पटना,अंग भारत। बिहार में मानसून की दस्तक के साथ ही कोसी, गंडक और गंगा जैसी प्रमुख नदियों का जलस्तर तेजी से बदलने लगा है, जिसे देखते हुए राज्य सरकार ने कमर कस ली है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की नीति के अनुरूप, उपमुख्यमंत्री एवं जल संसाधन मंत्री विजय कुमार चौधरी ने सिंचाई भवन में हुई एक उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक में स्पष्ट कर दिया है कि बाढ़ प्रबंधन में अब और देरी नहीं चलेगी। उन्होंने सभी संबंधित अधिकारियों को सात दिनों के भीतर ‘बाढ़ सुरक्षा चक्र’ को पूरी तरह सक्रिय और पुख्ता करने का डेडलाइन दे दिया है। बिहार की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि हर साल लाखों लोगों की जिंदगियां और खेतीबाड़ी इन तटबंधों की मजबूती पर टिकी होती है, इसलिए सरकार इस बार ‘शून्य लापरवाही’ (Zero Tolerance) की नीति अपना रही है।
तैयारियों का अल्टीमेटम
बैठक में उपमुख्यमंत्री ने उन सभी परियोजनाओं की समीक्षा की जिन्हें मानसून के आगमन से पहले ही पूरा हो जाना चाहिए था। मुख्य बिंदु ये हैं:
- सभी अधूरी कटाव निरोधक योजनाओं को आगामी 7 दिनों में हर हाल में पूरा करना होगा।
- तकनीकी या प्रशासनिक बाधाओं का बहाना अब नहीं चलेगा; स्थानीय स्तर पर तुरंत समाधान की जिम्मेदारी अभियंताओं की होगी।
- बाढ़ से निपटने वाले उपकरणों और संसाधनों का भौतिक सत्यापन अब सीधे मुख्यालय की टीमें करेंगी।
तटबंधों की कड़ी निगरानी
तटबंधों पर चौबीसों घंटे पहरा देना अब केवल एक सरकारी आदेश नहीं, बल्कि ड्यूटी का मुख्य हिस्सा है। जल संसाधन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को यह हिदायत दी गई है कि वे केवल कार्यालय में बैठकर रिपोर्ट न लें, बल्कि जमीनी स्तर पर जाकर कटाव और रिसाव की संभावनाओं को भांपें। तटबंधों की सुरक्षा के लिए फील्ड में तैनात अभियंताओं को अब हर दिन की स्थिति का विस्तृत ब्योरा मुख्यालय को देना अनिवार्य कर दिया गया है।
रात में होगा निरीक्षण
इस बार की रणनीति में सबसे बड़ा बदलाव ‘औचक रात्रि निरीक्षण’ का है। उपमुख्यमंत्री ने मुख्य अभियंताओं को साफ कहा है कि वे सप्ताह में कम-से-कम दो बार रात में फील्ड विजिट पर निकलें। इसका उद्देश्य यह देखना है कि:
- क्या बाढ़ सुरक्षा बल और श्रमिक वाकई अपने कैंपों में मौजूद हैं?
- क्या आपात स्थिति के लिए जरूरी संसाधन (जैसे टॉर्च, नाव, और लाइट) तैयार हैं?
- क्या तटबंधों के पहुंच पथ (Approach Roads) चलने लायक हैं या नहीं?
सामग्री का पर्याप्त भंडारण
बाढ़ आने पर भागदौड़ करने के बजाय, इस साल ‘एडवांस स्टॉक’ पर जोर दिया जा रहा है। विजय चौधरी ने निर्देश दिया कि संवेदनशील स्थलों पर अभी से बालू की बोरियां, भारी पत्थर, बांस के क्रेट्स और जाल पहुंचा दिए जाएं। अक्सर देखा जाता है कि ऐन मौके पर सामान न होने के कारण स्थिति हाथ से निकल जाती है, जिसे इस बार पूरी तरह खत्म करने का प्रयास किया जा रहा है।
प्रोत्साहन और कार्रवाई
सरकार ने स्पष्ट संकेत दिया है कि काम का मूल्यांकन अब प्रदर्शन के आधार पर होगा। जो अधिकारी और कर्मचारी इस मानसून के दौरान निष्ठा और सतर्कता से लोगों को बाढ़ से सुरक्षित रखेंगे, उन्हें सम्मानित किया जाएगा। वहीं, दूसरी ओर, यदि किसी संवेदनशील तटबंध पर लापरवाही बरती गई या निरीक्षण के दौरान खामियां मिलीं, तो संबंधित अधिकारी पर कठोर विभागीय कार्यवाही तय है। यह संदेश साफ है—लोगों की सुरक्षा से किसी भी स्तर पर समझौता नहीं होगा।
सत्यापन और समन्वय
अगले सात दिनों बाद मुख्यालय और जिला प्रशासन की एक संयुक्त टीम अलग-अलग संवेदनशील जिलों में जाकर किए गए कार्यों का भौतिक सत्यापन करेगी। यदि आंकड़ों में हेरफेर या तैयारियों में कमी पाई जाती है, तो जवाबदेही तय की जाएगी। जल संसाधन विभाग और जिला प्रशासन के बीच तालमेल बिठाने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है, ताकि राहत और बचाव कार्यों के दौरान कोई तकनीकी दिक्कत न आए। राज्य सरकार का एकमात्र लक्ष्य यही है कि नदियों के जलस्तर के बदलाव का असर आम जनता के जीवन पर न्यूनतम हो।







