फुल्लीडुमर/बांका,अंगभारत। बांका जिले के फुल्लीडुमर प्रखंड में धनकुड़िया से कुसमानासी तक की डेढ़ किलोमीटर लंबी सिंचाई नहर की गाद सफाई का काम शुरू हो गया है। रामसरिया बियर से जुड़ी इस नहर में वर्षों से जमी मिट्टी के कारण सिंचाई का पानी अंतिम छोर तक नहीं पहुंच पा रहा था। सिंचाई विभाग द्वारा शुरू की गई इस पहल से किसानों में उम्मीद जगी है, लेकिन काम के तौर-तरीकों पर उठे सवालों ने इस अभियान की गुणवत्ता पर गंभीर चिंताएं पैदा कर दी हैं। स्थानीय किसानों का कहना है कि अगर मिट्टी को सही ढंग से नहीं हटाया गया, तो यह सरकारी प्रयास महज खानापूर्ति बनकर रह जाएगा और कुछ ही महीनों में नहर फिर से पहले जैसी स्थिति में आ जाएगी।
नहर सफाई का महत्व
बदुआ डेम से निकलने वाली यह नहर इस इलाके की कृषि जीवन रेखा मानी जाती है। वर्षों से गाद (silt) जमा होने के कारण नहर का तल (bed level) इतना ऊंचा हो चुका था कि गुरुत्वाकर्षण के जरिए पानी का बहाव आगे नहीं हो पा रहा था। इस कारण धनकुड़िया से कुसमानासी तक के किसान रबी और खरीफ फसलों के लिए पानी की भारी किल्लत झेल रहे थे।
- सिंचाई व्यवस्था में सुधार: पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करना।
- फसलों की पैदावार: धान और गेहूं की खेती के लिए जल आपूर्ति।
- कृषि आय में वृद्धि: सूखे की मार से किसानों को बचाना।
अधिकारियों का रुख
इस पूरे प्रोजेक्ट की निगरानी और प्रबंधन की जिम्मेदारी कार्यपालक देखरेख कर रहे वकील यादव संभाल रहे हैं। बुधवार को उन्होंने जानकारी दी कि सिंचाई विभाग ने तय समय सीमा के भीतर इस डेढ़ किलोमीटर के हिस्से की खुदाई और गाद निकासी का लक्ष्य रखा है। विभाग का दावा है कि इस सफाई के बाद नहर की क्षमता में इजाफा होगा और पानी का बहाव अंतिम छोर तक पहुंचेगा। हालांकि, विभाग का यह दावा किसानों के जमीनी अनुभवों से मेल नहीं खा रहा है।
किसानों की बड़ी आपत्ति
परियोजना की सबसे बड़ी खामी को किसान बलराम यादव ने उजागर किया है। उनका स्पष्ट मानना है कि विभाग जिस तरह से सफाई कर रहा है, वह वैज्ञानिक रूप से गलत है। बलराम यादव के अनुसार, नहर के तल से निकाली जा रही मिट्टी को केवल नहर के दोनों किनारों पर ही ढेर कर दिया जा रहा है। इसका सीधा नुकसान यह होगा कि जैसे ही बारिश होगी, यह ढीली मिट्टी वापस फिसलकर नहर में गिर जाएगी।
“अगर मिट्टी को नहर के किनारे से दूर नहीं किया गया, तो पूरी मेहनत बेकार हो जाएगी। पहली ही बारिश में यह सारा कीचड़ फिर से नहर को जाम कर देगा,” बलराम यादव ने चिंता जताते हुए कहा।
सुधार के सुझाव
स्थानीय किसान और ग्रामीण अब विभाग से तत्काल सुधार की मांग कर रहे हैं। उनका तर्क है कि यदि सार्वजनिक धन खर्च किया जा रहा है, तो उसका परिणाम भी स्थायी होना चाहिए। इसके लिए निम्नलिखित कदम उठाए जाने की आवश्यकता है:
- मिट्टी को किनारे से दूर ले जाकर डंप करना।
- नहर के तटबंधों को मजबूती प्रदान करना।
- मिट्टी को समतल करने के बजाय सुरक्षित दूरी पर हटाना।
- कार्य की नियमित निगरानी के लिए स्थानीय समिति बनाना।
गुणवत्ता पर सवाल
यह मामला केवल एक नहर की सफाई तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकारी परियोजनाओं में ‘क्वालिटी कंट्रोल’ के अभाव को भी दर्शाता है। किसानों का असंतोष यह बताता है कि बिना स्थानीय हितधारकों से चर्चा किए किए गए कार्य अक्सर निष्फल हो जाते हैं। यदि सिंचाई विभाग ने समय रहते बलराम यादव और अन्य ग्रामीणों की आपत्तियों पर ध्यान नहीं दिया, तो लाखों रुपये का यह बजट मात्र कागजों पर खर्च होकर रह जाएगा और किसानों की प्यासी जमीन को कोई खास राहत नहीं मिलेगी। ग्रामीण अब इस मांग पर अड़े हैं कि विभाग इस कार्य में तकनीकी स्पष्टता लाए ताकि सिंचाई तंत्र लंबे समय तक कार्यशील रह सके।







