गुवाहाटी,अंग भारत। असम विधानसभा चुनाव के बाद का माहौल पूरी तरह से गर्मा गया है और मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने अपने ताजा दावों से सियासी पारा और बढ़ा दिया है। मुख्यमंत्री ने पूरी दृढ़ता के साथ कहा है कि राज्य में भाजपा के नेतृत्व वाला एनडीए गठबंधन इस बार 90 से अधिक सीटों पर जीत का परचम लहराएगा। उनका यह विश्वास केवल हवा में नहीं है, बल्कि वे मतदाताओं के भारी मतदान और जमीन पर दिख रहे उत्साह को इसका आधार मान रहे हैं। चुनावी आंकड़ों के गणित को देखें तो सरमा का यह दावा विपक्ष के लिए एक बड़ी चुनौती की तरह सामने आया है।
मतदान का बढ़ा उत्साह
चुनाव के दिन राज्य के हर कोने से जो तस्वीरें सामने आईं, वे चौंकाने वाली थीं। सरमा के अनुसार, इस बार का मतदान प्रतिशत किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं रहा।
- हिंदू बहुल इलाकों में भारी मतदान हुआ।
- अल्पसंख्यक समुदाय की बस्तियों में भी लोगों ने लंबी कतारें लगाईं।
- युवाओं और महिलाओं की भागीदारी ने पुराने रिकॉर्ड तोड़े हैं।
यह जन-भागीदारी संकेत देती है कि लोग बदलाव और विकास के एजेंडे पर मुहर लगाने के लिए उत्सुक थे।
असमिया अस्मिता का मुद्दा
इस पूरे चुनाव में ‘असमिया पहचान’ की सुरक्षा का मुद्दा सबसे ऊपर रहा। मुख्यमंत्री का मानना है कि उनकी सरकार ने अपनी संस्कृति और पहचान को बचाने के लिए जो कदम उठाए हैं, उन्हें जनता का पूरा समर्थन मिला है। यह केवल एक राजनीतिक नारा नहीं था, बल्कि राज्य के मूल निवासियों के लिए एक अस्तित्व की लड़ाई बन गई थी। वोटिंग के पैटर्न को देखकर साफ लग रहा है कि मतदाताओं ने भावनाओं और भविष्य के सुरक्षा चक्र को केंद्र में रखकर ही अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया है।
विपक्ष पर कड़ा प्रहार
सरमा ने कांग्रेस और उसके प्रमुख चेहरों पर तीखे हमले किए। उनका मानना है कि विपक्ष इस चुनाव में कहीं भी मुकाबले में नजर नहीं आया। गौरव गोगोई की उम्मीदवारी पर कटाक्ष करते हुए उन्होंने कहा कि गोगोई को अपने ही गढ़ में कड़े इम्तिहान से गुजरना पड़ रहा है। साथ ही, उन्होंने पवन खेड़ा पर टिप्पणी करते हुए कहा कि कांग्रेस नेता केवल दिखावे के लिए गुवाहाटी आते हैं और जमीनी पकड़ खो चुके हैं। उनके अनुसार, कांग्रेस का यह व्यवहार उनकी हार की हताशा को दर्शाता है।
जनसंपर्क का असर
हिमंत बिस्व सरमा की चुनावी रणनीति के केंद्र में सीधे संवाद था। उन्होंने राज्य भर में 300 से अधिक जनसभाओं को संबोधित किया। इतनी बड़ी संख्या में रैलियां करना यह बताता है कि भाजपा ने चुनाव को पूरी तरह से व्यक्तिगत स्तर पर लड़ा। उनके अनुसार, इतने व्यापक जनसंपर्क के बाद उन्हें जनता के मिजाज का भली-भांति अंदाजा हो गया था। दूसरी ओर, उन्होंने देवब्रत सैकिया और रिपुन बोरा जैसे नेताओं पर सवाल उठाए कि वे अपने निर्वाचन क्षेत्रों से बाहर निकलने में क्यों हिचकिचा रहे थे।
भविष्य की सियासी राह
असम की राजनीति फिलहाल एक बड़े मोड़ पर खड़ी है। क्या सरमा का 90 सीटों का अनुमान सही साबित होगा? यह तो मतगणना के दिन ही पता चलेगा, लेकिन इस समय मुख्यमंत्री का आत्मविश्वास भाजपा कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा भर रहा है। राज्य में एक मजबूत और स्थिर सरकार के दावे के साथ सरमा ने अब गेंद पूरी तरह से चुनाव आयोग के नतीजों के पाले में डाल दी है।
“असम में इस बार का जनादेश विकास के प्रति अटूट विश्वास और असमिया गौरव की रक्षा का सामूहिक संकल्प है, जो चुनावी नतीजों में स्पष्ट दिखाई देगा।” – हिमंत बिस्व सरमा के बयानों का सार।
आने वाले समय में यह नतीजे न केवल असम की अगली सरकार तय करेंगे, बल्कि पूर्वोत्तर की राजनीति में भाजपा की स्थिति को और भी अधिक मजबूत बनाएंगे। फिलहाल, हर किसी की नजरें एग्जिट पोल और फाइनल आंकड़ों पर टिकी हैं।








