नई दिल्ली,अंग भारत। संसद के आगामी मानसून सत्र के शुरू होने से ठीक पहले भारतीय राजनीति का पारा चढ़ गया है। कांग्रेस ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि वह सरकार को घेरने के लिए एक बेहद आक्रामक रणनीति पर काम कर रही है। कांग्रेस के वरिष्ठ सांसद जयराम रमेश ने साफ कर दिया है कि विपक्षी दल विदेश नीति की खामियों, चुनाव आयोग की संदिग्ध कार्यप्रणाली, और अयोध्या राम मंदिर ट्रस्ट से जुड़े दान विवाद जैसे संवेदनशील मुद्दों पर संसद में तीखी बहस की मांग करेंगे। विपक्षी दलों का यह मानना है कि सरकार महत्वपूर्ण संवैधानिक और राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर सदन में खुली चर्चा करने से परहेज कर रही है, जिसे बदलना अब जरूरी हो गया है।
सदन में विपक्ष की रणनीति
कांग्रेस पार्टी ने मानसून सत्र के लिए मुद्दों की एक लंबी सूची तैयार की है। जयराम रमेश के अनुसार, सरकार संसद का उपयोग केवल औपचारिकता पूरी करने के लिए कर रही है। प्रमुख मुद्दों में शामिल हैं:
- विदेश नीति में असफलता: चीन के साथ व्यापार घाटा और वैश्विक कूटनीति में भारत की बदलती स्थिति।
- चुनावी पारदर्शिता: चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटाने के आरोप।
- धार्मिक संस्थानों में अनियमितता: अयोध्या राम मंदिर और उत्तराखंड के केदारनाथ-बदरीनाथ मंदिरों में दान के धन का प्रबंधन और दुरुपयोग।
- संवैधानिक संशोधन: परिसीमन प्रक्रिया और एक राष्ट्र-एक चुनाव के पीछे की छिपी हुई मंशा।
चुनाव आयोग पर उठते सवाल
बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया के दौरान जिस तरह से मतदाता सूची को लेकर विवाद पैदा हुआ है, उसने विपक्षी दलों के कान खड़े कर दिए हैं। विपक्ष का यह आरोप है कि जानबूझकर लाखों लोगों के नाम सूची से हटाए जा रहे हैं, जो लोकतंत्र की बुनियादी नींव को कमजोर करता है। स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और 24 राजनीतिक दलों के नेताओं ने भारत के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर हस्तक्षेप की गुहार लगाई है। कांग्रेस का तर्क है कि जब तक चुनाव आयोग पर नागरिकों का भरोसा बहाल नहीं होगा, तब तक चुनावी प्रक्रिया निष्पक्ष नहीं मानी जा सकती।
परिसीमन और राजनीतिक एजेंडा
लोकसभा सीटों के परिसीमन के मुद्दे को लेकर कांग्रेस ने सीधे तौर पर भाजपा पर निशाना साधा है। पार्टी का आरोप है कि इस कवायद का एकमात्र उद्देश्य राजनीतिक लाभ उठाना और संविधान के बुनियादी ढांचे में बदलाव करने के लिए दो-तिहाई बहुमत हासिल करना है। जयराम रमेश ने कहा कि भाजपा सामाजिक न्याय और आरक्षण जैसे ज्वलंत मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाने के लिए इन विषयों को सामने लाती है। विपक्ष इसे लोकतंत्र के लिए खतरा मान रहा है और वह संसद के भीतर सरकार की हर चाल का विरोध करने के लिए तैयार है।
विदेश नीति की चुनौतियां
विदेश नीति पर कांग्रेस का रुख काफी कड़ा है। पार्टी ने कहा है कि ऑपरेशंस की सफलता को कूटनीतिक जीत नहीं माना जाना चाहिए। कांग्रेस के अनुसार, अमेरिका और पाकिस्तान के बदलते समीकरणों के बीच भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इसके अलावा, चीन के साथ बढ़ते व्यापार घाटे को लेकर सरकार के मौन पर भी विपक्ष ने सवाल खड़े किए हैं। कांग्रेस का मानना है कि इन गंभीर भू-राजनीतिक मुद्दों पर संसद में लंबी और विस्तृत चर्चा होनी चाहिए, न कि केवल शोर-शराबे में कार्यवाही को खत्म कर दिया जाना चाहिए।
धार्मिक दान की जांच
राम मंदिर निर्माण के लिए एकत्रित किए गए चंदे में अनियमितताओं का मुद्दा विपक्ष के लिए आगामी सत्र में एक बड़ा हथियार साबित हो सकता है। जयराम रमेश ने न केवल राम मंदिर, बल्कि उत्तराखंड के पवित्र धामों से जुड़ी कथित अनियमितताओं पर निष्पक्ष जांच की मांग उठाई है। कांग्रेस का यह दावा है कि जनता की आस्था का उपयोग गलत तरीके से किया जा रहा है, और सरकार को इन सभी मामलों की सच्चाई सार्वजनिक करनी चाहिए।
सर्वदलीय बैठक का महत्व
संसद सत्र के पूर्व होने वाली सर्वदलीय बैठकों के प्रति विपक्ष का नजरिया अब निराशाजनक हो गया है। जयराम रमेश के शब्दों में, ये बैठकें केवल एक रस्म निभाकर रह गई हैं, क्योंकि अंत में एजेंडा प्रधानमंत्री और गृह मंत्रालय की इच्छा पर ही तय होता है। कांग्रेस ने साफ किया है कि इस बार विपक्ष केवल दर्शक बनकर नहीं रहेगा, बल्कि सदन में इन सभी मुद्दों पर सरकार को जवाबदेह बनाने के लिए हर संभव कोशिश की जाएगी। यह सत्र आने वाले समय में देश की राजनीति की दिशा तय करने वाला साबित हो सकता है।








