नई दिल्ली,अंग भारत। राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला, केंद्रीय गृह एवं सहकारितामंत्री अमित शाह, रक्षामंत्री राजनाथ सिंह, सड़क परिवहन एवं राजमार्गमंत्री नितिन गडकरी और केंद्रीय कपड़ामंत्री गिरिराज सिंह ने देश के बुनकरों की कला को नमन किया है। यह दिन न केवल हमारी सदियों पुरानी बुनाई परंपराओं को याद करने का है, बल्कि उन करोड़ों हाथों को सलाम करने का भी है जो आज भी अपने हुनर से भारतीय संस्कृति को जीवित रखे हुए हैं।
हथकरघा का सांस्कृतिक महत्व
भारत में बुनाई का काम सिर्फ एक पेशा नहीं, बल्कि एक गौरवशाली विरासत है। उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने इसे भारत की जीवंत विरासत करार देते हुए कहा कि हमारी हथकरघा परंपरा कलाकारी और मजबूती का अनूठा संगम है। यह कला पीढ़ियों से चली आ रही है और ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूती देती है। जब हम हाथ से बुने हुए उत्पाद खरीदते हैं, तो हम वास्तव में एक कारीगर के सपनों और उसके परिवार की आजीविका को सहारा दे रहे होते हैं।
आत्मनिर्भरता और वोकल फॉर लोकल
आज के दौर में ‘वोकल फॉर लोकल’ का नारा महज एक शब्द नहीं, बल्कि भारतीय कारीगरों के लिए एक सुरक्षा कवच है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कोटा डोरिया का उदाहरण देते हुए कहा कि हमारे स्थानीय उत्पाद ही आत्मनिर्भर भारत की नींव हैं। उन्होंने जनता से अपील की कि वे अपनी सांस्कृतिक जड़ों को मजबूत करने के लिए हथकरघा उत्पादों को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बनाएं।
- सांस्कृतिक पहचान: हाथ से बुने वस्त्र भारत की विविधता को दर्शाते हैं।
- रोजगार सृजन: ग्रामीण क्षेत्रों में लाखों परिवारों का मुख्य आधार।
- पर्यावरण अनुकूल: मशीनी कपड़ों की तुलना में हथकरघा उत्पाद अधिक टिकाऊ होते हैं।
स्वतंत्रता संग्राम से नाता
केंद्रीय गृह एवं सहकारितामंत्री अमित शाह ने एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य साझा करते हुए बताया कि हमारा हथकरघा क्षेत्र देश के स्वतंत्रता आंदोलन से गहराई से जुड़ा रहा है। खादी का महत्व इसी आंदोलन से उपजा था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा शुरू किया गया ‘राष्ट्रीय हथकरघा दिवस’ इसी दिशा में एक प्रयास है ताकि इस क्षेत्र को वैश्विक मंच मिले और इसे नया व्यावसायिक आयाम मिल सके।
बुनकरों का सम्मान
रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने देशवासियों से आह्वान किया कि वे भारत की बुनाई परंपराओं को संजोने में अपनी भूमिका निभाएं। उन्होंने स्पष्ट किया कि हथकरघा उत्पादों को गर्व के साथ चुनना ही उन बुनकरों के लिए सबसे बड़ा सम्मान है जो अपनी मेहनत से भारत की आत्मा को वस्त्रों में पिरोते हैं।
“हर हथकरघा बुनाई में भारत की आत्मा बसी है, जिसे हुनर, परंपरा और पीढ़ियों के समर्पण के साथ बुना जाता है।” – नितिन गडकरी, केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्गमंत्री।
भविष्य की राह
केंद्रीय कपड़ामंत्री गिरिराज सिंह के अनुसार, हथकरघा केवल वस्त्र निर्माण का जरिया नहीं है, बल्कि यह भारत की उत्कृष्ट शिल्पकला का प्रतिनिधित्व करता है। सरकार का प्रयास है कि बुनकरों को आधुनिक बाजार से जोड़ा जाए ताकि उनके उत्पादों को उचित मूल्य मिल सके।
कैसे दें अपना योगदान
- त्योहारों और विशेष अवसरों पर केवल हाथ से बुने हुए उपहार दें।
- स्थानीय बुनकर मेलों और सरकारी एंपोरियम से ही खरीदारी करें।
- सोशल मीडिया पर स्थानीय कारीगरों के काम को प्रमोट करें।
- हथकरघा उत्पादों की देखभाल और गुणवत्ता के बारे में लोगों को शिक्षित करें।
आज हमें यह संकल्प लेने की आवश्यकता है कि हम अपनी पसंद को स्थानीय कारीगरों के साथ जोड़ेंगे। जब हम विदेशी मशीनी वस्त्रों को छोड़कर अपने देश के बुनकरों द्वारा तैयार कपड़ों को पहनते हैं, तो हम न केवल अर्थव्यवस्था को गति देते हैं, बल्कि एक ऐसी विरासत को भी बचाते हैं जो आने वाली पीढ़ियों के लिए अनमोल है।







