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गुवाहाटी के पहाड़ी इलाकों में अलर्ट, 366 भूस्खलन संवेदनशील स्थल चिन्हित

गुवाहाटी के पहाड़ी क्षेत्रों में भारी बारिश के बाद भूस्खलन के खतरे को दर्शाता सांकेतिक चित्र जिसमें कामरूप प्रशासन द्वारा जारी अलर्ट और संवेदनशील क्षेत्रों की मैपिंग को दर्शाया गया है।

कामरूप मेट्रो प्रशासन की चेतावनी, जोखिम वाले क्षेत्रों के लोगों से सतर्क रहने की अपील

गुवाहाटी,अंग भारत। कामरूप (मेट्रो) जिला प्रशासन ने गुवाहाटी के पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को एक बार फिर सतर्क रहने की सलाह दी है। प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि शहर में 366 भूस्खलन संवेदनशील स्थलों की पहचान की जा चुकी है और लगातार हो रही बारिश के बीच इन इलाकों में रहने वाले लोगों को अतिरिक्त सावधानी बरतने की आवश्यकता है। जिला आपदा प्रबंधन विभाग ने संभावित खतरे को देखते हुए लोगों से प्रशासन की चेतावनियों को गंभीरता से लेने की अपील की है।

सर्वेक्षण में सामने आए चौंकाने वाले तथ्य

कामरूप (मेट्रो) जिला आपदा प्रबंधन विभाग की ओर से किए गए व्यापक सर्वेक्षण में खुलासा हुआ है कि गुवाहाटी में अधिकांश भूस्खलन प्राकृतिक कारणों से नहीं, बल्कि मानवीय गतिविधियों के कारण हो रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार 95 प्रतिशत भूस्खलन संभावित स्थल मानवजनित कारणों से प्रभावित हैं, जबकि केवल 5 प्रतिशत मामलों में प्राकृतिक कारण जिम्मेदार पाए गए।विशेषज्ञों के अनुसार पहाड़ों की अंधाधुंध कटाई, तीव्र ढलानों पर अनियोजित निर्माण, जल निकासी व्यवस्था की कमी और तेजी से बढ़ता शहरी विस्तार भूस्खलन के प्रमुख कारण बन रहे हैं। इससे शहर की नाजुक पहाड़ी पारिस्थितिकी पर भी गंभीर खतरा मंडरा रहा है।

इन 20 पहाड़ी क्षेत्रों में सबसे ज्यादा खतरा

सर्वेक्षण में गुवाहाटी के नवग्रह, नरकासुर, नारंगी, नूनमाटी, शांतिपुर, शरणिया, शुक्रेश्वर, सुनसाली, फटासिल, गरभंगा, गोटानगर, हेंगराबाड़ी, जालुकबाड़ी-लंकेश्वर, काहिलीपाड़ा, कालापहाड़, कामाख्या-नीलाचल, खानापाड़ा, खारघुली, कोईनाधरा और मालीगांव सहित 20 पहाड़ी क्षेत्रों को शामिल किया गया।इनमें खारघुली सबसे अधिक संवेदनशील क्षेत्र के रूप में सामने आया, जहां 77 भूस्खलन संभावित स्थल चिन्हित किए गए हैं। इसके बाद नूनमाटी (40), नरेंगी (37), खानापाड़ा (33), मालीगांव (31) और जालुकबाड़ी-लंकेश्वर (30) में भी बड़ी संख्या में जोखिम वाले स्थान पाए गए हैं।

ढलानों और हरित आवरण की स्थिति भी चिंताजनक

रिपोर्ट के अनुसार 88 प्रतिशत संवेदनशील ढलानों का झुकाव 60 डिग्री तक है, जबकि 7 प्रतिशत ढलानों का झुकाव 60 डिग्री से अधिक है। इसके अलावा 57 प्रतिशत स्थलों की ऊंचाई पांच मीटर से कम पाई गई है, जिससे भारी बारिश के दौरान मिट्टी खिसकने का खतरा और बढ़ जाता है।वनस्पति के विश्लेषण में भी गंभीर स्थिति सामने आई है। करीब 45 प्रतिशत संवेदनशील ढलानों पर किसी भी प्रकार का हरित आवरण नहीं है, जबकि 36 प्रतिशत स्थानों पर केवल घास और झाड़ियां हैं। महज 19 प्रतिशत क्षेत्रों में वृक्ष मौजूद हैं, जो ढलानों को मजबूती देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

74 प्रतिशत स्थलों पर तत्काल कार्रवाई की जरूरत

भूगर्भीय अध्ययन में पाया गया कि 62 प्रतिशत ढलान चट्टान और मिट्टी के मिश्रण, 34 प्रतिशत केवल मिट्टी तथा 4 प्रतिशत पूरी तरह चट्टानी संरचना वाले हैं।रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि 74 प्रतिशत चिन्हित स्थलों पर जन-धन की सुरक्षा के लिए तत्काल हस्तक्षेप की आवश्यकता है। जोखिम वाले सभी क्षेत्रों को गूगल अर्थ पर मैप किया गया है ताकि प्रशासन निगरानी और आपदा प्रबंधन की योजना को अधिक प्रभावी ढंग से लागू कर सके।

प्रशासन ने लोगों से बरतने को कहा विशेष सतर्कता

कामरूप (मेट्रो) जिला प्रशासन ने मंगलवार को एक बार फिर भूस्खलन संभावित क्षेत्रों में रहने वाले लोगों से सतर्क रहने की अपील की है। प्रशासन ने कहा है कि भारी बारिश के दौरान अनावश्यक रूप से ढलानों के पास न जाएं और किसी भी आपात स्थिति में तुरंत संबंधित अधिकारियों को सूचना दें।विशेषज्ञों ने भी पहाड़ियों की कटाई पर सख्त नियंत्रण, बेहतर जल निकासी व्यवस्था, बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण और वैज्ञानिक भूमि उपयोग योजना को जल्द लागू करने की जरूरत पर जोर दिया है। अब यह देखना होगा कि जोखिम वाले क्षेत्रों में रहने वाले लोग प्रशासन की लगातार जारी चेतावनियों को कितनी गंभीरता से लेते हैं।

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अंग भारत • रिपोर्टर

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