काठमांडू,अंग भारत। नेपाल के रसुवागढ़ी में पिछले दिनों आई भयानक बाढ़ के पीछे ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा खिसकना बताया जा रहा है। वैज्ञानिकों के मुताबिक पहाड़ से करीब 2.5 करोड़ घन मीटर बर्फ और हिमखंड टूटकर लगभग 2,000 मीटर नीचे आ गिरे। इतनी बड़ी मात्रा में बर्फ के अचानक नीचे आने से जो ताकत पैदा हुई, उसका असर किसी बड़े विस्फोट जैसा रहा होगा। इस घटना के दौरान जमीन में तेज कंपन भी महसूस किया गया, जिसे 5.2 तीव्रता के भूकंप के रूप में दर्ज किया गया।
1.3 किलोमीटर लंबा था हिमस्खलन
त्रिभुवन विश्वविद्यालय के भूगर्भशास्त्र विभाग के प्रोफेसर डॉ. रंजन कुमार दाहाल इस घटना का अध्ययन कर रहे हैं। उन्होंने सैटेलाइट से मिली तस्वीरों और दूसरे आंकड़ों के आधार पर बताया कि हिमस्खलन करीब 1.3 किलोमीटर लंबा था। नीचे आते समय बर्फ ने करीब 500 से 800 मीटर चौड़े इलाके को पूरी तरह अपनी चपेट में ले लिया।डॉ. दाहाल के मुताबिक, पहाड़ से नीचे गिरने वाली बर्फ की मात्रा का अभी सही-सही पता नहीं चल पाया है। फिर भी कम से कम अनुमान लगाएं तो करीब 2.5 करोड़ घन मीटर बर्फ और हिमखंड नीचे आए हैं।
इतनी बड़ी थी बर्फ की मात्रा
वैज्ञानिकों का कहना है कि बर्फ का ढेर करीब 60 से 70 मीटर तक मोटा रहा होगा। इसी आधार पर जब पूरे इलाके का हिसाब लगाया गया तो करीब चार करोड़ घन मीटर सामग्री नीचे आने का अनुमान सामने आया है। हालांकि डॉ. दाहाल ने सावधानी बरतते हुए इससे कम आंकड़ा लिया है और कम से कम 2.5 करोड़ घन मीटर बर्फ गिरने की बात कही है।कुछ दूसरे विशेषज्ञों का शुरुआती अनुमान इससे भी ज्यादा है। उनके मुताबिक, इस घटना में करीब 10 करोड़ घन मीटर तक बर्फ नीचे आ सकती है। आने वाले दिनों में सैटेलाइट तस्वीरों और मौके से जुटाए गए आंकड़ों के आधार पर स्थिति ज्यादा साफ होने की उम्मीद है।
पहले से चल रहा था हिमालय पर अध्ययन
रसुवागढ़ी के ऊपरी तिब्बती इलाके में प्यूरेपु हिमताल के आसपास लंबे समय से बदलाव देखे जा रहे थे। ग्लेशियर के ऊपर छोटे-छोटे पानी के तालाब और जलकुंड बने थे। इनके फटने से पिछले साल भी भोटेकोशी नदी में बाढ़ आई थी।इसके बाद नेपाल के साथ चीन, ब्रिटेन और इटली के विश्वविद्यालयों के विशेषज्ञों ने हिमालयी इलाकों में ग्लेशियरों की गतिविधियों पर अध्ययन शुरू किया था। करीब एक साल से वैज्ञानिक इस क्षेत्र में होने वाले बदलावों पर नजर रख रहे थे।
अचानक आई बाढ़ ने बढ़ाई चिंता
इसी बीच पिछले बुधवार अचानक इलाके में तेज बाढ़ आ गई। बाढ़ की भयावहता को देखते हुए अध्ययन कर रही टीम के कुछ सदस्य मौके पर हुई घटनाओं को समझने में जुट गए। शुरुआती जांच में पता चला कि भारी मात्रा में बर्फ और हिमखंड के नीचे आने से नदी और आसपास के इलाकों पर जबरदस्त दबाव पड़ा।विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी ऊंचाई से इतनी बड़ी मात्रा में बर्फ के गिरने से जमीन और आसपास के क्षेत्र में भारी ऊर्जा पैदा हुई। इसी वजह से इसका असर बेहद तेज और विनाशकारी रहा।
आगे भी बढ़ सकती है बर्फ गिरने की मात्रा
वैज्ञानिक अभी यह पता लगाने में जुटे हैं कि पहाड़ से वास्तव में कितनी बर्फ टूटी और नीचे आई। मौजूदा आंकड़ों में बर्फ की मोटाई को लेकर पूरी जानकारी नहीं है। इसलिए 2.5 करोड़ घन मीटर का अनुमान शुरुआती और कम आंकड़ा माना जा रहा है।इस मात्रा की विशालता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2.5 करोड़ घन मीटर बर्फ से लंदन के वेम्बली स्टेडियम को करीब 22 बार भरा जा सकता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि आगे मिलने वाले आंकड़ों के बाद बर्फ की वास्तविक मात्रा इससे काफी ज्यादा भी निकल सकती है।







