गुवाहाटी, अंग भारत। असम में चुनावी पारा अपने चरम पर है और भारतीय जनता पार्टी ने सत्ता की कुर्सी सुरक्षित रखने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। भाजपा का मेगा कैंपेन अब एक आक्रामक मोड़ पर आ चुका है, जहाँ अमित शाह से लेकर योगी आदित्यनाथ तक के दिग्गज नेता ताबड़तोड़ रैलियां करके मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की कोशिश में जुटे हैं। इस रणनीतिक हमले का मुख्य उद्देश्य भाजपा और उसके सहयोगी दलों के लिए जमीनी स्तर पर एक मजबूत माहौल तैयार करना है, ताकि जीत की राह आसान हो सके।
दिग्गजों की चुनावी घेराबंदी
भाजपा ने असम में एक सोची-समझी रणनीति के तहत अपने स्टार प्रचारकों को अलग-अलग क्षेत्रों में तैनात किया है। पार्टी का जोर केवल बड़ी रैलियों तक सीमित नहीं है, बल्कि हर विधानसभा क्षेत्र के गणित को दुरुस्त करना है।
- नितिन नवीन की सक्रियता: भाजपा के वरिष्ठ नेता नितिन नवीन का फोकस कमलपुर, मंगलदै और न्यू गुवाहाटी जैसे महत्वपूर्ण निर्वाचन क्षेत्रों पर है। उनका दौरा गठबंधन के उम्मीदवारों के लिए गेम चेंजर साबित हो सकता है।
- अर्जुन मुंडा की पकड़: झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा को ऊपरी असम की जिम्मेदारी सौंपी गई है। वे नाहरकटिया और टिंगखोंग में जनसभाओं के जरिए चाय बागान इलाकों के वोटरों से सीधा संवाद कर रहे हैं।
शाह और योगी का जादू
असम की सियासत में ‘डबल इंजन’ सरकार का नारा एक बार फिर जोर-शोर से गूंज रहा है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का बरपेटा और बरसोला में दौरा यह स्पष्ट करता है कि पार्टी कट्टर हिंदूवादी एजेंडे और विकास के मॉडल को एक साथ आगे बढ़ा रही है।
वहीं, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह का दो दिवसीय दौरा भाजपा की गंभीरता को दर्शाता है। वे गोलकगंज, दुधनै और पलाशबाड़ी में कार्यकर्ताओं में जोश भरने के साथ-साथ जनता को यह संदेश देने में लगे हैं कि असम का भविष्य केवल भाजपा के हाथों में ही सुरक्षित है। शाह की रैलियां आमतौर पर बूथ मैनेजमेंट को मजबूत करने और विपक्षी खेमे में मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिए जानी जाती हैं।
विपक्ष की भी चुनौती
सिर्फ भाजपा ही नहीं, बल्कि विपक्ष ने भी अपनी पूरी ताकत मैदान में उतार दी है। चुनाव अब महज एकतरफा नहीं रहा, बल्कि कांटे की टक्कर में बदल चुका है।
कांग्रेस के सचिन पायलट और एआईयूडीएफ के समर्थन में असदुद्दीन ओवैसी का मैदान में उतरना असम के मुस्लिम बहुल और मिश्रित आबादी वाले क्षेत्रों में समीकरणों को बदल सकता है।
कांग्रेस अपने पारंपरिक वोट बैंक को सहेजने की कोशिश कर रही है, जबकि ओवैसी की उपस्थिति ने सियासी समीकरणों को और भी जटिल बना दिया है। यह मुकाबला अब विचारधाराओं की लड़ाई के साथ-साथ जातीय और क्षेत्रीय हितों के बीच की खींचतान भी बन गया है।
चुनावी समीकरण का विश्लेषण
अगर हम वर्तमान स्थिति को देखें, तो असम का चुनावी रणक्षेत्र तीन मुख्य स्तंभों पर टिका है:
| पार्टी/गठबंधन | प्रमुख रणनीतिकार | मुख्य क्षेत्र |
|---|---|---|
| भाजपा (NDA) | अमित शाह, योगी आदित्यनाथ | पूरा राज्य, विशेषकर ऊपरी असम |
| कांग्रेस (UPA) | सचिन पायलट | मध्य असम और अल्पसंख्यक क्षेत्र |
| अन्य | असदुद्दीन ओवैसी | विशिष्ट मुस्लिम बहुल सीटें |
आने वाले दिन असम की राजनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। भाजपा का दावा है कि उनके ‘विकास’ के एजेंडे को जनता का भारी समर्थन मिल रहा है, वहीं विपक्षी दल बेरोजगारी और नागरिकता जैसे मुद्दों पर सरकार को घेर रहे हैं। रैलियों की यह बाढ़ और नेताओं का यह भारी जमावड़ा साफ बताता है कि असम में कोई भी दल अपनी जीत को हल्के में नहीं ले रहा है। मतदान की तारीख नजदीक आते ही यह सरगर्मी और बढ़ेगी, और अंतिम फैसला जनता की मुहर के साथ ही सामने आएगा।








