कुरसेला (कटिहार),अंगभारत। बिहार के कटिहार जिले में गंगा और कोसी नदियों का रौद्र रूप अब एक मानवीय त्रासदी में तब्दील हो चुका है। बरारी विधानसभा क्षेत्र के विधायक विजय सिंह निषाद ने बिहार विधानसभा के शीतकालीन सत्र में कुरसेला प्रखंड के दक्षिणी मुरादपुर पंचायत के तीनघड़िया गांव में हो रहे भीषण कटाव का मुद्दा पुरजोर तरीके से उठाया है। इस गांव का अस्तित्व ही खतरे में है, क्योंकि उपजाऊ कृषि भूमि और सैकड़ों घर तेजी से नदी में समा रहे हैं। विधायक ने सरकार से जियोबैग्स और बोल्डर पिचिंग के जरिए तत्काल युद्धस्तर पर स्थायी कटावरोधी कार्य शुरू करने की मांग की है ताकि इस गांव को पूरी तरह विलुप्त होने से बचाया जा सके।
तीनघड़िया का जमीनी सच
नदियों के मुहाने पर बसा तीनघड़िया गांव आज अपनी आखिरी सांसें गिन रहा है। पिछले कई महीनों से यहां की स्थिति ऐसी है कि लोग अपनी आंखों के सामने अपने घरों और खेतों को नदी के आगोश में जाते देख रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रशासन के अधिकारी समय-समय पर आते तो हैं, लेकिन वे केवल औपचारिकताएं पूरी करके लौट जाते हैं। फाइलों में दर्ज कटाव की तीव्रता धरातल पर दिख रहे विनाश से कहीं कम आंकी गई है, जो ग्रामीणों के भीतर गहरे गुस्से को जन्म दे रही है। मिट्टी के बड़े-बड़े टीले जब नदी में गिरते हैं, तो उसकी गूंज किसी धमाके जैसी होती है, जो यहां के निवासियों की रातों की नींद उड़ा चुकी है।
कटाव से भारी नुकसान
तीनघड़िया में कटाव का असर केवल जमीन के डूबने तक सीमित नहीं है, इसके सामाजिक और आर्थिक परिणाम भयावह हैं:
- खेती पर निर्भरता का अंत: यह क्षेत्र केला और मक्का उत्पादन का बड़ा केंद्र है। उपजाऊ जमीन के नदी में मिलने से किसानों की आय के सारे स्रोत खत्म हो रहे हैं।
- आशियाना टूटने का दर्द: नदी का बहाव अब रिहायशी इलाकों तक पहुंच चुका है। कई परिवारों ने खुद ही अपने मकानों को तोड़ना शुरू कर दिया है ताकि कम से कम ईंटें और दरवाजे बचाकर वे किसी सुरक्षित स्थान पर जा सकें।
- मजबूरी का पलायन: जमीन और मकान गंवा चुके युवा और परिवार अब दूसरे राज्यों में दिहाड़ी मजदूरी के लिए जाने को विवश हैं, जिससे गांव का सामाजिक ढांचा बिखर रहा है।
विधानसभा में तीखे सवाल
विधानसभा के शीतकालीन सत्र में विधायक विजय सिंह निषाद ने सरकार को आईना दिखाते हुए स्पष्ट कहा कि यदि समय रहते सुरक्षात्मक दीवार नहीं बनी, तो कटिहार के नक्शे से तीनघड़िया का नाम मिट जाएगा। उन्होंने जल संसाधन विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि आपदा राहत कोष का इस्तेमाल केवल दिखावे के लिए नहीं, बल्कि ठोस इंजीनियरिंग कार्यों में होना चाहिए। उनकी यह मांग इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हर साल बारिश के बाद किए जाने वाले ‘मरम्मत’ के कार्य केवल खानापूर्ति साबित होते हैं।
स्थायी बनाम अस्थायी राहत
अक्सर प्रशासन कम लागत वाली तकनीकों का उपयोग करता है जो पहली बाढ़ में ही बह जाती हैं। नीचे दी गई तालिका इन दोनों के बीच के बुनियादी अंतर को स्पष्ट करती है:
| कार्य का प्रकार | तकनीक | प्रभावशीलता |
|---|---|---|
| अस्थायी | बालू की बोरियां, बांस | सीमित (हफ्तों तक) |
| स्थायी | बोल्डर, जियोबैग्स, स्पर | दीर्घकालिक (वर्षों तक) |
अर्थव्यवस्था पर असर
कटिहार की पहचान यहां के कृषि उत्पादों से है। जब तीनघड़िया जैसे गांव कटाव की भेंट चढ़ते हैं, तो इसका सीधा असर स्थानीय मंडियों और परिवहन व्यवस्था पर पड़ता है। केले की जो खेप पूरे बिहार में जाती है, उसका बड़ा हिस्सा इसी बेल्ट से आता है। फसल नष्ट होने से बाजार में मंदी आती है और स्थानीय व्यापारियों की कमर टूट जाती है। यह पूरी एक चेन है जो इस कटाव के कारण पूरी तरह ध्वस्त हो रही है।
अब क्या कदम जरूरी?
प्रशासन को अब देरी का खेल बंद करना होगा। सबसे पहले प्रभावित क्षेत्रों की अत्याधुनिक ड्रोन मैपिंग करके कटाव की गति का सही आकलन जरूरी है। इसके बाद, बोल्डर और भारी जियोबैग्स के साथ तटबंध को मजबूत करने का कार्य शुरू होना चाहिए। प्रभावित परिवारों के पुनर्वास के लिए एक स्पष्ट सरकारी नीति लागू करना अनिवार्य है ताकि वे बेघर होने के बाद दर-दर भटकने को मजबूर न हों। अगर समय रहते कार्रवाई नहीं की गई, तो आने वाली पीढ़ी इस गांव को केवल नक्शों पर ही ढूंढ पाएगी।








