भागलपुर, अंग भारत। केंद्र सरकार द्वारा लाए गए नए लेबर कोड के खिलाफ देशभर के मजदूर संगठनों ने हाल ही में विरोध दर्ज कराया है। इसी कड़ी में, भागलपुर के स्टेशन चौक पर सैकड़ों मजदूरों ने काली पट्टी बांधकर “काला दिवस” मनाया और सरकार की इन नीतियों को श्रमिक विरोधी करार देते हुए इन्हें तत्काल वापस लेने की मांग की। यह प्रदर्शन केवल एक सांकेतिक विरोध नहीं था, बल्कि उन चिंताओं का प्रकटीकरण है जो पिछले कुछ समय से औद्योगिक क्षेत्रों में पनप रही हैं।
विरोध का मुख्य कारण
मजदूरों और यूनियनों का मुख्य तर्क यह है कि नए लेबर कोड श्रम कानूनों को सरल बनाने के नाम पर वास्तव में मजदूरों के संरक्षण को खत्म कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों का मानना है कि इन कानूनों से कंपनियों को ‘हायर एंड फायर’ यानी आसानी से नौकरी पर रखने और निकालने की खुली छूट मिल जाएगी।
- काम के घंटों में अनियंत्रित बदलाव की आशंका।
- ट्रेड यूनियनों की सौदेबाजी करने की ताकत में कमी।
- न्यूनतम वेतन और सामाजिक सुरक्षा के प्रावधानों में अस्पष्टता।
- कॉरपोरेट घरानों को अधिक कानूनी सुरक्षा मिलना।
किसान-मजदूर की एकता
इस आंदोलन की सबसे बड़ी खासियत संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) की सक्रिय भागीदारी रही। ऐक्टू, एटक, सीटू, सेवा और इंटक जैसे प्रमुख मजदूर संगठनों के साथ मिलकर किसानों ने यह संदेश दिया है कि आर्थिक नीतियां केवल एक वर्ग को नहीं, बल्कि समाज के पूरे आधारभूत ढांचे को प्रभावित करती हैं। इस एकजुटता ने सरकार पर दबाव बनाने का काम किया है, क्योंकि कृषि और श्रम क्षेत्र के लोग लंबे समय से अपनी मांगों को लेकर मुखर रहे हैं।
कॉरपोरेट हित का आरोप
मंच से संबोधित करते हुए श्रमिक नेताओं ने स्पष्ट कहा कि सरकार ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ के नाम पर उद्योगपतियों के मुनाफे को प्राथमिकता दे रही है। उनका आरोप है कि दशकों के संघर्ष के बाद हासिल हुए श्रम अधिकार, जैसे कि उचित कार्य अवधि और सुरक्षित छंटनी प्रक्रिया, अब कमजोर पड़ रहे हैं। वक्ताओं ने इसे “गुलामी की ओर ले जाने वाला कदम” बताया, जिससे संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रों के मजदूरों का शोषण बढ़ सकता है।
आंदोलन की आगे की राह
प्रदर्शनकारियों ने याद दिलाया कि 12 फरवरी 2026 को हुई देशव्यापी आम हड़ताल में मजदूरों ने स्पष्ट रूप से इन कानूनों को खारिज कर दिया था। बावजूद इसके, सरकार के रुख में बदलाव न आने से आक्रोश बढ़ता जा रहा है। मजदूरों ने साफ किया है कि:
यदि सरकार अपनी जिद्द पर कायम रहती है और इन कानूनों को बिना संशोधन के लागू करती है, तो भविष्य में आंदोलन को और उग्र और व्यापक रूप दिया जाएगा।
प्रभावित होने वाले वर्ग
यह कानून केवल फैक्ट्री श्रमिकों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इसका असर उन लाखों लोगों पर पड़ने वाला है जो अनुबंध (contract) या दिहाड़ी मजदूरी पर काम करते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि श्रम कानून में बड़े बदलावों के लिए सभी पक्षों के बीच लंबी चर्चा अनिवार्य होनी चाहिए थी। बिना व्यापक सहमति के लागू होने वाले ऐसे नियम अक्सर धरातल पर विवाद और असंतोष का कारण बनते हैं।
निष्कर्ष
भागलपुर का यह प्रदर्शन देश के बदलते औद्योगिक परिदृश्य का एक छोटा लेकिन अहम हिस्सा है। यह सरकार और मजदूर वर्ग के बीच बढ़ती खाई को दर्शाता है। अब गेंद सरकार के पाले में है कि वह इस असंतोष को कैसे दूर करती है, क्योंकि कोई भी कानून जो देश के करोड़ों मेहनतकश लोगों के हितों को अनदेखा करता है, उसकी सफलता संदिग्ध बनी रहती है। आने वाले समय में यूनियनों का रुख इस बात पर निर्भर करेगा कि प्रशासन इन विरोध प्रदर्शनों को किस गंभीरता से लेता है।








