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हंगामें की भेंट चढ़ा संसद का पूरा मानसून सत्र, दोनों सदनों की कार्यवाही अनिश्चित काल के लिए स्थगित

नई दिल्ली,अंग भारत|  संसद का मानसून सत्र अपने तय समय से पहले ही समाप्त हो गया, जिसके चलते दोनों सदनों की कार्यवाही को अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया गया है। हंगामे और शोर-शराबे की वजह से इस बार संसद का कामकाज उम्मीद के मुताबिक नहीं हो सका। विपक्षी दलों के कड़े रुख और सत्तापक्ष के पलटवार के कारण संसद के भीतर गतिरोध बना रहा, जिसका असर जनता से जुड़े महत्वपूर्ण विधायी कार्यों पर पड़ा। सदन की कार्यवाही शुरू होते ही विभिन्न मुद्दों पर सदस्यों द्वारा किए गए प्रदर्शन ने शांतिपूर्ण चर्चा के अवसर को पूरी तरह खत्म कर दिया।

सदन में गतिरोध का कारण

मानसून सत्र की शुरुआत से ही संसद के दोनों सदनों—लोकसभा और राज्यसभा—में तीखी बहस देखने को मिली। विपक्षी सांसद कई विषयों पर सरकार को घेरने की रणनीति के साथ सदन में आए थे। इनमें मुख्य रूप से देश की आंतरिक सुरक्षा, बढ़ती कीमतों और अन्य सामाजिक मुद्दे शामिल थे। गतिरोध इतना बढ़ गया कि अध्यक्ष और सभापति को बार-बार सदन की कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी। संसदीय कार्यवाही के नियमों के अनुसार, चर्चा के लिए सदस्यों को पर्याप्त समय मिलना चाहिए, लेकिन इस बार नारेबाजी ने संवाद की गुंजाइश खत्म कर दी।

संसदीय लोकतंत्र की असली खूबसूरती संवाद और बहस में निहित है। जब सदन में चर्चा के बजाय हंगामा हावी होता है, तो इसका नुकसान देश की आम जनता को उठाना पड़ता है।

कामकाज का सांख्यिकीय विश्लेषण

मानसून सत्र की उत्पादकता पर गौर करें, तो आंकड़े चिंताजनक स्थिति बयां करते हैं। पिछले कुछ वर्षों के मुकाबले इस बार कामकाज के घंटों में भारी कमी आई है। नीचे दी गई तालिका सत्र की स्थिति को दर्शाती है:

विवरण आंकड़े (अनुमानित)
निर्धारित कार्य दिवस 20 दिन
वास्तविक कार्य दिवस 12 दिन
हंगामे के भेंट चढ़े घंटे 70%
पारित विधेयक सीमित संख्या

विधेयकों को पारित करने की प्रक्रिया में भी इस बार काफी अवरोध उत्पन्न हुए। जिन महत्वपूर्ण विधेयकों पर चर्चा होनी थी, उनमें से कई बिना विस्तृत बहस के या तो ध्वनि मत से पारित हुए या फिर ठंडे बस्ते में डाल दिए गए। सरकार का पक्ष रहा कि विपक्ष चर्चा से भाग रहा है, जबकि विपक्ष का कहना था कि सरकार उनकी आवाज दबाने की कोशिश कर रही है।

विपक्ष की मुख्य मांगे

  • महंगाई पर तत्काल प्रभाव से विशेष चर्चा आयोजित करना।
  • देश की आंतरिक सुरक्षा स्थिति पर सरकार द्वारा विस्तृत बयान देना।
  • विभिन्न सामाजिक और आर्थिक नीतियों की समीक्षा के लिए जेपीसी (संयुक्त संसदीय समिति) का गठन।
  • सदन के पटल पर जवाबदेही तय करने के लिए मंत्रियों की मौजूदगी अनिवार्य करना।

संसदीय मामलों के जानकारों का मानना है कि यदि सरकार और विपक्ष के बीच बेहतर समन्वय होता, तो सत्र की तस्वीर कुछ और हो सकती थी। जब सदन नहीं चलता है, तो जनता के मुद्दों को उठाने का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक मंच निष्प्रभावी हो जाता है। लोकतंत्र में असहमति का सम्मान करना आवश्यक है, लेकिन सदन की मर्यादा बनाए रखना भी जनप्रतिनिधियों की पहली जिम्मेदारी है।

सत्र के आखिरी दिन भी वही नजारा दिखा जो पहले दिन था। अध्यक्ष ने सदन के सभी सदस्यों से गरिमा बनाए रखने की अपील की थी, लेकिन शोर-शराबे के बीच कार्यवाही चलाना कठिन हो गया। अंततः अनिश्चित काल के लिए स्थगन की घोषणा के साथ ही यह सत्र इतिहास के पन्नों में एक और अशांत मानसून सत्र के रूप में दर्ज हो गया है। आने वाले समय में चुनावी राज्यों की राजनीति भी संसद के अगले सत्रों पर सीधा असर डालेगी, जिससे राजनीतिक माहौल के और अधिक गर्माने की आशंका है।

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अंग भारत • रिपोर्टर

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