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राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु करेंगी ‘सौश्रुतम् 2026’ का उद्घाटन, आयुर्वेद और आधुनिक सर्जरी पर होगा मंथन

अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान में आयोजित सौश्रुतम् 2026 सेमिनार का उद्घाटन करतीं राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु, साथ में आधुनिक सर्जरी और आयुर्वेद के विशेषज्ञ डॉक्टर

नई दिल्ली,अंग भारत। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु नई दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान (AIIA) में ‘सौश्रुतम् 2026’ नामक तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सेमिनार का उद्घाटन करेंगी। यह आयोजन 15 से 17 जुलाई तक चलेगा, जिसमें चिकित्सा जगत के दिग्गज आयुर्वेद की प्राचीन शल्य चिकित्सा (सर्जरी) और आधुनिक मेडिकल साइंस को एक मंच पर लाने की रणनीति तैयार करेंगे। इस सेमिनार का मूल मकसद केवल इतिहास को याद करना नहीं, बल्कि मरीजों के इलाज को अधिक सुलभ और किफायती बनाने के लिए दोनों विधाओं के बीच एक मजबूत पुल तैयार करना है। आज की स्वास्थ्य प्रणाली में जब सर्जरी का खर्च लगातार बढ़ रहा है, तब प्राचीन और आधुनिक तकनीकों का यह मेल आम लोगों के लिए वरदान साबित हो सकता है।

क्यों खास है ‘सौश्रुतम् 2026’?

भारत में सर्जरी का इतिहास हजारों साल पुराना है। आचार्य सुश्रुत को दुनिया का पहला सर्जन माना जाता है, जिन्होंने प्लास्टिक सर्जरी से लेकर मोतियाबिंद के ऑपरेशन तक की तकनीकें सदियों पहले खोजी थीं। उनकी जयंती पर आयोजित यह सेमिनार इस बात का प्रमाण है कि भारत अपनी जड़ों की ओर लौट रहा है, लेकिन वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ। आज की तारीख में केवल एलोपैथी या केवल आयुर्वेद से मरीजों की हर समस्या का समाधान मुमकिन नहीं है। उदाहरण के लिए, कैंसर के मरीजों में कीमोथेरेपी के बाद होने वाले साइड इफेक्ट्स को कम करने में आयुर्वेद की जड़ी-बूटियां काफी मददगार साबित होती हैं। इस सेमिनार में इसी तरह के व्यावहारिक मुद्दों पर सीधी बात होगी।

आधुनिक तकनीक से लैस निदान

इस कार्यक्रम की सबसे बड़ी हाइलाइट्स में से एक है अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान में लगभग 14.5 करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत से स्थापित की गई 3-टेस्ला हाई-फील्ड एमआरआई मशीन। अक्सर लोगों को लगता है कि आयुर्वेद अस्पतालों में केवल जड़ी-बूटियों और काढ़े से इलाज होता है। यह नई मशीन इस भ्रम को पूरी तरह तोड़ देगी। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित वर्कफ्लो और बायोमेट्रिक सिस्टम से लैस यह एमआरआई मशीन बेहद सटीक और तेज जांच करेगी। जब बीमारी का पता सही समय पर और सटीक तरीके से चलेगा, तभी आयुर्वेदिक डॉक्टर भी बेहतर इलाज की दिशा तय कर सकेंगे। यह आधुनिक तकनीक और पारंपरिक थेरेपी का सीधा जुड़ाव है।

महिला चिकित्सकों का करियर रिपोर्ट

इस सेमिनार में एक बेहद संवेदनशील और जरूरी रिपोर्ट जारी की जा रही है, जिसका शीर्षक है “आयुर्वेद महिला स्नातकों के पेशेवर करियर का मूल्यांकन”। राष्ट्रीय भारतीय चिकित्सा प्रणाली आयोग (NCISM) द्वारा तैयार की गई यह रिपोर्ट केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि यह उन हजारों महिला डॉक्टरों के करियर की असलियत को बयां करेगी जो आयुर्वेद की पढ़ाई करने के बाद मैदान में उतरती हैं। आज आयुष कॉलेजों में छात्राओं की संख्या लड़कों के मुकाबले काफी ज्यादा है, लेकिन क्या वे पढ़ाई के बाद प्रैक्टिस कर पा रही हैं? उनके सामने क्या सामाजिक और पेशेवर चुनौतियां हैं? इन सवालों के जवाब इस रिपोर्ट के जरिए मिलेंगे, जिससे सरकार को भविष्य की नीतियां बनाने में मदद मिलेगी।

वैश्विक स्तर पर बढ़ती स्वीकार्यता

आयुर्वेद को अब केवल भारत तक सीमित मान लेना बड़ी भूल होगी। इस अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में दुनिया के कई देशों के विशेषज्ञ शामिल हो रहे हैं। इनमें प्रमुख देशों की सूची और उनके संभावित योगदान को हम नीचे दी गई तालिका से समझ सकते हैं:

देश का नाम सहयोग और चर्चा का मुख्य क्षेत्र
थाईलैंड व श्रीलंका पारंपरिक हर्बल चिकित्सा और साझा रिसर्च
यूनाइटेड किंगडम (UK) एकीकृत चिकित्सा के लिए क्लिनिकल ट्रायल और प्रोटोकॉल
इजराइल व ग्रीस मरीजों के दर्द प्रबंधन और मानसिक स्वास्थ्य पर शोध
नेपाल व इंडोनेशिया हिमालयी जड़ी-बूटियों का संरक्षण और पारंपरिक शल्य क्रिया

मुख्य चर्चा और व्यावहारिक सत्र

तीन दिनों तक चलने वाले इस सेमिनार में कोई हवाई बातें नहीं होंगी, बल्कि सीधे क्लिनिकल प्रैक्टिस से जुड़े विषयों पर बात होगी। डॉक्टरों और सर्जनों के लिए नीचे दिए गए विषयों पर विशेष सत्र रखे गए हैं:

  • मलाशय रोग विज्ञान: बवासीर और भगंदर (Fistula) जैसी बीमारियों में आयुर्वेद की ‘क्षारसूत्र’ विधि पूरी दुनिया में सबसे असरदार मानी जाती है। इस पर नई रिसर्च साझा की जाएगी।
  • अग्निकर्म और मर्म चिकित्सा: बिना किसी सर्जरी के गंभीर दर्द से राहत दिलाने वाली इन प्राचीन थेरेपीज के वैज्ञानिक प्रमाण पेश किए जाएंगे।
  • मेडिको-लीगल मामले: एकीकृत चिकित्सा (Integrative Medicine) अपनाते समय डॉक्टरों को किन कानूनी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है, इस पर खुली बहस होगी।
  • रीकंस्ट्रक्टिव सर्जरी: दुर्घटनाओं या गंभीर बीमारियों के बाद अंगों को दोबारा ठीक करने की आधुनिक तकनीकों के साथ आयुर्वेद के घाव भरने के सिद्धांतों का मेल।

मरीजों को क्या मिलेगा फायदा?

जब हम किसी नई नीति या सेमिनार की बात करते हैं, तो सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि इससे आम मरीज को क्या फायदा होगा? इसका सीधा उत्तर है – बेहतर और सुरक्षित स्वास्थ्य सेवाएं। जब एक एलोपैथिक सर्जन और एक आयुर्वेदिक शल्य चिकित्सक एक साथ बैठकर मरीज की स्थिति का आकलन करेंगे, तो इलाज का खर्च भी कम होगा और मरीज को अनावश्यक दवाओं के दुष्प्रभावों से भी राहत मिलेगी।

“इंटीग्रेटेड मेडिसिन यानी एकीकृत चिकित्सा ही आने वाले समय का भविष्य है। हमें मरीज को ठीक करने से मतलब होना चाहिए, चाहे वह विधा कोई भी हो। ‘सौश्रुतम् 2026’ इसी दिशा में उठाया गया एक ऐतिहासिक कदम है।” – यह विचार आज के कई प्रगतिशील चिकित्सा विशेषज्ञों का है।

इस सेमिनार में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के साथ केंद्रीय आयुष मंत्री प्रतापराव जाधव और दिल्ली के उपराज्यपाल तरनजीत सिंह संधू की मौजूदगी यह साफ करती है कि सरकार इस एकीकरण को लेकर कितनी गंभीर है। अब समय आ गया है कि आयुर्वेद को केवल एक वैकल्पिक पैथी न मानकर मुख्यधारा की चिकित्सा व्यवस्था का हिस्सा बनाया जाए।

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अंग भारत • रिपोर्टर

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