गुवाहाटी। असम के प्रसिद्ध शक्तिपीठ मां कामाख्या मंदिर में श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या और बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने की दिशा में एक बड़ी पहल शुरू हो गई है। मुख्यमंत्री डॉ. हिमंत बिस्व सरमा ने शनिवार को जानकारी दी कि 500 करोड़ रुपये से अधिक लागत वाली महत्वाकांक्षी कामाख्या कॉरिडोर परियोजना का निर्माण कार्य शुरू हो गया है। उन्होंने इसे असम के धार्मिक और पर्यटन विकास की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम बताया।
सोशल मीडिया के जरिए दी जानकारी
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर पोस्ट साझा करते हुए कहा कि मां कामाख्या के आशीर्वाद से इस महत्वपूर्ण परियोजना का काम शुरू हो चुका है। उन्होंने विश्वास जताया कि यह परियोजना न केवल मंदिर आने वाले श्रद्धालुओं के लिए सुविधाएं बढ़ाएगी, बल्कि असम की पहचान को भी नई ऊंचाई देगी।उन्होंने कहा कि राज्य सरकार का उद्देश्य कामाख्या धाम को ऐसा धार्मिक स्थल बनाना है, जहां देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं को आधुनिक और सुव्यवस्थित सुविधाएं मिल सकें।
काशी विश्वनाथ कॉरिडोर की तर्ज पर होगा विकास
मुख्यमंत्री ने बताया कि कामाख्या कॉरिडोर परियोजना की प्रेरणा काशी विश्वनाथ कॉरिडोर से ली गई है। उसी तरह यहां भी श्रद्धालुओं की आवाजाही को आसान बनाने, भीड़ प्रबंधन को बेहतर करने और मंदिर परिसर के आसपास आवश्यक बुनियादी सुविधाओं का विकास किया जाएगा।परियोजना के पूरा होने के बाद मंदिर परिसर में आने वाले श्रद्धालुओं को अधिक सुव्यवस्थित व्यवस्था, बेहतर आवागमन, साफ-सफाई और आधुनिक सुविधाओं का लाभ मिलेगा।
आध्यात्मिक पर्यटन को मिलेगा बढ़ावा
मुख्यमंत्री ने कहा कि कामाख्या मंदिर देश के प्रमुख शक्तिपीठों में से एक है और हर साल लाखों श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं। कॉरिडोर बनने के बाद श्रद्धालुओं का धार्मिक अनुभव पहले से अधिक सहज और सुविधाजनक होगा।उन्होंने कहा कि इससे असम में आध्यात्मिक पर्यटन को नई गति मिलेगी। राज्य में पर्यटन से जुड़े रोजगार के अवसर बढ़ेंगे, स्थानीय व्यापार को फायदा होगा और होटल, परिवहन सहित अन्य क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियां भी तेज होंगी।
धार्मिक पर्यटन का बड़ा केंद्र बनेगा असम
हिमंत बिस्व सरमा ने कहा कि राज्य सरकार धार्मिक स्थलों के विकास को प्राथमिकता दे रही है। कामाख्या कॉरिडोर परियोजना पूरी होने के बाद असम देश के प्रमुख धार्मिक पर्यटन केंद्रों में अपनी स्थिति और मजबूत करेगा।उन्होंने विश्वास जताया कि यह परियोजना न केवल श्रद्धालुओं की सुविधा बढ़ाएगी, बल्कि असम की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत को भी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।







