फुल्लीडुमर/बांका/अंग भारत। विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर फुल्लीडुमर प्रखंड की खेसर पंचायत में आयोजित विशेष ग्राम सभा ने साबित कर दिया है कि अगर ग्रामीण ठान लें, तो गांव को स्वच्छ और हरित बनाना कोई कठिन काम नहीं है। इस सभा का मुख्य केंद्र बिंदु केवल औपचारिकता पूरी करना नहीं, बल्कि प्लास्टिक मुक्त गांव बनाने का ठोस खाका तैयार करना था। पंचायत प्रतिनिधियों और ग्रामीणों ने मिलकर यह संकल्प लिया है कि आने वाले समय में खेसर पंचायत को एक मॉडल पंचायत के रूप में विकसित किया जाएगा, जहाँ कचरा प्रबंधन और स्वच्छता केवल सरकारी फाइल का हिस्सा नहीं, बल्कि दैनिक जीवन का हिस्सा होगी।
स्वच्छता का वैज्ञानिक प्रबंधन
ग्राम सभा के दौरान प्रखंड पंचायती राज पदाधिकारी (बीपीआरओ) शशि कुमार सिंह ने कचरे के वैज्ञानिक निपटान (Solid Waste Management) को लेकर जो बातें रखीं, वे हर ग्रामीण के लिए समझने योग्य थीं। अक्सर हम कूड़ा इकट्ठा करके कहीं भी फेंक देते हैं, लेकिन खेसर पंचायत अब इसे बदलने की दिशा में बढ़ चुकी है। उन्होंने विस्तार से समझाया कि कैसे गीले और सूखे कचरे को अलग-अलग करना प्रदूषण कम करने का पहला कदम है।
- गीला कचरा: इसे खाद बनाने के लिए उपयोग करें।
- सूखा कचरा: प्लास्टिक, कागज और धातु को रीसायकल प्रक्रिया के लिए अलग रखें।
- प्रबंधन के लाभ: इससे न केवल बीमारियां कम होंगी, बल्कि मिट्टी की उर्वरता भी बनी रहेगी।
प्लास्टिक से मुक्ति का संकल्प
आज के दौर में प्लास्टिक हमारी जीवनशैली का सबसे खतरनाक हिस्सा बन गया है। कार्यक्रम में इस बात पर विशेष चिंता जताई गई कि कैसे सिंगल-यूज़ प्लास्टिक हमारे खेतों और जल स्रोतों को जहरीला बना रहा है। ग्रामीणों को यह बारीकी से समझाया गया कि प्लास्टिक जमीन के नीचे जाकर कैसे भूजल को दूषित करता है।
प्लास्टिक प्रदूषण को रोकना अब एक विकल्प नहीं, बल्कि हमारी आने वाली पीढ़ियों के अस्तित्व के लिए एक मजबूरी है।
बीपीआरओ शशि कुमार सिंह ने ग्रामीणों से घर से बाहर निकलते समय कपड़े का थैला साथ रखने की आदत डालने का आह्वान किया। जब गांव का हर नागरिक बाजार से प्लास्टिक का थैला लाने से मना करेगा, तभी बाजार से प्लास्टिक की निर्भरता खत्म होगी।
जनभागीदारी का महत्व
स्वच्छता अभियान को एक जनआंदोलन का रूप देने की आवश्यकता क्यों है? इसका जवाब कार्यक्रम में मुखिया चंपा देवी और अन्य पंचायत प्रतिनिधियों ने दिया। सरकारी मशीनरी या सफाई कर्मी केवल एक सीमा तक ही काम कर सकते हैं, लेकिन असली बदलाव तब आता है जब हर घर का सदस्य अपने दरवाजे के सामने स्वच्छता की जिम्मेदारी खुद उठाए।
सभा में हुई चर्चा के मुख्य बिंदु:
- पेड़ों का महत्व: केवल पौधे लगाना काफी नहीं है, उनकी सुरक्षा करना भी जरूरी है।
- जल संरक्षण: तालाबों और कुओं में कचरा फेंकने पर सख्त रोक।
- जागरूकता: युवाओं को स्वच्छता के दूत (Ambassadors) के रूप में तैयार करना।
स्थानीय नेतृत्व की भूमिका
इस कार्यक्रम की सबसे बड़ी सफलता यह रही कि इसमें उपमुखिया गीता रजक, पंचायत सचिव नंदकुमार पंडित और सुदर्शन साह जैसे स्थानीय नेताओं ने पूरी सक्रियता दिखाई। जब पंचायत का नेतृत्व खुद सामने आकर कचरा प्रबंधन की बात करता है, तो ग्रामीणों का आत्मविश्वास बढ़ता है। सनी भगत और साकेत ठाकुर जैसे युवा साथियों की भागीदारी यह दर्शाती है कि नई पीढ़ी पर्यावरण को लेकर काफी गंभीर है।
बेहतर भविष्य का रोडमैप
अंत में, उपस्थित सभी लोगों ने एक सामूहिक शपथ ली। यह शपथ केवल कागजों पर नहीं, बल्कि धरातल पर क्रियान्वित होनी है। आने वाले महीनों में पंचायत में डस्टबिन का वितरण और स्वच्छता रैलियों के आयोजन पर जोर दिया जाएगा। खेसर पंचायत की यह पहल बांका जिले के अन्य गांवों के लिए एक आईना है कि कैसे छोटी-छोटी कोशिशें मिलकर एक बड़ा बदलाव ला सकती हैं। अब बारी है इन वादों को हकीकत में बदलने की, ताकि हमारे गांव न केवल स्वच्छ दिखें, बल्कि वास्तव में एक हरित भविष्य की नींव बन सकें।








