तेहरान,अंग भारत। ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, जिसके केंद्र में तेहरान में रखा उनका ताबूत है। इस ताबूत पर बिछाया गया एक विशेष लाल झंडा पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बना हुआ है। यह केवल एक कपड़ा नहीं, बल्कि शिया परंपरा का एक गहरा और शक्तिशाली प्रतीक है। इस नाजुक दौर में आईआरजीसी (IRGC) के प्रमुख अहमद वाहिदी का कई हफ्तों बाद पहली बार सार्वजनिक रूप से दिखना यह बताता है कि ईरान की सैन्य कमान अब पूरी तरह से सतर्क और सक्रिय मोड में है। 4 जुलाई से शुरू हो रहे अंतिम संस्कार के कई चरण ईरान की बदलती राजनीतिक तस्वीर को साफ करने वाले हैं।
लाल झंडे का अर्थ
ताबूत पर रखे इस लाल झंडे को शिया इस्लाम में ‘खून और बदले’ के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। इस पर सफेद रंग से “या हुसैन” अंकित है, जो कर्बला की उस शहादत की याद दिलाता है जिसे सदियों से शिया समुदाय अन्याय के खिलाफ संघर्ष का आधार मानता आया है।
- यह झंडा कर्बला स्थित इमाम हुसैन की दरगाह का प्रतिनिधित्व करता है।
- इसका रंग उन लोगों के प्रति न्याय और प्रतिशोध का आह्वान है, जिन्हें शहीद माना जाता है।
- यह ईरान के नेतृत्व द्वारा जनता को एक वैचारिक संदेश देने का माध्यम है।
अहमद वाहिदी की वापसी
ब्रिगेडियर जनरल अहमद वाहिदी का महीनों बाद सामने आना ईरान की आंतरिक सुरक्षा के लिए बड़ा संकेत है। फरवरी के बाद से उनके गायब होने की खबरों ने कई अंतरराष्ट्रीय कयासों को जन्म दिया था। अब, वे सीधे खामेनेई के ताबूत के पास खड़े होकर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं।
उनका करियर ईरान की सुरक्षा व्यवस्था की रीढ़ रहा है। 1988 से 1997 तक कुद्स फोर्स का नेतृत्व करने वाले वाहिदी, कासिम सुलेमानी के पूर्ववर्ती रहे हैं। उनके पास रक्षा मंत्री से लेकर गृह मंत्री तक का लंबा प्रशासनिक अनुभव है। मोहम्मद पाकपौर के बाद आईआरजीसी की कमान संभालना यह दर्शाता है कि ईरान अपने सबसे भरोसेमंद और अनुभवी चेहरे पर दांव लगा रहा है।
अंतिम यात्रा का मार्ग
यह राजकीय अंतिम संस्कार केवल एक शहर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक लंबी धार्मिक और राजनीतिक यात्रा है। इसका पूरा रोडमैप इस प्रकार तय किया गया है:
| चरण | स्थान |
|---|---|
| श्रद्धांजलि | तेहरान |
| धार्मिक यात्रा | क़ोम, नजफ़ और कर्बला |
| अंतिम विश्राम | मशहद (इमाम रजा दरगाह) |
भारत सहित अंतरराष्ट्रीय भागीदारी
इस आयोजन में दुनिया भर की नजरें टिकी हैं। ईरान ने कई देशों के प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया है, जिसमें भारत का शामिल होना रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। मध्य-पूर्व में मौजूदा तनाव को देखते हुए, अंतिम संस्कार का यह मंच राजनयिक स्तर पर एक नई बातचीत का दरवाजा खोल सकता है। भारत की उपस्थिति यह दर्शाती है कि ईरान के साथ उसके संबंध इन बड़े परिवर्तनों के बावजूद स्थिर बने हुए हैं।
सुरक्षा और जन-समर्थन
तेहरान की सड़कों पर सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं। ईरानी प्रशासन ने लाखों लोगों के जुटने की संभावना के मद्देनजर चप्पे-चप्पे पर निगरानी बढ़ा दी है। मुहर्रम का महीना होने के कारण, यह अंतिम संस्कार धार्मिक भावनाओं से पूरी तरह लबरेज है। सरकार यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि नेता तो बदल जाते हैं, लेकिन ईरान की वैचारिक और सैन्य विचारधारा अटूट है।
भविष्य के संकेत
दुनिया अब इस बात पर गौर कर रही है कि क्या अहमद वाहिदी का सार्वजनिक आना ईरान की इजराइल और अमेरिका के प्रति कठोर नीतियों को और तेज करेगा। विशेषज्ञों के मुताबिक, यह केवल एक अंतिम संस्कार नहीं, बल्कि शक्ति प्रदर्शन भी है। जब खामेनेई को सुपुर्द-ए-खाक किया जाएगा, तो उस दिन के बाद से ईरान की विदेश नीति और सुरक्षा रणनीति में नई स्पष्टता देखने को मिल सकती है।








