सुपौल, अंग भारत। बिहार के सुपौल जिले में स्थित जिला उद्योग केंद्र के सम्मेलन कक्ष में पीएम विश्वकर्मा योजना के तहत एक दिवसीय विशेष जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक कारीगरों और शिल्पकारों को डिजिटल तकनीक, वित्तीय सहायता और आधुनिक विपणन तकनीकों से जोड़कर उनके कारोबार को आगे बढ़ाना है। भारत सरकार के सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय के तहत एमएसएमई-डीएफओ, मुजफ्फरपुर द्वारा आयोजित इस कार्यशाला में स्थानीय कारीगरों को ई-कॉमर्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के प्रयोग के बारे में जानकारी प्रदान की गई।
सुपौल में जागरूकता कार्यक्रम
गुरुवार को आयोजित इस कार्यक्रम का औपचारिक शुभारंभ दीप प्रज्वलित कर किया गया। इस अवसर पर एमएसएमई-डीएफओ, मुजफ्फरपुर के अन्वेषक भीमसेन, जिला उद्योग केंद्र के महाप्रबंधक मनोज कुमार और अग्रणी जिला प्रबंधक (एलडीएम) बागेश कुमार झा मौजूद रहे। अधिकारियों ने संयुक्त रूप से दीप जलाकर कार्यशाला की शुरुआत की और उपस्थित कारीगरों को संबोधित किया।
कार्यक्रम में जिले भर से आए दर्जनों पारंपरिक शिल्पकारों और पीएम विश्वकर्मा योजना के लाभार्थियों ने हिस्सा लिया। कार्यशाला के दौरान सरकारी योजनाओं की पूरी जानकारी देने के साथ-साथ कारीगरों की समस्याओं को सुना गया और उनके प्रश्नों के उत्तर दिए गए।
डिजिटल तकनीक और एआई
बदलते बाजार की आवश्यकताओं को देखते हुए कारीगरों को नए साधनों को अपनाने की सलाह दी गई। एमएसएमई-डीएफओ के अन्वेषक भीमसेन ने कहा कि अब केवल स्थानीय बाजार तक सीमित रहने का समय नहीं है। यदि कारीगर अपने सामान की ब्रांडिंग और सही तरीके से पैकेजिंग करें, तो वे इंटरनेट के माध्यम से देश-विदेश में नए ग्राहक तलाश सकते हैं।
कार्यशाला में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और डिजिटल मार्केटिंग के उपयोग की जानकारी दी गई। विशेषज्ञों ने बताया कि एआई की मदद से कारीगर अपने उत्पादों के नए डिजाइन तैयार कर सकते हैं और सोशल मीडिया या ई-कॉमर्स वेबसाइटों पर अपने सामान का प्रचार कर सकते हैं। अमेज़न, फ्लिपकार्ट और सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM) जैसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर पंजीकरण कराकर कारीगर सीधे ग्राहकों तक अपनी पहुंच बना सकते हैं।
वित्तीय सहायता और बैंकिंग
कार्यक्रम के दौरान कारीगरों को आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनाने के लिए उपलब्ध ऋण और बैंकिंग सुविधाओं की जानकारी दी गई। अग्रणी जिला प्रबंधक (एलडीएम) बागेश कुमार झा ने बैंकों द्वारा दी जाने वाली वित्तीय सहायता पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि इस योजना के अंतर्गत योग्य लाभार्थियों को बेहद सस्ती ब्याज दर पर बिना किसी गारंटी के ऋण उपलब्ध कराया जाता है।
जिला उद्योग केंद्र के महाप्रबंधक मनोज कुमार ने कहा कि आर्थिक रूप से मजबूत होने के बाद ही कारीगर अपने व्यवसाय का विस्तार कर सकते हैं। उन्होंने शिल्पकारों से आग्रह किया कि वे आवश्यक कागजी कार्रवाई पूरी कर बैंकों से मिलने वाले इस लोन का लाभ उठाएं। लोन की राशि से नए औजार खरीदना, कच्चा माल प्राप्त करना और कार्यशाला की क्षमता बढ़ाना आसान हो जाता है।
योजना की प्रमुख विशेषताएं
पीएम विश्वकर्मा योजना के तहत कारीगरों को कई स्तरों पर लाभ प्रदान किया जाता है। योजना का ढांचा इस तरह तैयार किया गया है जिससे कारीगरों की उत्पादकता बढ़े और उन्हें बाजार में उचित मूल्य मिल सके:
- कौशल प्रशिक्षण: कारीगरों को 5 से 7 दिनों का बुनियादी प्रशिक्षण और 15 दिनों का उन्नत प्रशिक्षण दिया जाता है। प्रशिक्षण के दौरान दैनिक स्टाइपेंड भी दिया जाता है।
- टूलकिट प्रोत्साहन: प्रशिक्षण सफलतापूर्वक पूरा होने के बाद आधुनिक उपकरण खरीदने के लिए 15,000 रुपये का ई-वाउचर मिलता है।
- बिना गारंटी ऋण: पहले चरण में 1 लाख रुपये का लोन 5% ब्याज दर पर मिलता है। इसका समय पर भुगतान करने पर दूसरे चरण में 2 लाख रुपये का अतिरिक्त लोन दिया जाता है।
- डिजिटल लेनदेन पर प्रोत्साहन: प्रत्येक डिजिटल बिक्री पर कारीगरों को इंसेंटिव मिलता है, जिससे वे ऑनलाइन भुगतान प्रणाली अपना सकें।
- ब्रांडिंग और बाजार पहुंच: राष्ट्रीय स्तर के मेलों और प्रदर्शनी में स्टॉल लगाने का अवसर मिलता है, जिससे उत्पादों की सीधी बिक्री संभव होती है।
कारीगरों के लिए अवसर
सुपौल जिले में बढ़ई, लोहार, कुम्हार, राजमिस्त्री, दर्जी, मोची और मूर्तिकार जैसे पारंपरिक कार्यों से जुड़े अनेक परिवार रहते हैं। सही मार्गदर्शन और पूंजी के अभाव में इन कारीगरों को अपने उत्पाद सस्ते दामों पर बेचने पड़ते थे। इस जागरूकता कार्यक्रम से स्थानीय कारीगरों में नई उम्मीद जगी है।
| क्षेत्र | पारंपरिक स्थिति | योजना का प्रभाव |
|---|---|---|
| बाजार पहुंच | केवल स्थानीय हाट तक सीमित | ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म और राष्ट्रीय बाजार |
| वित्तीय स्थिति | महाजनों पर निर्भरता | 5% ब्याज पर सरकारी बैंक लोन |
| तकनीक | पुराने और धीमे औजार | 15,000 रुपये का टूलकिट अनुदान |
| उत्पाद की पहचान | बिना ब्रांड का सामान | डिजिटल ब्रांडिंग और सीधी बिक्री |
कार्यशाला के दौरान अधिकारियों ने कहा कि जब तक स्थानीय कारीगर समय की मांग के अनुसार अपनी कार्यशैली में बदलाव नहीं करेंगे, तब तक उनकी आय में बड़ा उछाल आना मुश्किल है। इसीलिए सरकार अब केवल आर्थिक मदद ही नहीं दे रही, बल्कि उन्हें तकनीक सिखाने पर भी ध्यान दे रही है।
अन्वेषक भीमसेन का वक्तव्य: “पारंपरिक कारीगर देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार हैं। यदि वे डिजिटल तकनीक और एआई का प्रयोग सीख जाएं, तो बिहार के दूर-दराज के गांवों में बने उत्पाद भी बड़े बाजारों में बिक सकते हैं।”
आधुनिक विपणन का प्रभाव
कार्यक्रम में मौजूद वक्ताओं ने इस बात को रेखांकित किया कि आधुनिक समय में केवल अच्छा उत्पाद बनाना ही काफी नहीं है, बल्कि ग्राहकों तक उसकी जानकारी पहुंचाना भी जरूरी है। जब तक किसी वस्तु की सही पैकेजिंग और प्रचार नहीं होगा, तब तक उसका उचित मूल्य नहीं मिल सकता।
महाप्रबंधक मनोज कुमार ने कारीगरों से अपील की कि वे अपने परिवार के युवाओं को भी इस व्यवसाय से जोड़ें और उन्हें डिजिटल माध्यमों को संभालने की जिम्मेदारी सौंपें। युवाओं की तकनीकी जानकारी और बुजुर्गों के अनुभव का मेल पारंपरिक उद्योगों को नई दिशा दे सकता है।
कार्यक्रम के समापन सत्र में उपस्थित कारीगरों को योजना में आवेदन करने की प्रक्रिया समझाई गई। पंचायत स्तर और कॉमन सर्विस सेंटर (CSC) के जरिए पंजीकरण कराने की विधि पर चर्चा हुई। अधिकारियों ने भरोसा दिलाया कि जिला उद्योग केंद्र हर संभव सहायता के लिए तत्पर रहेगा।







