दोहा/वाशिंगटन,अंग भारत। ईरान ने अमेरिका के साथ भविष्य की किसी भी सीधी कूटनीतिक बातचीत के लिए एक सख्त शर्त रख दी है। तेहरान ने साफ कर दिया है कि जब तक लेबनान में इजराइली सैन्य अभियान पूरी तरह से नहीं रुकता, तब तक वह वॉशिंगटन के साथ किसी भी अंतिम समझौते पर सीधी वार्ता नहीं करेगा। वर्तमान में कतर की राजधानी दोहा में दोनों देशों के प्रतिनिधि मौजूद तो हैं, लेकिन ईरान की इस नई चेतावनी के कारण सीधे संवाद की गुंजाइश फिलहाल खत्म हो गई है। इसका सीधा मतलब यह है कि खाड़ी क्षेत्र में शांति बहाली की राह और ज्यादा कठिन हो गई है।
लेबनान और ईरान की शर्त
ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बागेर घालीबाफ ने तेहरान के रुख को बहुत आक्रामक तरीके से दुनिया के सामने रखा है। उनका कहना है कि लेबनान में जारी युद्ध के बीच अमेरिका के साथ बैठकर किसी तरह की डील करना उनके लिए संभव नहीं है। घालीबाफ की मांगें केवल युद्धविराम तक सीमित नहीं हैं:
- लेबनान में इजराइली सैन्य कार्रवाइयों को तुरंत रोका जाए।
- ईरान पर लगे अंतरराष्ट्रीय तेल निर्यात प्रतिबंधों को हटाया जाए।
- विदेशों में फ्रीज की गई ईरान की अरबों डॉलर की संपत्ति को तत्काल रिलीज किया जाए।
यह मांगें दर्शाती हैं कि ईरान अब केवल क्षेत्रीय मुद्दों पर ही नहीं, बल्कि आर्थिक दबाव के मोर्चे पर भी अमेरिका को घेरने की रणनीति अपना रहा है।
कतर की मध्यस्थता का संकट
कतर इस पूरे मामले में एक सेतु (bridge) की तरह काम करने की कोशिश कर रहा है। दोहा में कतर के प्रधानमंत्री शेख मोहम्मद बिन अब्दुल रहमान बिन जसीम अल थानी लगातार अमेरिकी दूतों, स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर के साथ मंत्रणा कर रहे हैं। हालांकि, स्थिति यह है कि ईरान और अमेरिका के प्रतिनिधि एक ही शहर में हैं, फिर भी आमने-सामने बातचीत की टेबल पर नहीं आ रहे हैं।
ईरान ने स्पष्ट किया है कि वे जो भी बात करेंगे, वह कतर के माध्यम से ही होगी। यानी, अभी सिर्फ ‘अप्रत्यक्ष’ बातचीत का ही रास्ता खुला है। तेहरान ने साथ ही यह चेतावनी भी दी है कि अगर अमेरिका युद्धविराम के किसी भी समझौते में ढिलाई बरतता है या इजराइल को समर्थन जारी रखता है, तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
इजराइल का सैन्य दबाव
एक तरफ कूटनीति की कोशिशें चल रही हैं, तो दूसरी तरफ जमीनी हकीकत काफी अलग है। इजराइल ने पुष्टि की है कि उसने दक्षिणी लेबनान में हिजबुल्लाह के एक प्रमुख लड़ाके को मार गिराया है। यह घटनाक्रम कूटनीतिक प्रयासों के लिए एक बड़े झटके के समान है। जब तक सीमा पर बारूद बरस रहा है, तब तक दोहा में बैठकर शांति की बातें बेमानी लगने लगती हैं। इजराइल का स्पष्ट संदेश है कि वह अपनी सुरक्षा के लिए किसी भी सीमा तक जाने को तैयार है, जो सीधे तौर पर ईरान के प्रभाव क्षेत्र को चुनौती देता है।
होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा
खाड़ी क्षेत्र में केवल लेबनान ही एकमात्र चिंता का विषय नहीं है। होर्मुज जलडमरूमध्य, जो दुनिया के तेल व्यापार की लाइफलाइन है, वहां का तनाव भी अमेरिका के लिए बड़ी सिरदर्दी बना हुआ है। सीआईए के पूर्व अधिकारी स्कॉट उहलिंगर के अनुसार, वॉशिंगटन फिलहाल ईरान के साथ इसी समुद्री मार्ग को सुरक्षित रखने के लिए तकनीकी स्तर पर चर्चा कर रहा है।
रणनीतिक प्राथमिकताएं क्या हैं?
अमेरिका की पहली प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि होर्मुज से गुजरने वाले तेल टैंकरों पर कोई खतरा न हो।
उहलिंगर का मानना है कि अमेरिका कतर और खाड़ी देशों के साथ मिलकर एक ऐसा सुरक्षा तंत्र बनाने में जुटा है, जिससे भविष्य में ईरान के साथ किसी भी सीधे सैन्य संघर्ष की नौबत न आए। लेकिन ईरान इस तकनीकी बातचीत का उपयोग भी एक सौदेबाजी के हथियार के रूप में कर रहा है।
भविष्य के संकेत
यह पूरा घटनाक्रम बताता है कि ईरान अब बहुत फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है। तेहरान को अच्छी तरह पता है कि लेबनान की स्थिति सीधे तौर पर उसके क्षेत्रीय दबदबे (proxy influence) से जुड़ी है। अमेरिका और ईरान के बीच की इस ‘हॉट-कोल्ड’ डिप्लोमेसी ने मध्य पूर्व में एक नया अनिश्चितता का दौर शुरू कर दिया है। जब तक लेबनान की धरती शांत नहीं होती, तब तक वॉशिंगटन और तेहरान के बीच किसी भी बड़े कूटनीतिक breakthrough की उम्मीद करना मुश्किल है। दुनिया अब कतर की अगली चाल और अमेरिका के जवाब पर टिकी है।







