रांची,अंग भारत। भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले पर बड़ा बयान दिया। इस फैसले में स्पष्ट किया गया है कि यदि कोई व्यक्ति हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म छोड़कर किसी अन्य धर्म को अपनाता है, तो उसे अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा नहीं मिलेगा और न ही आरक्षण या अन्य संवैधानिक लाभों का दावा करने का अधिकार होगा।
श्री मरांडी ने कहा कि संविधान की भावना के अनुसार आरक्षण का उद्देश्य समाज के हकदार वर्गों के उत्थान और समान अवसर सुनिश्चित करना है। यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से अपने मूल धर्म को छोड़कर अन्य धर्म अपनाता है, तो वह उस सामाजिक संरचना से बाहर हो जाता है, जिसके आधार पर उसे आरक्षण का अधिकार मिला था। ऐसे में वह वर्गीय लाभ का दावा नहीं कर सकता।
उन्होंने यह भी कहा कि हाल के वर्षों में कुछ संगठित नेटवर्क लोगों को धर्मांतरण के लिए प्रेरित कर रहे हैं, जिसके पीछे सामाजिक या आर्थिक लाभ की भावना जुड़ी होती है। ऐसे प्रयास न केवल समाज में भ्रम पैदा करते हैं, बल्कि आरक्षण जैसी संवेदनशील व्यवस्था का दुरुपयोग भी करते हैं।
मरांडी ने कहा, “सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय संविधान की गरिमा और सामाजिक न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण है। इससे यह सुनिश्चित होगा कि आरक्षण का लाभ केवल उन्हीं तक पहुंचे, जिनके लिए यह व्यवस्था बनाई गई है। यह फैसला समाज में समान अवसर की भावना को मजबूत करेगा और वास्तविक हकदारों को उनका हक दिलाएगा।”
उन्होंने यह भी जोर दिया कि धर्मांतरण के माध्यम से आरक्षण और अन्य संवैधानिक लाभ लेने का प्रयास संवैधानिक रूप से सही नहीं है। इससे समाज में असमानता और अन्याय की स्थिति पैदा होती है, जो लोकतंत्र और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला सामाजिक और आर्थिक न्याय को सुनिश्चित करने के दृष्टिकोण से अहम है। बाबूलाल मरांडी का बयान इसे समर्थन देते हुए इसे समाज में वास्तविक हकदारों के लिए राहत देने वाला कदम बताया जा रहा है।
इस फैसले के बाद राज्य में सामाजिक न्याय और आरक्षण से जुड़े मामलों पर चर्चा और सक्रिय रूप से बढ़ने की संभावना है, जिससे आरक्षण प्रणाली के वास्तविक उद्देश्य को सुदृढ़ करने में मदद मिलेगी।









