गोड्डा,अंगभारत:- गोड्डा जिले में जल संकट से निपटने और खेती को बेहतर बनाने के लिए 7वीं लघु सिंचाई (Minor Irrigation) और द्वितीय जल निकाय (Water Bodies) जनगणना का काम बेहद तेजी से चल रहा है। 23 जुलाई 2026 तक की रिपोर्ट के मुताबिक, जिले के कुल 2,222 गांवों में से 1,946 गांवों का सर्वे पूरा हो चुका है। यह कुल लक्ष्य का लगभग 87.58 फीसदी है। इस जनगणना का मुख्य मकसद जमीन के नीचे और सतह पर मौजूद पानी के स्रोतों का एक वैज्ञानिक डेटा तैयार करना है, ताकि सूखे की मार झेलने वाले गोड्डा जिले में सिंचाई की मजबूत योजनाएं बनाई जा सकें और खेती को नया जीवन मिल सके।
क्यों जरूरी है यह गणना?
भारत में मानसून का मिजाज तेजी से बदल रहा है। कभी सूखा तो कभी बेमौसम बारिश से किसान परेशान रहते हैं। गोड्डा जिले में भी खेती पूरी तरह से पानी की उपलब्धता पर टिकी है। जब तक प्रशासन को यह नहीं पता होगा कि किस गांव में कितने कुएं, तालाब, या चापाकल चालू हालत में हैं, तब तक पानी के सही इस्तेमाल की नीति नहीं बन सकती। इसी कमी को दूर करने के लिए केंद्र और राज्य सरकार मिलकर यह डिजिटल डेटाबेस तैयार करवा रही हैं। इससे सरकारी योजनाओं का पैसा सीधे उन जगहों पर लगेगा जहां सचमुच पानी की किल्लत है।
प्रखंडवार प्रगति का हाल
इस सर्वे में गोड्डा के कुछ प्रखंडों ने कमाल का काम किया है। बसंतराय, मेहरमा और गोड्डा प्रखंड में प्रगणकों ने 100% काम पूरा कर लिया है। यानी इन इलाकों के हर एक जल स्रोत की जानकारी पोर्टल पर अपलोड हो चुकी है। बाकी प्रखंडों की स्थिति भी काफी अच्छी है, जिसे नीचे दी गई तालिका से समझा जा सकता है:
| प्रखंड का नाम | प्रगति (प्रतिशत में) |
|---|---|
| बसंतराय, मेहरमा, गोड्डा | 100% |
| सुंदरपहाड़ी | 99.39% |
| पथरगामा | 93.26% |
| बोआरीजोर | 93.25% |
| ठाकुरगंगटी | 79.69% |
| पोड़ैयाहाट | 75.36% |
| महागामा | 63.82% |
धीमे काम वाले क्षेत्र
ठाकुरगंगटी, पोड़ैयाहाट और महागामा में अभी भी काफी काम बाकी है। महागामा में केवल 63.82% काम ही हो पाया है। जिला प्रशासन ने इन क्षेत्रों में काम की गति बढ़ाने का सख्त निर्देश दिया है ताकि तय समय में पूरा डेटाबेस तैयार हो सके। खेतों तक पानी पहुंचाने की इस मुहिम में कोई भी ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
जल स्रोतों का वर्गीकरण
सर्वे के दौरान जुटाए गए आंकड़े यह बताते हैं कि गोड्डा में पानी के पारंपरिक और आधुनिक स्रोतों की क्या स्थिति है। अब तक प्रगणकों ने कुल मिलाकर तीन प्रमुख श्रेणियों में डेटा जुटाया है:
- भू-जल स्रोत (Ground Water Sources): कुल 4,874 स्रोत दर्ज किए गए हैं। इनमें मुख्य रूप से कुएं, बोरवेल और ट्यूबवेल शामिल हैं जो जमीन के नीचे से पानी खींचते हैं।
- सतही जल स्रोत (Surface Water Sources): कुल 992 स्रोत मिले हैं। इसमें नदियां, नहरें और प्राकृतिक झरने शामिल हैं जिनसे सीधे खेतों तक पानी पहुंचाया जाता है।
- जल निकाय (Water Bodies): कुल 1,647 जल निकाय दर्ज हुए हैं। इनमें तालाब, आहर, पईन और चेकडैम शामिल हैं, जो बारिश के पानी को रोककर भूजल स्तर को सुधारने में मदद करते हैं।
किसानों को सीधा फायदा
इस डेटा के तैयार होने से किसानों को सबसे ज्यादा फायदा होगा। अक्सर देखा जाता है कि कई सरकारी बोरवेल या तालाब कागजों पर तो होते हैं, लेकिन जमीन पर उनमें पानी नहीं होता। इस वैज्ञानिक सर्वे से हर जल स्रोत की जीपीएस लोकेशन और उसकी वास्तविक स्थिति का पता चल रहा है।
“जब हर जल स्रोत का सटीक डेटा ऑनलाइन उपलब्ध होगा, तो प्रशासन के लिए यह तय करना आसान हो जाएगा कि किस गांव को पहले सिंचाई सहायता की जरूरत है।” – स्थानीय कृषि विशेषज्ञ
इस डेटा के जरिए प्रशासन को पता चलेगा कि किस इलाके में चेकडैम बनाने की जरूरत है और कहां तालाब की उड़ाही (खुदाई) करानी है। इसके अलावा, पानी की उपलब्धता के आधार पर कृषि विभाग किसानों को सलाह दे सकेगा कि उन्हें धान बोना चाहिए या कम पानी वाली दलहन-तिलहन की फसलें।
प्रशासन की पैनी नजर
सर्वे का काम सिर्फ डेटा कलेक्ट करने तक सीमित नहीं है। जिला प्रशासन ने साफ कर दिया है कि प्रगणकों द्वारा अपलोड किए गए हर आंकड़े का भौतिक सत्यापन (Physical Verification) किया जाएगा। इसका मतलब है कि अधिकारी खुद मौके पर जाकर जांच करेंगे कि पोर्टल पर दर्ज कुआं या तालाब सच में वहां मौजूद है या नहीं। गुणवत्ता से समझौता करने वाले कर्मियों पर कार्रवाई की बात भी कही गई है ताकि कोई गलत जानकारी सरकारी रिकॉर्ड का हिस्सा न बने। आने वाले दिनों में यह डेटा गोड्डा की कृषि व्यवस्था की तस्वीर बदलने में मील का पत्थर साबित होगा।







