भागलपुर,अंग भारत । बिहार के भागलपुर में गंगा किनारे और उसके आसपास के क्षेत्रों में हरगिला (बड़ा गरूड़) की मौजूदगी कोई नई बात नहीं है। यह दुर्लभ पक्षी यहां वर्षों से देखा जाता रहा है, लेकिन इसके संरक्षण को लेकर जिस स्तर की जनभागीदारी और सामाजिक अभियान की जरूरत थी, वह अब तक दिखाई नहीं दे सका। दूसरी ओर असम ने इसी पक्षी को अपनी जैव विविधता और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बनाकर संरक्षण का ऐसा मॉडल विकसित किया है, जिसकी चर्चा आज राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी हो रही है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या भागलपुर हरगिला संरक्षण के क्षेत्र में एक बड़ा अवसर गंवा रहा है?
असम ने बदली हरगिला की पहचान
एक समय था जब असम के ग्रामीण इलाकों में हरगिला को अशुभ पक्षी माना जाता था। लोग इसके घोंसले वाले पेड़ों को काट देते थे और इसे अपने आसपास देखना पसंद नहीं करते थे। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में तस्वीर पूरी तरह बदल गई। पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में काम करने वाली पूर्णिमा देवी बर्मन और स्थानीय महिलाओं ने मिलकर ऐसा जनआंदोलन खड़ा किया कि आज हरगिला वहां गौरव का प्रतीक बन चुका है।महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों, स्कूलों, स्थानीय पंचायतों और युवाओं को जोड़कर इस पक्षी के संरक्षण को सामाजिक अभियान का रूप दिया गया। परिणाम यह हुआ कि हरगिला की संख्या बढ़ी, लोगों की सोच बदली और असम का यह मॉडल पूरी दुनिया में सराहा जाने लगा।
भागलपुर में क्यों नहीं बन सका जनआंदोलन?
भागलपुर में भी हरगिला की उपस्थिति दर्ज की जाती रही है। गंगा के तटीय इलाके और आसपास के कई स्थान इस पक्षी के लिए अनुकूल माने जाते हैं। इसके बावजूद यहां संरक्षण का अभियान सीमित दायरे से बाहर नहीं निकल सका। विशेषज्ञों का मानना है कि पक्षी की मौजूदगी भर पर्याप्त नहीं होती, बल्कि उसके संरक्षण के लिए समाज की सक्रिय भागीदारी सबसे जरूरी होती है।आज भी यह सवाल बना हुआ है कि क्या स्थानीय समुदायों, विशेषकर महिलाओं, विद्यार्थियों और युवाओं को हरगिला संरक्षण से जोड़ने के लिए व्यापक स्तर पर प्रयास किए गए? क्या गांवों और कस्बों में जागरूकता अभियान चलाए गए? क्या घोंसलों और प्रजनन स्थलों की नियमित निगरानी सुनिश्चित की गई? इन सवालों के जवाब अभी भी पूरी तरह संतोषजनक नहीं हैं।
सिर्फ शोध नहीं, समाज की भागीदारी जरूरी
पक्षी विशेषज्ञों का मानना है कि संरक्षण का अर्थ केवल किसी प्रजाति की गणना करना या उस पर शोधपत्र प्रकाशित करना नहीं है। वास्तविक संरक्षण तब माना जाता है, जब स्थानीय लोग स्वयं उस प्रजाति को बचाने की जिम्मेदारी अपने ऊपर लें। जब गांव का हर परिवार, स्कूल का हर छात्र और समाज का हर वर्ग किसी दुर्लभ जीव या पक्षी को अपनी साझा विरासत मानने लगे, तभी संरक्षण का उद्देश्य सफल होता है।
विशेषज्ञ ने रखी अपनी राय
पक्षीविद और पर्यावरण विशेषज्ञ दीपक कुमार उर्फ झुन्नू का कहना है कि भागलपुर में हरगिला संरक्षण को लेकर कुछ प्रयास जरूर हुए हैं, लेकिन वे व्यापक जनभागीदारी, संस्थागत सहयोग और लगातार जनजागरूकता के स्तर तक नहीं पहुंच पाए। उनका मानना है कि यही वजह है कि आज भी हरगिला आम लोगों की चर्चा का विषय नहीं बन पाया है।उन्होंने कहा कि यह किसी संस्था या व्यक्ति की आलोचना का विषय नहीं है, बल्कि यह समय आत्ममंथन करने का है कि आखिर भागलपुर अपनी इस प्राकृतिक धरोहर को बचाने के लिए और क्या बेहतर कर सकता है। यदि संरक्षण अभियान समाज के हर वर्ग तक पहुंचे तो इसके परिणाम निश्चित रूप से सकारात्मक होंगे।
भागलपुर के पास अभी भी है बड़ा अवसर
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि असम हरगिला संरक्षण का सफल मॉडल विकसित कर सकता है तो बिहार, विशेषकर भागलपुर भी ऐसा करने में पूरी तरह सक्षम है। इसके लिए सरकार, वन विभाग, स्थानीय प्रशासन, शैक्षणिक संस्थानों, स्वयंसेवी संगठनों और आम नागरिकों को मिलकर काम करना होगा।स्कूलों में जागरूकता कार्यक्रम, महिलाओं की भागीदारी, स्थानीय समुदायों को संरक्षण से जोड़ना, घोंसलों की सुरक्षा, नियमित मॉनिटरिंग और हरगिला को भागलपुर की पहचान के रूप में स्थापित करने जैसे कदम इस दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।
प्राकृतिक विरासत को पहचान देने का समय
भागलपुर की पहचान केवल गंगा, सिल्क उद्योग या विक्रमशिला से ही नहीं जुड़ी है, बल्कि यहां की जैव विविधता भी इसकी बड़ी ताकत है। हरगिला जैसे दुर्लभ पक्षी को यदि संरक्षण और सम्मान मिले तो यह न केवल पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़ी उपलब्धि होगी, बल्कि इको-टूरिज्म और स्थानीय पहचान को भी नई मजबूती मिलेगी।अब जरूरत इस बात की है कि हरगिला को केवल एक दुर्लभ पक्षी के रूप में नहीं, बल्कि भागलपुर की प्राकृतिक धरोहर और गौरव के प्रतीक के रूप में देखा जाए। यदि समय रहते सामूहिक प्रयास शुरू किए गए, तो भागलपुर भी आने वाले वर्षों में हरगिला संरक्षण का राष्ट्रीय मॉडल बन सकता है।











