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लखनऊ कोचिंग आग कांड: 4 गिरफ्तार, 4 अफसर सस्पेंड

लखनऊ,अंग भारत। राजधानी लखनऊ के अलीगंज क्षेत्र में स्थित एक व्यावसायिक भवन में हुए भीषण अग्निकांड के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने सख्त कार्रवाई शुरू कर दी है। हादसे में हुई जनहानि के मामले में भवन मालिक समेत चार लोगों को गिरफ्तार किया गया है, जबकि नगर निगम, ऊर्जा विभाग, फायर विभाग और लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) के चार अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया है।

आग हादसे के बाद पुलिस की बड़ी कार्रवाई

अलीगंज पुलिस ने देर रात इस मामले में मुकदमा दर्ज कर चार आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तार किए गए लोगों में अलीगंज सेक्टर-डी निवासी रामकृष्ण उपाध्याय, सीतापुर रोड निवासी वीरेंद्र प्रसाद शुक्ला, ठाकुरगंज निवासी तुषॉक कृष्णा जायसवाल और मड़ियाव के केशवनगर निवासी सुरेश कुमार साहू शामिल हैं। पुलिस मामले की विस्तृत जांच कर रही है।

चार अधिकारियों पर गिरी गाज

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर प्रशासनिक स्तर पर भी कार्रवाई की गई है। ऊर्जा विभाग के जानकीपुरम एक्सईएन कलेक्शन गौरव कुमार, फायर विभाग के एफएसएसओ कमलेन्द्र कुमार सिंह, एलडीए के सहायक अभियंता अनिल कुमार और अवर अभियंता प्रमोद पांडे को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है। सरकार ने स्पष्ट संकेत दिया है कि लापरवाही बरतने वालों को बख्शा नहीं जाएगा।

मुख्यमंत्री ने गठित की विशेष जांच टीम

घटना की गंभीरता को देखते हुए मुख्यमंत्री ने अपने सरकारी आवास पर उच्चस्तरीय बैठक बुलाई। बैठक में वरिष्ठ प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों ने भाग लिया। मुख्यमंत्री ने अपर मुख्य सचिव अमृत अभिजात और एडीजी लखनऊ जोन प्रवीण कुमार के नेतृत्व में दो सदस्यीय विशेष जांच दल (एसआईटी) के गठन के निर्देश दिए हैं। एसआईटी को सात दिनों के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपनी होगी।

2016 के ध्वस्तीकरण आदेश पर उठे सवाल

हादसे के बाद भवन से जुड़े पुराने दस्तावेज भी चर्चा में आ गए हैं। जानकारी के अनुसार भवन में अनधिकृत निर्माण मिलने पर एलडीए ने वर्ष 2016 में ध्वस्तीकरण का आदेश जारी किया था। हालांकि हैरानी की बात यह है कि दो महीने के भीतर ही यह आदेश निरस्त कर दिया गया। अब इस फैसले को लेकर कई सवाल खड़े हो रहे हैं।

1980 में हुआ था भवन का आवंटन

एलडीए रिकॉर्ड के मुताबिक अलीगंज योजना के सेक्टर-डी स्थित भवन संख्या एमएस/102/डी का आवंटन 11 जुलाई 1980 को विजय कुमार के नाम किया गया था। बाद में 2005 में संपत्ति उनके और उनकी पत्नी उषा के नाम दर्ज हुई। वर्ष 2013 में यह भवन वीरेंद्र प्रताप शुक्ला और सुरेंद्र प्रताप शुक्ला को बेच दिया गया। 2014 में नामांतरण के साथ भवन का आवासीय मानचित्र भी स्वीकृत हुआ था।

जांच के दायरे में आ सकते हैं कई और अधिकारी

विशेष जांच दल और एलडीए की अलग-अलग जांच के बीच माना जा रहा है कि कई अन्य अधिकारियों और संबंधित पक्षों की भूमिका भी जांच के घेरे में आ सकती है। प्रशासन यह पता लगाने का प्रयास कर रहा है कि कहीं नियमों की अनदेखी और प्रशासनिक लापरवाही ने इस हादसे को और भयावह तो नहीं बनाया।

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अंग भारत • रिपोर्टर

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