कोलकाता,अंग भारत| पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनाव से ठीक पहले मतदाता सूची में बड़ा बदलाव सामने आया है। राज्य में पहली बार मतदाताओं की कुल संख्या में गिरावट दर्ज की गई है। विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के बाद अब कुल मतदाता संख्या घटकर 6.75 करोड़ रह गई है। मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी कार्यालय के आंकड़ों के मुताबिक, यह गिरावट चुनावी पारदर्शिता की दिशा में एक बड़ा कदम है, जिससे फर्जी मतदान की संभावनाओं पर लगाम कसने की तैयारी है।
मतदाता संख्या का इतिहास
अगर हम पिछले डेढ़ दशक के आंकड़ों को देखें, तो बंगाल में मतदाताओं की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा था। 2011 में जब राज्य में विधानसभा चुनाव हुए थे, तब कुल मतदाताओं की संख्या महज 5.62 करोड़ थी। इसके बाद के वर्षों में यह आंकड़ा तेजी से ऊपर गया।
- 2011 विधानसभा चुनाव: 5.62 करोड़
- 2014 लोकसभा चुनाव: 6.27 करोड़
- 2016 विधानसभा चुनाव: 6.58 करोड़
- 2019 लोकसभा चुनाव: 6.98 करोड़
- 2021 विधानसभा चुनाव: 7.33 करोड़
- 2024 लोकसभा चुनाव: 7.60 करोड़
यह सिलसिला पहली बार 2024 के बाद की इस पुनरीक्षण प्रक्रिया में टूटा है। 7.60 करोड़ से अचानक 6.75 करोड़ पर आना अपने आप में एक बड़ा प्रशासनिक फेरबदल है।
SIR प्रक्रिया और गिरावट
नवंबर से शुरू हुई ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (Special Intensive Revision) प्रक्रिया ने इस बार उन खामियों को उजागर किया जो सालों से चली आ रही थीं। पहले यह देखा गया था कि मतदाता सूची में कई ऐसे नाम शामिल थे जिनका कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं था। आयोग ने जमीनी स्तर पर डेटा का सत्यापन किया और एक बड़ी सफाई अभियान को अंजाम दिया।
नाम हटाने के कारण
राजनीतिक दल लंबे समय से चुनाव आयोग से शिकायत कर रहे थे कि मतदाता सूची में मृत व्यक्तियों और ऐसे लोगों के नाम शामिल हैं जो राज्य छोड़कर दूसरे प्रदेशों में जा चुके हैं। इस बार के सत्यापन में मुख्य रूप से निम्नलिखित श्रेणियों के नाम हटाए गए हैं:
- मृत मतदाता: वे लोग जिनका निधन हो चुका है लेकिन उनके नाम सूची में सक्रिय थे।
- स्थानंतरित मतदाता: जो लोग रोजगार या अन्य कारणों से दूसरे राज्यों में बस गए हैं।
- दोहरे नाम: एक ही व्यक्ति का नाम एक से अधिक मतदान केंद्रों की सूची में होना।
- फर्जी प्रविष्टियां: बिना उचित दस्तावेजों के दर्ज कराए गए संदिग्ध नाम।
पारदर्शिता का असर
चुनाव विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार की मतदाता सूची पिछले कई चुनावों की तुलना में अधिक ‘शुद्ध’ है। जब सूची से मृत और फर्जी मतदाताओं के नाम हटा दिए जाते हैं, तो डमी वोटिंग या बोगस वोटिंग की गुंजाइश लगभग खत्म हो जाती है। राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी कहना है कि इस कदम से चुनाव में निष्पक्षता बढ़ेगी।
मतदाता सूची की शुद्धता ही किसी भी लोकतंत्र की सफलता का असली पैमाना है। फर्जी नामों का हटना किसी एक पार्टी की जीत या हार का सवाल नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया की मजबूती का प्रमाण है।
चुनावी राजनीति पर प्रभाव
अब सवाल यह है कि क्या इस बदलाव से किसी विशेष राजनीतिक दल को फायदा होगा? सच तो यह है कि मतदाता सूची में नाम कम होने से किसी पार्टी विशेष का गणित नहीं बिगड़ता, बल्कि यह सुनिश्चित होता है कि हर एक वोट का सही मूल्य मिले। प्रशासन और निर्वाचन आयोग का साफ कहना है कि उनका लक्ष्य केवल पात्र मतदाताओं तक मताधिकार पहुंचाना है।
आगामी दो चरणों के विधानसभा चुनाव में अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या मतदान प्रतिशत में पिछले वर्षों के मुकाबले कोई बदलाव आता है। प्रशासन पूरी तरह से सतर्क है और कोशिश की जा रही है कि चुनाव प्रक्रिया में किसी भी तरह की तकनीकी या मानवीय चूक न हो। इस प्रक्रिया ने उन सभी चर्चाओं पर विराम लगा दिया है जिनमें लंबे समय से मतदाता सूची की खामियों को लेकर चिंता जताई जा रही थी।








