रांची,अंग भारत। झारखंड विधानसभा का पांच दिवसीय मॉनसून सत्र गुरुवार से शुरू हो गया है, जिसमें राज्य के विकास और वित्तीय वर्ष 2026-27 के पहले अनुपूरक बजट को लेकर भारी गहमागहमी रहने के आसार हैं। सत्र के पहले ही दिन विधानसभा अध्यक्ष रवींद्र नाथ महतो ने साफ कर दिया कि सदन का असली काम केवल शोर-शराबा करना नहीं, बल्कि कानून बनाना, सरकार के कामकाज की निगरानी करना और जनता के सवालों पर जवाबदेही तय करना है। इस बार विपक्ष भी सरकार को घेरने की पूरी तैयारी में है, वहीं सत्ता पक्ष जनकल्याणकारी योजनाओं और बजट प्रस्तावों के जरिए अपनी उपलब्धियां गिनाने की कोशिश करेगा। पांच दिनों के इस छोटे लेकिन बेहद महत्वपूर्ण सत्र में राज्य से जुड़े कई गंभीर मुद्दों पर तीखी बहस देखने को मिल सकती है।
कामकाज का लेखा-जोखा
इस बार के सत्र की रूपरेखा को बहुत ही संतुलित तरीके से तैयार किया गया है। पूरे सत्र के दौरान चार दिन केवल प्रश्नकाल के लिए तय किए गए हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि विधायकों के पास अपनी विधानसभा और वहां की जनता से जुड़े जमीनी मुद्दों को सीधे सरकार के सामने उठाने का पूरा मौका रहेगा। वहीं, 12 अगस्त की तारीख को विशेष रूप से गैर-सरकारी सदस्यों के कामकाज के लिए सुरक्षित रखा गया है। इस दिन विधायक अपने निजी विधेयक और जनहित के गंभीर प्रस्ताव सदन के पटल पर रख सकेंगे। संसदीय लोकतंत्र में यह एक ऐसा मौका होता है जब सत्ता और विपक्ष की सीमाएं टूटती हैं और जनहित सर्वोपरि हो जाता है। अक्सर देखा जाता है कि इस तरह के निजी प्रस्तावों से कई बड़े सामाजिक सुधारों की नींव पड़ती है।
विधानसभा की उत्पादकता
सत्र की शुरुआत में ही अध्यक्ष रवींद्र नाथ महतो ने एक बेहद दिलचस्प और सोचने पर मजबूर करने वाला आंकड़ा पेश किया। उन्होंने पीआरएस (PRS) की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि साल 2025 के दौरान जहां देश के अन्य राज्यों की विधानसभाओं की बैठकों का औसत महज 24 दिन रहा, वहीं झारखंड विधानसभा की बैठकें कुल 31 दिनों तक चलीं। यह आंकड़ा दिखाता है कि झारखंड के जनप्रतिनिधि सदन के भीतर चर्चा करने और नीतियां बनाने को लेकर कितने गंभीर हैं। अध्यक्ष ने सभी सदस्यों से इस अच्छी और सकारात्मक परंपरा को आगे भी जारी रखने की अपील की। सच तो यह है कि विधानसभा की गरिमा तभी बचती है जब वहां हंगामे के बजाय ठोस नीतियां बनाने पर काम हो। जब विधायक सदन में अधिक समय बिताते हैं, तो जनहित के फैसलों में जल्दबाजी की गुंजाइश खत्म हो जाती है और कानूनों पर बारीकी से विचार होता है।
बजट और नए आर्थिक लक्ष्य
इस मॉनसून सत्र का एक सबसे बड़ा आकर्षण वित्तीय वर्ष 2026-27 का पहला अनुपूरक बजट होगा। अनुपूरक बजट की जरूरत तब पड़ती है जब सरकार को चालू योजनाओं के लिए अतिरिक्त फंड की जरूरत होती है या फिर कुछ नई जनहित की योजनाएं शुरू करनी होती हैं। झारखंड जैसे विकासशील राज्य में, जहां बुनियादी ढांचे के निर्माण, ग्रामीण सड़कों, बिजली और पानी की आपूर्ति को लेकर लगातार काम चल रहा है, वहां इस तरह के वित्तीय प्रावधान बेहद अहम हो जाते हैं। विधायकों को इस बजट पर बारीकी से नजर रखनी होगी ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि जनता के टैक्स का पैसा सही जगह और सही तरीके से खर्च हो।
चर्चा के मुख्य विषय
झारखंड के सामने फिलहाल कई बड़ी और गंभीर चुनौतियां खड़ी हैं। बदलते मौसम के पैटर्न यानी जलवायु परिवर्तन से लेकर युवाओं के रोजगार, शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं, खेती-किसानी के संकट और आर्थिक उतार-चढ़ाव ऐसे मुद्दे हैं जिन पर तुरंत ध्यान देने की जरूरत है। अध्यक्ष ने इन सभी विषयों पर गंभीर और सार्थक चर्चा की वकालत की। उन्होंने बहुत पते की बात कही कि लोकतंत्र केवल बहुमत के बल पर नहीं चलता, बल्कि यह संवाद, आपसी सहमति और एक-दूसरे के विचारों को सम्मान देने से मजबूत होता है। सदन में जब तक गंभीर मुद्दों पर स्वस्थ बहस नहीं होगी, तब तक राज्य का विकास जमीनी स्तर पर नहीं दिखेगा।
नई कमेटियों का गठन
सदन की कार्यवाही सुचारू रूप से चलाने और किसी भी विपरीत परिस्थिति को संभालने के लिए एक मजबूत व्यवस्था बनाई गई है। इसके तहत एक सभापति मंडल का गठन किया गया है, जिसमें अनुभवी और वरिष्ठ नेताओं को जगह मिली है। इस मंडल में निम्नलिखित सदस्य शामिल हैं:
- हेमलाल मुर्मू
- चंद्रेश्वर प्रसाद सिंह
- नीरल पूर्ति
- रामचंद्र सिंह
- डॉ. नीरा यादव
ये सभी अनुभवी नेता अध्यक्ष की अनुपस्थिति में सदन की कार्यवाही को मर्यादित तरीके से चलाने का जिम्मा संभालेंगे।
इसके अलावा, सदन का कामकाज किस दिशा में आगे बढ़ेगा और किस विषय को कितना समय मिलेगा, यह तय करने के लिए कार्य मंत्रणा समिति भी गठित की गई है। इस समिति में खुद अध्यक्ष रवींद्र नाथ महतो, राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, संसदीय कार्य मंत्री राधाकृष्ण किशोर, नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी शामिल हैं। साथ ही प्रदीप यादव, नीरल पूर्ति, अरूप चटर्जी और विशेष आमंत्रित सदस्य के रूप में दीपक बिरवा को इसमें जगह दी गई है। यह टीम मिलकर यह तय करेगी कि सदन का एक-एक मिनट जनता के हक में इस्तेमाल हो और बिना किसी हंगामे के सभी विधायी कार्य समय पर पूरे किए जा सकें।







