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ईरान में खामेनेई के ताबूत पर रखा गया लाल झंडा, अंतिम संस्कार से पहले दिखे IRGC प्रमुख अहमद वाहिदी

तेहरान में अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार के दौरान ताबूत पर रखा गया लाल झंडा और पास खड़े आईआरजीसी प्रमुख अहमद वाहिदी

तेहरान,अंग भारत। ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के राजकीय अंतिम संस्कार की तैयारियां अंतिम चरण में पहुंच गई हैं। तेहरान में आयोजित श्रद्धांजलि समारोह के दौरान उनके ताबूत पर रखा गया विशेष लाल झंडा पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच रहा है। इसी बीच इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) के नए प्रमुख ब्रिगेडियर जनरल अहमद वाहिदी भी कई सप्ताह बाद पहली बार सार्वजनिक रूप से नजर आए। उनकी मौजूदगी को ईरान की सैन्य और राजनीतिक व्यवस्था के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है। अंतिम संस्कार का औपचारिक कार्यक्रम 4 जुलाई से शुरू होकर कई दिनों तक चलेगा।

अंतिम संस्कार से पहले सामने आए अहमद वाहिदी

ईरानी सरकारी मीडिया और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के मुताबिक गुरुवार रात तेहरान में आयोजित श्रद्धांजलि कार्यक्रम में अहमद वाहिदी को खामेनेई के ताबूत के पास देखा गया। अमेरिका-इजराइल युद्ध के बाद यह उनका पहला सार्वजनिक कार्यक्रम है। इससे पहले वह फरवरी के बाद से सार्वजनिक रूप से दिखाई नहीं दिए थे। उनकी मौजूदगी को ईरान के सैन्य नेतृत्व में स्थिरता और शक्ति प्रदर्शन के तौर पर देखा जा रहा है।

मोहम्मद पाकपौर के बाद संभाली आईआरजीसी की कमान

ब्रिगेडियर जनरल अहमद वाहिदी ने आईआरजीसी प्रमुख के रूप में मोहम्मद पाकपौर की जगह ली है। पाकपौर की मौत अमेरिका और इजराइल के शुरुआती हमलों में हुई थी। वाहिदी लंबे समय से ईरान की सुरक्षा और सैन्य नीति का अहम चेहरा रहे हैं। उन्होंने 1988 से 1997 तक कुद्स फोर्स का नेतृत्व किया और बाद में इसकी कमान कासिम सुलेमानी को सौंपी। वह पूर्व राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद सरकार में रक्षामंत्री और दिवंगत राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी के कार्यकाल में गृहमंत्री भी रह चुके हैं। दिसंबर 2025 में उन्हें आईआरजीसी का उप प्रमुख बनाया गया था और बाद में शीर्ष जिम्मेदारी सौंपी गई।

ताबूत पर रखा लाल झंडा क्यों बना चर्चा का विषय

खामेनेई के ताबूत पर रखा गया लाल झंडा शिया परंपरा में विशेष धार्मिक और भावनात्मक महत्व रखता है। इस पर सफेद अक्षरों में “या हुसैन” लिखा हुआ है। यह झंडा इराक के कर्बला स्थित इमाम हुसैन के पवित्र दरगाह से जुड़ा प्रतीक माना जाता है। शिया मान्यता के अनुसार लाल झंडा अन्याय के खिलाफ संघर्ष, शहादत और न्याय की मांग का प्रतीक होता है। इसे उस व्यक्ति की याद में भी फहराया जाता है जिसकी मृत्यु को अन्यायपूर्ण माना जाता है। विश्लेषकों का कहना है कि ईरानी नेतृत्व इस प्रतीक के जरिए खामेनेई की मौत को धार्मिक और वैचारिक संघर्ष के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहा है।

कई देशों के प्रतिनिधि होंगे अंतिम संस्कार में शामिल

ईरान सरकार के अनुसार अंतिम संस्कार कई चरणों में आयोजित किया जाएगा। तेहरान में श्रद्धांजलि सभा के बाद पार्थिव शरीर को क़ोम, इराक के पवित्र शहर नजफ़ और कर्बला ले जाया जाएगा। इसके बाद उन्हें उनके गृह नगर मशहद में इमाम रजा दरगाह परिसर में सुपुर्द-ए-खाक किया जाएगा। समारोह में कई देशों के प्रतिनिधियों के शामिल होने की संभावना है। भारत ने भी अपने आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल को अंतिम संस्कार में भेजने का निर्णय लिया है।

सुरक्षा के कड़े इंतजाम, लाखों लोगों के पहुंचने की उम्मीद

ईरानी प्रशासन ने अंतिम संस्कार को देखते हुए राजधानी तेहरान सहित कई शहरों में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी है। प्रमुख मार्गों पर अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात किए गए हैं और बड़े सार्वजनिक स्थलों पर निगरानी बढ़ा दी गई है। सरकारी अनुमान के अनुसार अंतिम यात्रा में लाखों लोग शामिल हो सकते हैं। मुहर्रम के महीने में आयोजित हो रहा यह कार्यक्रम धार्मिक और राजनीतिक दोनों दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

क्षेत्रीय राजनीति पर भी रहेगी दुनिया की नजर

विशेषज्ञों का मानना है कि खामेनेई के अंतिम संस्कार के साथ-साथ दुनिया की नजर ईरान के नए नेतृत्व और उसकी भविष्य की रणनीति पर भी रहेगी। अहमद वाहिदी की सार्वजनिक उपस्थिति और राजकीय अंतिम संस्कार के दौरान अपनाए गए प्रतीकों को ईरान की आगामी सुरक्षा और विदेश नीति के संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है। अमेरिका और इजराइल के साथ जारी तनाव के बीच यह पूरा घटनाक्रम मध्य-पूर्व की राजनीति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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अंग भारत • रिपोर्टर

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