सुपौल,अंग भारत। सुपौल के सदर अस्पताल में बृहस्पतिवार को डायरिया नियंत्रण अभियान के तहत एक विशेष जागरूकता रथ को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया गया। जिले में डायरिया के प्रसार को रोकने और बच्चों के स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने के लिए स्वास्थ्य विभाग ने 25 दिनों का एक सघन जागरूकता कार्यक्रम शुरू किया है। सिविल सर्जन बाबू साहब झा ने इस रथ को रवाना करते हुए बताया कि इस अभियान का मुख्य उद्देश्य डायरिया के प्रति लोगों को सतर्क करना और विशेष रूप से पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों को इस घातक बीमारी से बचाना है। डायरिया से होने वाली बच्चों की मौतों को सही स्वच्छता, रोटावायरस टीकाकरण और समय पर उपचार से पूरी तरह रोका जा सकता है।
सदर अस्पताल में शुरुआत
सदर अस्पताल सुपौल में आयोजित इस कार्यक्रम में जिले के स्वास्थ्य प्रशासन की पूरी टीम सक्रिय दिखी। सिविल सर्जन बाबू साहब झा ने स्वयं प्रचार रथ को हरी झंडी दिखाकर ग्रामीण क्षेत्रों के लिए रवाना किया। यह रथ आगामी 25 दिनों तक सुपौल के सुदूर गांवों और कस्बों में भ्रमण करेगा। इस दौरान डॉक्टर एसपी सिन्हा, डीआर ममता कुमारी, अस्पताल प्रबंधक, एएनएम (ANM) की छात्राएं और अनेक स्वास्थ्य कर्मी मौजूद रहे। इन सभी का सामूहिक लक्ष्य सुपौल को डायरिया मुक्त बनाना है। रथ पर मौजूद लाउडस्पीकर के माध्यम से लोगों को बीमारी के लक्षणों और उसके शुरुआती इलाज की जानकारी दी जा रही है। स्वास्थ्य विभाग ने यह स्पष्ट किया है कि केवल जागरूकता ही इस समस्या का सबसे सटीक समाधान है।
“गंदगी और अनदेखी ही डायरिया की असली जड़ हैं। अगर हम बच्चों की साफ-सफाई पर ध्यान दें, समय पर टीका लगवाएं और केवल मां का दूध ही पिलाएं, तो कोई भी बच्चा इस बीमारी का शिकार नहीं होगा।” – सिविल सर्जन बाबू साहब झा
बीमारी फैलने की वजह
सदर अस्पताल के चिकित्सकों ने विस्तार से बताया कि डायरिया के फैलने के पीछे दूषित जल और स्वच्छता का अभाव ही मुख्य कारक है। कई बार घरों में महिलाएं बच्चों के मल को साफ करने के बाद साबुन से हाथ नहीं धोतीं, जिससे कीटाणु भोजन में प्रवेश कर जाते हैं।
- खुले में शौच करना और मक्खियों का भोजन पर बैठना।
- चापाकल या कुएं के आसपास गंदगी का जमा होना।
- बिना धोए फल और सब्जियों का सेवन करना।
- गंदे बर्तनों का उपयोग करना।
इन कारणों से संक्रमण तेजी से फैलता है और छोटे बच्चे सबसे पहले इसकी चपेट में आते हैं। बच्चों के मल को खुले में फेंकने से आसपास का वातावरण दूषित हो जाता है, जिससे बीमारी के जीवाणु हवा और पानी के माध्यम से फैलते हैं।
बचाव के सरल तरीके
डायरिया से बचाव के लिए स्वास्थ्य विभाग ने कुछ सरल दैनिक नियमों का पालन करने की सलाह दी है। सिविल सर्जन बाबू साहब झा ने कहा कि हाथ धोने की आदत ही इस बीमारी के प्रभाव को आधा कर देती है। शौचालय के बाद और भोजन तैयार करने से पहले साबुन का इस्तेमाल अनिवार्य है। घर में पीने के पानी को हमेशा ढककर रखें और पानी निकालते समय डंडी वाले लोटे का ही प्रयोग करें। बासी भोजन का त्याग करें और सदैव ताज़ा गर्म भोजन ही ग्रहण करें।
स्तनपान और सुरक्षा
छोटे शिशुओं के लिए मां का दूध किसी वरदान से कम नहीं है। जन्म के छह महीने तक केवल मां का दूध ही बच्चे की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बनाए रखता है। यदि बच्चे को डायरिया हो भी जाए, तो स्तनपान रोकना नहीं चाहिए, बल्कि उसे लगातार जारी रखना चाहिए। यह बच्चे के शरीर में डिहाइड्रेशन को रोकता है और उसे कमजोरी से बचाता है।
टीकाकरण का महत्व
डायरिया से दीर्घकालिक सुरक्षा के लिए टीकाकरण चक्र को पूरा करना आवश्यक है। इस अभियान में रोटावायरस वैक्सीन और विटामिन ए की खुराक पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। बच्चों की नियमित टीकाकरण सारणी का पालन करें। रोटावायरस वैक्सीन गंभीर दस्त से बच्चों की रक्षा करती है। आप अपने नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र या आशा कार्यकर्ता से संपर्क कर टीकाकरण की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
त्वरित प्राथमिक उपचार गाइड
| मुख्य लक्षण | क्या करें (घरेलू उपाय) | कब जाएं डॉक्टर के पास |
|---|---|---|
| लगातार दस्त होना | ओआरएस (ORS) का घोल पिलाएं, स्तनपान जारी रखें। | यदि बच्चा सुस्त हो जाए या पेशाब न करे। |
| हल्का बुखार और उल्टी | साफ पानी, छाछ या नारियल पानी दें। हल्का खाना दें। | यदि दस्त के साथ खून आ रहा हो। |
| शरीर में पानी की कमी | ओआरएस के साथ जिंक (Zinc) की गोली डॉक्टर की सलाह पर दें। | यदि उल्टी के कारण कुछ भी पच न रहा हो। |
स्वास्थ्य विभाग द्वारा किए जा रहे इस प्रयास का उद्देश्य आम जनमानस के व्यवहार में परिवर्तन लाना है। जब तक हर नागरिक स्वयं को जागरूक नहीं करेगा, तब तक स्वस्थ सुपौल का निर्माण संभव नहीं है। सभी ग्रामीणों से अनुरोध है कि वे अपने स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का सहयोग करें और डायरिया के लक्षण दिखने पर बिना देरी के नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र पर जाकर परामर्श लें।








