नई दिल्ली,अंग भारत। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी पांच देशों की छह दिवसीय विदेश यात्रा के तीसरे दिन नीदरलैंड के ऐतिहासिक अफ़्सलुइटडिज्क बांध का दौरा किया। इस दौरान उनके साथ नीदरलैंड के प्रधानमंत्री रॉब जेटन भी मौजूद रहे। दोनों नेताओं ने जल प्रबंधन, बाढ़ नियंत्रण और समुद्री जल को रोककर मीठे पानी के संसाधन विकसित करने से जुड़ी आधुनिक तकनीकों और परियोजनाओं की विस्तृत जानकारी ली।
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जल प्रबंधन में नीदरलैंड की तारीफ
प्रधानमंत्री मोदी ने दौरे के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि जल संसाधन प्रबंधन के क्षेत्र में नीदरलैंड ने दुनिया के सामने एक बेहतरीन उदाहरण पेश किया है और पूरा विश्व उससे बहुत कुछ सीख सकता है। प्रधानमंत्री ने कहा कि उन्हें अफ़्सलुइटडिज्क परियोजना की प्रमुख विशेषताओं को करीब से समझने का अवसर मिला, जिसके लिए उन्होंने नीदरलैंड के प्रधानमंत्री रॉब जेटन का आभार व्यक्त किया।प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि भारत में सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण और अंतर्देशीय जलमार्ग नेटवर्क को मजबूत बनाने के लिए आधुनिक तकनीकों को बढ़ावा दिया जा रहा है। उन्होंने संकेत दिए कि भारत और नीदरलैंड के बीच जल प्रबंधन और जलवायु अनुकूलन के क्षेत्र में सहयोग को और मजबूत किया जा सकता है।
भारत की परियोजनाओं को मिलेगा लाभ
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने इस दौरे को बेहद महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि अफ़्सलुइटडिज्क बांध डच इंजीनियरिंग, बाढ़ सुरक्षा और मीठे पानी के भंडारण का उत्कृष्ट उदाहरण है। उन्होंने कहा कि यह दौरा गुजरात की महत्वाकांक्षी कल्पसर परियोजना के लिए भी उपयोगी साबित हो सकता है।कल्पसर परियोजना का उद्देश्य खंभात की खाड़ी के पास मीठे पानी का विशाल भंडार विकसित करना और जल संसाधनों को बेहतर तरीके से संरक्षित करना है। माना जा रहा है कि नीदरलैंड के अनुभव और तकनीक से भारत की जल प्रबंधन योजनाओं को नई दिशा मिल सकती है।
क्या है अफ़्सलुइटडिज्क बांध की खासियत
अफ़्सलुइटडिज्क नीदरलैंड का सबसे महत्वपूर्ण बांध और पुल माना जाता है। इसका निर्माण वर्ष 1927 से 1932 के बीच किया गया था। लगभग 32 किलोमीटर लंबा यह बांध उत्तरी हॉलैंड के डेन ओएवर को फ्रीसलैंड प्रांत के ज्यूरिख गांव से जोड़ता है।इस परियोजना की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि इसने उत्तरी सागर की खारे पानी वाली ज़ुइडरज़ी खाड़ी को बंद कर उसे आईजेलमीर नामक विशाल मीठे पानी की झील में बदल दिया। इससे समुद्री बाढ़ के खतरे में भारी कमी आई और कृषि, पेयजल तथा परिवहन के नए अवसर विकसित हुए।
जलवायु परिवर्तन से निपटने की तैयारी
वर्ष 1953 में उत्तरी सागर में आई विनाशकारी बाढ़ के बाद इस बांध की ऊंचाई कई चरणों में बढ़ाई गई थी। वहीं वर्ष 2019 में इसके व्यापक आधुनिकीकरण और सुदृढ़ीकरण का कार्य शुरू किया गया ताकि समुद्री तूफानों और जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न चुनौतियों का बेहतर तरीके से सामना किया जा सके।










