पेरिस (फ्रांस),अंग भारत। पेरिस समेत पूरे फ्रांस में राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की सरकार की नीतियों के खिलाफ जनआक्रोश चरम पर पहुंच गया है। बढ़ती महंगाई, कम वेतन, शिक्षा बजट में कटौती और गिरती सार्वजनिक सेवाओं के विरोध में आहूत इस देशव्यापी हड़ताल में श्रमिक यूनियनों के दावे के अनुसार लगभग 16 लाख कर्मचारी, छात्र और शिक्षक सड़कों पर उतर चुके हैं। यद्यपि सरकारी आंकड़ों में प्रदर्शनकारियों की संख्या लगभग 6 लाख बताई गई है, लेकिन इस व्यापक विरोध प्रदर्शन ने फ्रांस की जीवनशैली को पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर दिया है। पेरिस, ल्यों और बोर्डो जैसे प्रमुख शहरों में स्थिति नियंत्रण से बाहर होती दिख रही है, जहां उग्र भीड़ को संभालने के लिए पुलिस को आंसू गैस और लाठीचार्ज का सहारा लेना पड़ा है।
सड़कों पर भड़की हिंसा
फ्रांसीसी राजधानी पेरिस के ऐतिहासिक ‘नेशन स्क्वायर’ पर प्रदर्शनकारियों ने देर रात मशाल जुलूस निकाला और लाल फ्लेयर्स जलाकर सरकार विरोधी नारेबाजी की। इस दौरान पुलिस और उग्र भीड़ के बीच सीधी झड़पें शुरू हो गईं। हिंसा की लपटें पेरिस के बाहर भी तेजी से फैलीं। ल्यों शहर में उपद्रवियों ने कई वाहनों में आग लगा दी, जबकि बोर्डो और मार्सिले में भीड़ पर काबू पाने के लिए सुरक्षाबलों को आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े। टूलूज शहर के पास एक स्कूल में असामाजिक तत्वों द्वारा आग लगाए जाने की घटना सामने आई है, जिसकी पुष्टि फ्रांस के शिक्षा मंत्री एडुआर्ड गेफ्रे ने की है।
फ्रांस के गृह मंत्रालय के अनुसार, देशभर में आगजनी की 86 घटनाओं पर दमकलकर्मियों को तुरंत कार्रवाई करनी पड़ी। इस दौरान उपद्रव मचाने के आरोप में 448 से अधिक प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया है। कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए फ्रांस सरकार ने पूरे देश में 70,000 से अधिक पुलिस जवानों की तैनाती की है। इसके अतिरिक्त संवेदनशील इलाकों की निगरानी के लिए बख्तरबंद गाड़ियों, ड्रोन और हेलीकॉप्टरों की मदद ली जा रही है। झड़पों में कई पुलिसकर्मी घायल हुए हैं। देश के गृहमंत्री लॉरेंट नुनेज़ ने कहा कि पुलिस और सुरक्षा बलों ने अत्यधिक तनावपूर्ण माहौल में भी साहस और दृढ़ संकल्प के साथ अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन किया है।
“सुरक्षा बलों ने बेहद कठिन परिस्थितियों में भी असाधारण साहस और संयम का परिचय देते हुए स्थिति पर नियंत्रण बनाए रखा है।” — लॉरेंट नुनेज़, गृहमंत्री
आंदोलनकारियों की मुख्य मांगें
इस देशव्यापी हड़ताल के पीछे आर्थिक असंतोष एक प्रमुख कारण है। प्रदर्शनकारी कर्मचारियों और छात्र संगठनों ने सरकार के सामने स्पष्ट मांगें रखी हैं। फ्रांस में वर्तमान में न्यूनतम वेतन 12.31 यूरो (भारतीय मुद्रा में 1,293.90 रुपये) प्रति घंटा है, जिसे बढ़ाने की मांग की जा रही है। इसके साथ ही, कर्मचारियों के बैंक खाते में आने वाले नेट वेतन में हर महीने कम से कम 100 यूरो (लगभग 10,511 रुपये) की बढ़ोतरी की मांग की गई है।
प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांगों और वित्तीय आंकड़ों का विवरण इस प्रकार है:
| मांग / विषय | वर्तमान स्थिति | प्रदर्शनकारियों की मांग |
|---|---|---|
| न्यूनतम वेतन (प्रति घंटा) | 12.31 यूरो (₹1,293.90) | तत्काल बढ़ोतरी |
| मासिक नेट वेतन बढ़ोतरी | सामाजिक कटौतियों के बाद सीमित | कम से कम 100 यूरो (₹10,511) अतिरिक्त |
| डीजल की कीमतें | 2.37 यूरो (₹249.11) प्रति लीटर | ईंधन पर टैक्स में तुरंत कटौती |
| शिक्षा बजट | बजट में कटौती जारी | 10 अरब डॉलर से अधिक की वृद्धि |
| विश्वविद्यालय सीटें | सीमित क्षमता | 2,50,000 नई अतिरिक्त सीटें |
वैश्विक संकट और ईरान युद्ध के कारण फ्रांस में डीजल की कीमतें 2.37 यूरो (लगभग 249.11 रुपये) प्रति लीटर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई हैं। इस वजह से आम नागरिकों पर टैक्स का बोझ काफी बढ़ गया है। हड़ताल पर बैठे संगठन ईंधन करों को घटाने के साथ-साथ अस्पतालों, स्कूलों और विश्वविद्यालयों के सार्वजनिक बजट में की जा रही कटौती को तुरंत रोकने की मांग कर रहे हैं। वहीं छात्र समूहों ने स्कूलों के बुनियादी ढांचे में 1.5 अरब डॉलर के तत्काल निवेश की अपील की है।
सार्वजनिक सेवाओं पर असर
इस आंदोलन के कारण फ्रांस का सामान्य जनजीवन ठप सा हो गया है। पेरिस के दो सबसे प्रमुख पर्यटन केंद्र, एफिल टावर और लौवर संग्रहालय को सुरक्षा कारणों से आंशिक रूप से बंद करना पड़ा है। देश के लगभग एक तिहाई हाई स्कूल पूरी तरह बंद हैं या वहां पढ़ाई बुरी तरह प्रभावित हुई है। छात्रों ने जगह-जगह मुख्य सड़कों पर नाकेबंदी कर दी है, जिससे यातायात व्यवस्था ध्वस्त हो गई है।
पब्लिक ट्रांसपोर्ट पूरी तरह चरमरा गया है। रेलवे सेवाएं, बस संचालन और स्थानीय परिवहन ठप होने से आम यात्रियों को भारी असुविधा हो रही है। आंदोलनकारियों की अपील पर देश की प्रमुख तेल रिफाइनरियों में काम बंद कर दिया गया है। इतना ही नहीं, परमाणु ऊर्जा संयंत्रों में काम ठप होने के कारण बिजली उत्पादन में भारी गिरावट आई है, जिसके चलते फ्रांस को अपनी जरूरत पूरी करने के लिए पड़ोसी देशों से बिजली आयात करनी पड़ रही है।
सरकार का रुख और योजनाएं
येलो वेस्ट्स (जिलेट्स जोंस) समन्वय समूह ने स्थानीय स्तर पर नाकेबंदी तेज करने की चेतावनी दी है। 7 नवंबर को पेरिस के ऐतिहासिक ‘प्लेस डी ला कॉनकॉर्ड’ पर एक विशाल प्रदर्शन का आह्वान किया गया है। येलो वेस्ट आंदोलनकारियों की सीधी मांग है कि राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और उनकी पूरी सरकार तुरंत इस्तीफा दे तथा देश में नई संवैधानिक व्यवस्था लागू की जाए।
चौतरफा दबाव को देखते हुए फ्रांस के प्रधानमंत्री सेबस्तियन लेकोर्नू ने स्थिति पर चर्चा करने के लिए आगामी सोमवार को ट्रेड यूनियनों और नियोक्ताओं के साथ एक आपातकालीन बैठक बुलाई है। हालांकि, अमेरिकी समाचार एजेंसी सीएनएन के विश्लेषकों का मानना है कि इन कठोर मांगों को आसानी से पूरा करना सरकार के लिए मुमकिन नहीं होगा। प्रदर्शनकारियों ने साफ संकेत दिया है कि अगर उनकी मांगें नहीं मानी गईं, तो वे क्रिसमस और अगले वसंत में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव तक अपना विरोध प्रदर्शन जारी रखेंगे। फ्रांस की इस अशांति की लपटें अब यूरोप के अन्य देशों जैसे स्पेन, इटली, पुर्तगाल और बेल्जियम तक भी पहुंचने लगी हैं, जहां की यूनियनों ने भी फ्रांस के मजदूरों के प्रति एकजुटता जताई है।








