भागलपुर, अंग भारत। अंग प्रदेश की ऐतिहासिक और पौराणिक भूमि भागलपुर का चंपानगर क्षेत्र इन दिनों मां मनसा और सती बिहुला की भक्ति में लीन हो गया है। यहां लोक आस्था का महान पर्व बिहुला-विषहरी पूजा बेहद पारंपरिक उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है। चंपानगर स्थित मुख्य विषहरी मंदिर (मंझूषा मंदिर) में सुबह की पहली किरण के साथ ही मां विषहरी के दर्शन करने और विशेष डलिया चढ़ाने के लिए भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ा है। ढोल-ढाक की गूंज और सुरीले लोकगीतों की स्वरलहरी से पूरा चंपानगर क्षेत्र भक्ति रस से सराबोर है। यह पर्व सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह नारी शक्ति के अदम्य साहस, पतिव्रता धर्म और मनुष्य का प्रकृति के साथ गहरे जुड़ाव को प्रदर्शित करता है।
पौराणिक कथा और सतीत्व
यह पर्व प्राचीन अंग जनपद के समृद्ध इतिहास और लोक गाथाओं को अपने भीतर समेटे हुए है। इसकी मुख्य कथा चंपानगर के शासक चांद सौदागर, उनके पुत्र बाला लखेंद्र और पुत्रवधू सती बिहुला से जुड़ी है। भगवान शिव के परम भक्त चांद सौदागर ने मां मनसा (विषहरी) को देवी मानने और उनकी पूजा करने से साफ मना कर दिया था। मां मनसा के क्रोध के कारण चांद सौदागर के छह पुत्र काल के गाल में समा गए। जब उनके सातवें पुत्र बाला लखेंद्र का जन्म हुआ, तो उन्हें सर्पदंश से बचाने के लिए एक विशाल लोहे का महल (बासरघर) बनवाया गया। लेकिन नियति और मां मनसा की इच्छा के सामने वह महल भी टिक न सका। एक नाग ने बासरघर में प्रवेश कर बाला लखेंद्र को डस लिया।
अपने पति की अकाल मृत्यु से टूटने के बजाय सती बिहुला ने एक साहसी मार्ग चुना। उन्होंने मौत को चुनौती दी और अपने पति के पार्थिव शरीर को केले के तने से बनी नाव (थम) पर रखा। वह गंगा की तेज धाराओं के बीच देवलोक (इंद्रपुरी) की ओर चल पड़ीं।
“बिहुला का यह सफर केवल एक पत्नी की जिद नहीं थी, बल्कि यह यमराज और नियति के खिलाफ एक साधारण नारी के असाधारण संकल्प की गाथा थी।”
रास्ते में आने वाले तमाम संकटों का सामना करते हुए बिहुला ने अपने तपोबल और सतीत्व से स्वर्ग के देवताओं को प्रभावित किया। उनकी इस अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर देवताओं ने बाला लखेंद्र को दोबारा जीवन दान दिया। इसके साथ ही चांद सौदागर के बाकी छह बेटों को भी जीवित कर दिया। इसके बाद चांद सौदागर का अहंकार चूर हुआ और उन्होंने देवी मनसा की आराधना स्वीकार की।
मंजूषा कला और पूजा विधान
बिहुला-विषहरी पूजा की सबसे बड़ी विशेषता इसकी अनूठी लोक कला है। इस उत्सव के दौरान अंग प्रदेश की पारंपरिक मंजूषा कला की छटा चारों तरफ दिखाई देती है। चंपानगर के मंदिरों और पूजा पंडालों को मंजूषा शैली के चित्रों से बहुत बारीकी से सजाया जाता है। इन चित्रों में पीले, हरे और गुलाबी रंगों का प्रयोग करके बिहुला और बाला लखेंद्र की पूरी जीवन यात्रा को दर्शाया जाता है।
श्रद्धालु पूजा के दौरान कई विशेष अनुष्ठान करते हैं, जिन्हें नीचे दी गई तालिका में देखा जा सकता है:
| पूजा सामग्री / अनुष्ठान | धार्मिक महत्व और मान्यता |
|---|---|
| बांस की डलिया | बांस से बनी इस विशेष टोकरी में फल, फूल, अंकुरित अनाज और नैवेद्य सजाकर मां विषहरी को अर्पित किया जाता है। |
| दूध और लावा | नाग देवता को शांत करने और प्रसन्न करने के लिए धान का खील (लावा) और कच्चा दूध चढ़ाया जाता है। |
| गीत और गायन | रात भर मंदिरों में लोक कलाकार पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ सती बिहुला की दर्दभरी और प्रेरक गाथा गाते हैं। |
| मिट्टी की भव्य प्रतिमाएं | मां मनसा, सती बिहुला, बाला लखेंद्र और चांद सौदागर की मिट्टी से बनी सुंदर प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं। |
रात के सन्नाटे में जब लोक कलाकार डमरू और मंजूषा वाद्य यंत्रों की थाप पर बिहुला के विलाप और विजय के गीत गाते हैं, तो सुनने वालों की आंखें नम हो जाती हैं। दूर-दराज के गांवों से लोग इस संगीतमय कथा को सुनने के लिए चंपानगर के मंदिरों में जुटते हैं।
प्रकृति प्रेम और सामाजिक सद्भाव
यह सांस्कृतिक उत्सव हमें पर्यावरण और जीव-जंतुओं के साथ मिलकर रहने की सीख देता है। भारतीय संस्कृति में नाग को केवल एक जहरीला जीव नहीं माना गया, बल्कि उसे देवता का दर्जा देकर पूजा जाता है। यह परंपरा इस बात का प्रमाण है कि मानव समाज हमेशा से प्रकृति के हर जीव के साथ सह-अस्तित्व की भावना रखता आया है। इसके अतिरिक्त, चंपानगर का यह मेला सामाजिक समरसता की एक मिसाल पेश करता है।
- जाति-पांत से परे एकता: मंदिर के प्रांगण में हर वर्ग, जाति और समुदाय के लोग बिना किसी भेदभाव के एक कतार में खड़े होकर पूजा करते हैं।
- अंतरराज्यीय श्रद्धा का केंद्र: चंपानगर विषहरी पूजा समिति के पदाधिकारियों ने बताया कि इस तीन दिवसीय मेले में न केवल बिहार के लोग आ रहे हैं, बल्कि पड़ोसी राज्यों झारखंड और पश्चिम बंगाल से भी हजारों की संख्या में भक्त यहां पहुंच रहे हैं।
- सुरक्षा के विशेष इंतजाम: श्रद्धालुओं की भारी संख्या को देखते हुए स्थानीय प्रशासन और पूजा समिति ने चंपानगर मंदिर परिसर और मेला क्षेत्र में सीसीटीवी कैमरों, सुरक्षाकर्मियों और प्राथमिक चिकित्सा शिविरों की व्यवस्था की है।
इस प्रकार चंपानगर की यह बिहुला-विषहरी पूजा अंग प्रदेश की प्राचीन लोक विरासत, मंजूषा कला और क्षेत्रीय लोकगीतों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवंत बनाए रखने का काम कर रही है। यह मेला और पूजा आज की नई पीढ़ी को अपनी समृद्ध ऐतिहासिक जड़ों से रूबरू कराने का एक बेहतरीन जरिया बन चुकी है।







