं उनके सपनों को कुचल देती हैं। हेमंत कुमार ने बताया कि कोरोना काल के बाद से ही व्यापार पटरी से उतरा हुआ था। रही-सही कसर अंतरराष्ट्रीय तनाव ने पूरी कर दी। उनका कहना है कि जब वैश्विक व्यापार का माहौल बिगड़ता है, तो उसका सबसे पहला असर हमारे जैसे छोटे उत्पादकों पर पड़ता है, जो पूरी तरह से निर्यात पर निर्भर हैं।

आलोक कुमार का अनुभव

बुनकर आलोक कुमार के अनुसार, केवल अमेरिका और ईरान का तनाव ही इकलौती समस्या नहीं है। आलोक कुमार ने स्पष्ट किया कि पहले भागलपुर का माल बड़ी मात्रा में बांग्लादेश भेजा जाता था, लेकिन वहां की राजनीतिक अस्थिरता ने उस बाजार को भी पूरी तरह से बंद कर दिया है। निर्यात बाजारों के एक के बाद एक बंद होने से बुनकरों के पास माल का स्टॉक जमा हो गया है और नया ऑर्डर लेने की हिम्मत किसी में नहीं बची है।

सिल्क उद्योग के प्रकार

भागलपुर की पहचान यहां के विविधतापूर्ण सिल्क से है। स्थानीय कारीगर विभिन्न प्रकार के रेशम के साथ अद्भुत कलाकारी करते हैं। इस उद्योग के प्रमुख प्रकार निम्नलिखित हैं:

  • तसर सिल्क: अपनी मजबूती और प्राकृतिक सुनहरे रंग के लिए प्रसिद्ध।
  • मुगा और मलवरी: अंतरराष्ट्रीय फैशन जगत में उच्च मांग वाला रेशम।
  • कोटा और मटका: रोजमर्रा के परिधानों के लिए पसंदीदा विकल्प।
  • अरंडी: जिसे शांति रेशम भी कहा जाता है, इसका भी उत्पादन बड़े पैमाने पर होता है।

पलायन की मजबूरी

परिस्थितियां इतनी विकट हो गई हैं कि कई कुशल बुनकर अब अपना पुस्तैनी काम छोड़ने के लिए मजबूर हैं। जब घर में दाने-पानी का संकट होता है, तो कारीगर लूम मशीनें बेचने या मजदूरी के लिए बड़े शहरों की ओर पलायन करने का विकल्प चुन रहे हैं। एक ऐसी कला जो सदियों से भागलपुर की संस्कृति का हिस्सा रही है, वह अब केवल आर्थिक अभाव के कारण इतिहास के पन्नों में सिमटने के कगार पर है।

वैश्विक प्रभाव और टैरिफ

अमेरिका की बदलती आयात नीतियां और उन पर लगे टैरिफ भी भागलपुर के व्यापारियों के लिए परेशानी का सबब बने हुए हैं। जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापारिक नियम बदलते हैं, तो भारत का लघु उद्योग उस दबाव को झेलने में असमर्थ हो जाता है। 25 करोड़ का नुकसान केवल एक आंकड़े की तरह नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे एक पूरे इको-सिस्टम के ढहने के रूप में देखा जाना चाहिए। बुनकरों के अनुसार, यदि सरकार की तरफ से निर्यात प्रोत्साहन या सब्सिडी जैसे ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में सिल्क सिटी की चमक पूरी तरह फीकी पड़ सकती है।

“हर बार जब हम काम को आगे बढ़ाने की हिम्मत जुटाते हैं, तो कोई न कोई अंतरराष्ट्रीय संकट सामने आ खड़ा होता है, जो हमारी मेहनत पर पानी फेर देता है।” – हेमंत कुमार, स्थानीय बुनकर।

अंततः, भागलपुर का सिल्क उद्योग आज दोराहे पर खड़ा है। क्या यह पारंपरिक उद्योग अंतरराष्ट्रीय राजनीति के इस चक्रव्यूह से निकल पाएगा, या फिर यह बुनकर अपनी कला को अलविदा कह देंगे? इसका उत्तर आने वाले समय की कूटनीति और बाजार की स्थिति पर निर्भर करेगा। फिलहाल के लिए, भागलपुर के बुनकर सिर्फ एक ही उम्मीद लगाए बैठे हैं कि शांति लौटे और उनके लूम फिर से चलने लगें।

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अंग भारत • रिपोर्टर

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