गुवाहाटी,अंग भारत। असम में मानसून की विनाशकारी बारिश और बाढ़ के चलते हालात एक बार फिर गंभीर हो गए हैं। राज्य के धेमाजी और शिवसागर जैसे जिलों में उफनती नदियों ने दोबारा तबाही मचानी शुरू कर दी है, जिससे प्रभावित लोगों की मुश्किलें दोगुनी हो गई हैं। वर्तमान में असम के 7 प्रमुख जिले—गोलाघाट, शिवसागर, चराईदेव, बजाली, धेमाजी, शोणितपुर और जोरहाट—इस जलप्रलय की चपेट में हैं। इस आपदा के कारण राज्य की कुल 1,78,837 आबादी गंभीर संकट से जूझ रही है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस साल आई बाढ़ के कारण अब तक कुल 82 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं, हालांकि राहत की बात यह रही कि हाल ही के शनिवार को किसी नई मौत की खबर नहीं आई है। जमीनी स्तर पर विस्थापन और नुकसान का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है जिससे आम जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया है।
खतरे के निशान पर नदियां
असम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (ASDMA) द्वारा जारी ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, क्षेत्र की प्रमुख नदियां अपने रौद्र रूप में हैं। शिवसागर में बहने वाली दिखौ नदी और नुमलीगढ़ में बहने वाली धनसिरि नदी का जलस्तर खतरे के निशान को पार कर चुका है। पानी का बहाव इतना तेज है कि नदी किनारे बने तटबंधों पर भारी दबाव है और कई जगहों पर रिसाव की खबरें आ रही हैं। ऊपरी असम के जिलों—शिवसागर, चराईदेव, जोरहाट और गोलाघाट में स्थिति सबसे ज्यादा संवेदनशील बनी हुई है। इन क्षेत्रों में रात के समय पानी का स्तर अचानक बढ़ जाने से लोगों को संभलने का मौका भी नहीं मिल रहा है। पानी के इस तेज बहाव के कारण रिहायशी इलाकों में हाहाकार मचा हुआ है और लोग अपना जरूरी सामान लेकर सुरक्षित जगहों की ओर भाग रहे हैं।
प्रभावित गांवों के आंकड़े
बाढ़ ने इस बार असम के ग्रामीण इलाकों और कृषि व्यवस्था को सबसे ज्यादा चोट पहुंचाई है। सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, कुल 20 राजस्व मंडलों (Revenue Circles) के अंतर्गत आने वाले 349 गांव पूरी तरह पानी में डूब चुके हैं। नीचे दी गई तालिका से इस तबाही के पैमाने को आसानी से समझा जा सकता है:
| प्रभावित जिले | प्रभावित आबादी | जलमग्न गांव | कृषि भूमि नुकसान |
|---|---|---|---|
| गोलाघाट, शिवसागर, चराईदेव, बजाली, धेमाजी, शोणितपुर, जोरहाट | 1,78,837 लोग | 349 गांव | 15,060 हेक्टेयर |
यह केवल सरकारी आंकड़े नहीं हैं, बल्कि यह लाखों परिवारों की उजड़ चुकी जिंदगी की कड़वी हकीकत है। उपजाऊ जमीनें अब कीचड़ और मलबे के नीचे दब गई हैं, जिससे आने वाले महीनों में भी खेती करना एक बड़ी चुनौती साबित होगा।
किसानों पर दोहरी मार
असम के ग्रामीण परिवारों की पूरी अर्थव्यवस्था खेती-किसानी पर टिकी है। इस बाढ़ ने लगभग 15,060 हेक्टेयर कृषि भूमि को पूरी तरह जलमग्न कर दिया है। खेतों में खड़ी धान की फसलें कई दिनों से मटियाले पानी में डूबे रहने के कारण सड़ चुकी हैं। इस समय धान की दोबारा बुआई करना किसी भी किसान के लिए संभव नहीं है क्योंकि मिट्टी पूरी तरह दलदल में बदल चुकी है। किसानों की इस बड़ी समस्या को देखते हुए कृषि विभाग ने अब सक्रिय कदम उठाने का फैसला किया है। किसानों को इस बड़े नुकसान से उबारने के लिए वैकल्पिक खेती (Alternative Farming) की योजना बनाई जा रही है। इसके तहत विभाग प्रभावित किसानों को कम समय में उगने वाली वैकल्पिक फसलों के बीज, खाद और जरूरी तकनीकी संसाधन मुहैया कराएगा, ताकि पानी घटने के बाद किसान अपनी आजीविका फिर से शुरू कर सकें और उनके सामने भुखमरी का संकट न खड़ा हो।
राहत और बचाव अभियान
आपदा की इस घड़ी में लोगों की जान बचाना और उन तक मदद पहुंचाना प्रशासन की सबसे पहली प्राथमिकता है। वर्तमान में कुल 61 राहत केंद्र चलाए जा रहे हैं, जिनमें से 44 सक्रिय राहत शिविर (Relief Camps) हैं और 17 राहत वितरण केंद्र (Relief Distribution Centers) के रूप में काम कर रहे हैं। इन शिविरों में इस समय 11,489 बेघर लोगों ने शरण ले रखी है। इसके अलावा, जो लोग शिविरों में नहीं आ पाए हैं लेकिन बाढ़ के पानी से घिरे हुए हैं, ऐसे 5,569 जरूरतमंद लोगों तक राहत वितरण केंद्रों के जरिए राशन, पानी, मोमबत्ती और तिरपाल जैसी जरूरी चीजें पहुंचाई जा रही हैं।
इस बड़े रेस्क्यू ऑपरेशन में निम्नलिखित सरकारी सुरक्षा बल और नागरिक एजेंसियां जमीनी स्तर पर दिन-रात काम कर रही हैं:
- एसडीआरएफ (SDRF): स्थानीय जल निकायों और गांवों में फंसे लोगों को सुरक्षित निकालने के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार।
- एनडीआरएफ (NDRF): अत्यधिक जोखिम वाले क्षेत्रों में बड़ी नावों और आधुनिक मरीन उपकरणों के साथ तैनात।
- भारतीय सेना और अर्धसैनिक बल: दुर्गम और कटे हुए इलाकों में पुलों का निर्माण और बड़े पैमाने पर बचाव कार्यों का संचालन।
- भारतीय वायु सेना (IAF): पूरी तरह से कटे हुए टापू नुमा इलाकों में राशन और दवाइयों के पैकेट एयरड्रॉप करने के लिए तैयार।
- जिला आपदा प्रतिक्रिया बल (DDRF): स्थानीय जिला प्रशासन के साथ मिलकर त्वरित कार्रवाई।
- असम पुलिस और स्थानीय प्रशासन: राहत शिविरों के प्रबंधन, कानून व्यवस्था और सुरक्षा की निगरानी।
- अग्निशमन और आपातकालीन सेवाएं (F & ES): जल निकासी और मलबे को हटाने के काम में सक्रिय।
- स्वयंसेवक और सिविल डिफेंस: पीड़ित लोगों तक भोजन पैकेट और दवाइयां पहुंचाने में जमीनी मदद।
बीमारियों का बढ़ता खतरा
बाढ़ का पानी जैसे-जैसे ठहरता है या धीरे-धीरे उतरता है, वैसे-वैसे जलजनित बीमारियों और महामारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। इस स्वास्थ्य संकट से निपटने के लिए शनिवार को स्वास्थ्य विभाग की ओर से 79 विशेष मेडिकल टीमों को प्रभावित इलाकों में रवाना किया गया। ये टीमें राहत शिविरों और बाढ़ पीड़ित गांवों में जाकर लोगों का इलाज कर रही हैं, ओआरएस के पैकेट बांट रही हैं और पानी को साफ करने वाली क्लोरीन की गोलियां दे रही हैं। इसके अतिरिक्त, जिन सुदूर और दुर्गम इलाकों का सड़क संपर्क पूरी तरह टूट चुका है, वहां डॉक्टरों और जीवन रक्षक दवाओं को पहुंचाने के लिए तीन विशेष नावों (Medical Boats) का लगातार उपयोग किया जा रहा है ताकि कोई भी बीमार व्यक्ति इलाज से वंचित न रहे।
ढांचागत नुकसान की चुनौती
इस भीषण बाढ़ ने असम के बुनियादी ढांचे को गहरी चोट पहुंचाई है। राज्य के अलग-अलग हिस्सों से सड़कों के टूटने, छोटे पुलों के बह जाने और बिजली के खंभों के उखड़ने की खबरें लगातार आ रही हैं। कई इलाकों का संपर्क मुख्य जिला मुख्यालयों से पूरी तरह कट चुका है, जिससे राहत सामग्री ले जा रहे बड़े वाहनों को काफी दूर ही रुकना पड़ रहा है। इसके बाद राहत कर्मियों को छोटी नावों के सहारे लंबी दूरी तय करनी पड़ रही है। बिजली के बुनियादी ढांचे को पहुंचे नुकसान के कारण सैकड़ों गांवों में पिछले कई दिनों से पूरी तरह अंधेरा छाया हुआ है और मोबाइल नेटवर्क भी ठप पड़े हैं। जब बाढ़ का पानी पूरी तरह उतर जाएगा, तब सरकार के सामने इन सड़कों, पुलों और बिजली ग्रिड को दोबारा खड़ा करने की एक बहुत बड़ी आर्थिक और प्रशासनिक चुनौती होगी।








